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Delhi: 47 साल बाद एम्स देगा कर्मचारी के परिवार को बकाया वेतन और रिटायरमेंट लाभ, आखिर अदालत से ही मिला न्याय
Sat, 15 Aug 2026 02:12 AM IST
दुष्यंत शर्मा
गौरव बाजपेई, नई दिल्ली
गौरव बाजपेई, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sat, 15 Aug 2026 02:12 AM IST
सार
न्यायमूर्ति शैल जैन ने 6 अगस्त 2026 को दिए गए फैसले में एम्स की याचिका खारिज कर दी, जबकि कर्मचारी के कानूनी वारिसों की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया।
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अदालत ने बैक वेजेस को 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिल्ली हाईकोर्ट ने एम्स के एक पूर्व नर्सिंग अर्दली की 1979 में कथित इस्तीफे को अनैच्छिक करार देते हुए लेबर कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। अदालत ने बैक वेजेस को 40 प्रतिशत से बढ़ाकर 50 प्रतिशत कर दिया है। न्यायमूर्ति शैल जैन ने 6 अगस्त 2026 को दिए गए फैसले में एम्स की याचिका खारिज कर दी, जबकि कर्मचारी के कानूनी वारिसों की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार किया।
मोहम्मद रफीक 18 अगस्त 1964 को एम्स में नर्सिंग अर्दली के पद पर नियुक्त हुए थे और 1 फरवरी 1965 से स्थायी हो गए थे। 1979 में पत्नी की गंभीर बीमारी के कारण कुछ समय अनुपस्थित रहने के बाद 15 अक्टूबर 1979 को वे ड्यूटी पर लौटे। एम्स का दावा था कि उन्होंने घरेलू परिस्थितियों के कारण स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया, जिसे स्वीकार किया गया। रफीक का कहना था कि उन्हें जॉइनिंग रिपोर्ट बताकर हस्ताक्षर कराए गए, जिन्हें बाद में इस्तीफा पत्र मान लिया गया। उन्होंने तुरंत कई अभ्यावेदन देकर ड्यूटी पर लौटने की अनुमति मांगी।
1981 में औद्योगिक विवाद रेफरेंस पर लेबर कोर्ट ने 10 दिसंबर 1998 को अवॉर्ड पारित कर इस्तीफे को अनैच्छिक ठहराया और निरंतरता के साथ सेवा में बहाली तथा 40 प्रतिशत बैक वेजेस का निर्देश दिया। एम्स ने इस अवॉर्ड को चुनौती दी, जबकि रफीक ने पूर्ण बैक वेजेस की मांग की। कार्यवाही के दौरान रफीक का निधन हो गया, इसलिए उनके कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाया गया। हाईकोर्ट ने एम्स के इस तर्क को खारिज किया कि कर्मचारी सिविल पोस्ट पर होने के कारण औद्योगिक विवाद अधिनियम लागू नहीं होता। अदालत ने कहा कि लेबर कोर्ट ने रेफरेंस के दायरे से बाहर नहीं जाकर इस्तीफे की स्वेच्छा का प्रश्न तय किया, जो विवाद का मूल आधार था।
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अदालत ने लेबर कोर्ट के इस निष्कर्ष को सही माना कि रफीक ने स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं दिया था और सेवा समाप्ति अवैध थी। यह निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित है और आर्टिकल 226 के तहत हस्तक्षेप योग्य नहीं है। बैक वेजेस के मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि लेबर कोर्ट ने 40 प्रतिशत का आदेश बिना पर्याप्त कारण बताए दिया था। साथ ही पूर्ण बैक वेजेस भी उचित नहीं। दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाते हुए अदालत ने 1979 से अगस्त 1996 (सेवानिवृत्ति तिथि) तक 50 प्रतिशत बैक वेजेस तथा रिटायरमेंट और टर्मिनल बेनिफिट्स की गणना के लिए निरंतरता का निर्देश दिया। ये लाभ 12 सप्ताह के भीतर कानूनी वारिसों को दिए जाएं, अन्यथा 6 प्रतिशत साधारण ब्याज देय होगा।
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मोहम्मद रफीक 18 अगस्त 1964 को एम्स में नर्सिंग अर्दली के पद पर नियुक्त हुए थे और 1 फरवरी 1965 से स्थायी हो गए थे। 1979 में पत्नी की गंभीर बीमारी के कारण कुछ समय अनुपस्थित रहने के बाद 15 अक्टूबर 1979 को वे ड्यूटी पर लौटे। एम्स का दावा था कि उन्होंने घरेलू परिस्थितियों के कारण स्वेच्छा से इस्तीफा दे दिया, जिसे स्वीकार किया गया। रफीक का कहना था कि उन्हें जॉइनिंग रिपोर्ट बताकर हस्ताक्षर कराए गए, जिन्हें बाद में इस्तीफा पत्र मान लिया गया। उन्होंने तुरंत कई अभ्यावेदन देकर ड्यूटी पर लौटने की अनुमति मांगी।
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1981 में औद्योगिक विवाद रेफरेंस पर लेबर कोर्ट ने 10 दिसंबर 1998 को अवॉर्ड पारित कर इस्तीफे को अनैच्छिक ठहराया और निरंतरता के साथ सेवा में बहाली तथा 40 प्रतिशत बैक वेजेस का निर्देश दिया। एम्स ने इस अवॉर्ड को चुनौती दी, जबकि रफीक ने पूर्ण बैक वेजेस की मांग की। कार्यवाही के दौरान रफीक का निधन हो गया, इसलिए उनके कानूनी वारिसों को पक्षकार बनाया गया। हाईकोर्ट ने एम्स के इस तर्क को खारिज किया कि कर्मचारी सिविल पोस्ट पर होने के कारण औद्योगिक विवाद अधिनियम लागू नहीं होता। अदालत ने कहा कि लेबर कोर्ट ने रेफरेंस के दायरे से बाहर नहीं जाकर इस्तीफे की स्वेच्छा का प्रश्न तय किया, जो विवाद का मूल आधार था।
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अदालत ने लेबर कोर्ट के इस निष्कर्ष को सही माना कि रफीक ने स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं दिया था और सेवा समाप्ति अवैध थी। यह निष्कर्ष साक्ष्यों पर आधारित है और आर्टिकल 226 के तहत हस्तक्षेप योग्य नहीं है। बैक वेजेस के मामले में हाईकोर्ट ने कहा कि लेबर कोर्ट ने 40 प्रतिशत का आदेश बिना पर्याप्त कारण बताए दिया था। साथ ही पूर्ण बैक वेजेस भी उचित नहीं। दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाते हुए अदालत ने 1979 से अगस्त 1996 (सेवानिवृत्ति तिथि) तक 50 प्रतिशत बैक वेजेस तथा रिटायरमेंट और टर्मिनल बेनिफिट्स की गणना के लिए निरंतरता का निर्देश दिया। ये लाभ 12 सप्ताह के भीतर कानूनी वारिसों को दिए जाएं, अन्यथा 6 प्रतिशत साधारण ब्याज देय होगा।