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यौन पीड़ित बच्चों को बार-बार अदालत बुलाना मानसिक आघात का कारण : हाईकोर्ट
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में नाबालिग पीड़ितों को ट्रायल या जमानत सुनवाई के दौरान बार-बार समन जारी कर बुलाना उनके लिए गंभीर मानसिक तनाव और पुनः आघात का कारण बन सकता है। अदालत ने निचली अदालतों और विशेष अदालतों को निर्देश दिए कि बाल पीड़ितों के साथ संवेदनशील और बाल-अनुकूल प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने 15 मार्च को दिए गए आदेश में कहा, जमानत आवेदन पर विचार के चरण में पीड़ित को सुनवाई का अधिकार है, लेकिन एक बार पीड़ित की आपत्तियां या जमानत पर उनके विचार दर्ज हो जाने के बाद, हर सुनवाई की तारीख पर उनकी शारीरिक या वर्चुअल उपस्थिति पर बार-बार जोर नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने पॉक्सो एक्ट (बच्चों का यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम) के तहत निर्धारित बाल-अनुकूल प्रक्रियाओं पर जोर देते हुए कहा कि बच्चों की गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दर्ज की जा सकती है, ताकि उन्हें अदालत में बार-बार शारीरिक रूप से पेश होने की जरूरत न पड़े। इससे पीड़ितों को अनावश्यक कष्ट और आघात से बचाया जा सकता है। यह टिप्पणी तीन नाबालिग लड़कियों द्वारा दायर याचिका पर आई, जो 2022 में लापता होने के बाद दिल्ली में मिली थीं। उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें दो दिनों तक यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया गया और धमकियां दी गईं। मामले में दुष्कर्म, मानव तस्करी और पॉक्सो एक्ट के तहत आरोप लगे हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उन्हें बार-बार समन जारी किए गए, जिससे एक पीड़िता को नौ बार बुलाया गया और उनकी गवाही पूरी होने में काफी समय लगा। एक पीड़िता के भावनात्मक आघात के कारण पेश न होने पर निचली अदालत ने उसके खिलाफ जमानती वारंट भी जारी किया था, जिसे हाईकोर्ट ने पहले रद्द किया था।
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नई दिल्ली।
दिल्ली हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि यौन उत्पीड़न के मामलों में नाबालिग पीड़ितों को ट्रायल या जमानत सुनवाई के दौरान बार-बार समन जारी कर बुलाना उनके लिए गंभीर मानसिक तनाव और पुनः आघात का कारण बन सकता है। अदालत ने निचली अदालतों और विशेष अदालतों को निर्देश दिए कि बाल पीड़ितों के साथ संवेदनशील और बाल-अनुकूल प्रक्रियाओं का पालन किया जाए।
न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की एकल पीठ ने 15 मार्च को दिए गए आदेश में कहा, जमानत आवेदन पर विचार के चरण में पीड़ित को सुनवाई का अधिकार है, लेकिन एक बार पीड़ित की आपत्तियां या जमानत पर उनके विचार दर्ज हो जाने के बाद, हर सुनवाई की तारीख पर उनकी शारीरिक या वर्चुअल उपस्थिति पर बार-बार जोर नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत ने पॉक्सो एक्ट (बच्चों का यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम) के तहत निर्धारित बाल-अनुकूल प्रक्रियाओं पर जोर देते हुए कहा कि बच्चों की गवाही वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से दर्ज की जा सकती है, ताकि उन्हें अदालत में बार-बार शारीरिक रूप से पेश होने की जरूरत न पड़े। इससे पीड़ितों को अनावश्यक कष्ट और आघात से बचाया जा सकता है। यह टिप्पणी तीन नाबालिग लड़कियों द्वारा दायर याचिका पर आई, जो 2022 में लापता होने के बाद दिल्ली में मिली थीं। उन्होंने आरोप लगाया था कि उन्हें दो दिनों तक यौन उत्पीड़न का शिकार बनाया गया और धमकियां दी गईं। मामले में दुष्कर्म, मानव तस्करी और पॉक्सो एक्ट के तहत आरोप लगे हैं। याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि उन्हें बार-बार समन जारी किए गए, जिससे एक पीड़िता को नौ बार बुलाया गया और उनकी गवाही पूरी होने में काफी समय लगा। एक पीड़िता के भावनात्मक आघात के कारण पेश न होने पर निचली अदालत ने उसके खिलाफ जमानती वारंट भी जारी किया था, जिसे हाईकोर्ट ने पहले रद्द किया था।
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