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Alert: दिल्ली में सिमट रहे हैं बचपन के दिन, समय से पहले दस्तक दे रही है किशोरावस्था; MAMC का शोध चौंकाने वाला

सोनम प्रतिहस्त/सिमरन, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 22 Jan 2026 05:25 AM IST
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सार

मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि दिल्ली के स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राएं समय से पहले शारीरिक रूप से परिपक्व हो रही हैं।

Childhood is shrinking in Delhi, adolescence is arriving prematurely.
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : AI Image
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विस्तार
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किशोरावस्था के दौरान बच्चों में मानसिक समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। किशोरावस्था के दौरान हार्मोनल बदलाव से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। उनकी भावनाओं को न समझना और शरीर में होने वाले हार्मोनल बदलाव बच्चों को भीतर ही भीतर तनाव में डाल रहे हैं। कई मामलों में बच्चे अपनी परेशानी किसी से साझा भी नहीं कर पा रहे हैं। पूर्वी दिल्ली स्थित मानव व्यवहार एवं संबंद्ध संस्थान में काउंसलिंग के दौरान विशेषज्ञों ने बताया कि किशोरावस्था के दौरान बच्चों से समय पर संवाद और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी मदद न मिलने पर यह समस्या गंभीर रूप ले सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार बच्चों के व्यवहार में अचानक बदलाव मानसिक परेशानी का संकेत हो सकता है। लगातार चुप रहना, चिड़चिड़ापन, नींद और भूख में कमी, पढ़ाई से दूरी और खुद को दूसरों से अलग रखना ऐसे संकेत हैं, जिन पर अभिभावकों और शिक्षकों को ध्यान देना चाहिए।

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जब हंसता-खेलता बच्चा अचानक रहने लगा चुप
ईस्ट दिल्ली के दिलशाद गार्डन स्थित एक सरकारी स्कूल में पढ़ने वाला 15 वर्षीय छात्र पहले काफी मिलनसार था। दोस्तों के साथ खेलना, पढ़ाई में रुचि और घर में हंसी-मजाक उसकी पहचान थी। अब बीते कुछ महीनों में उसके व्यवहार में अचानक बदलाव आ गया। घर पर अपने 10 वर्षीय छोटे भाई से हर बात में तुलना करने लगा। साथ ही अपने माता-पिता से भी नाराज रहने लगा। वह धीरे-धीरे अकेला रहने लगा, बात-बात पर चिड़चिड़ापन और रात को नींद न आना उसकी दिनचर्या बन गई। स्कूल जाने से कतराने लगा और घर में भी कम बोलने लगा। परिजनों के अनुसार बच्चा अक्सर कहता था कि कोई उसे समझ नहीं पाता। बाद में पता चला कि वह लंबे समय से मानसिक तनाव और चिंता से गुजर रहा था।
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पढ़ाई का दबाव बना डिप्रेशन की वजह
पूर्वी दिल्ली के गोकुलपुरी इलाके की रहने वाली 14 वर्षीय छात्रा पढ़ाई में हमेशा आगे रही। बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद और तुलना के दबाव ने धीरे-धीरे उसे तनाव में डाल दिया। किशोरावस्था के दौरान शरीर में हो रहे हार्मोनल बदलाव और भावनात्मक असंतुलन ने उसकी परेशानी और बढ़ा दी। परिजनों ने बताया कि बच्ची अक्सर बेचैन रहती, बिना वजह रोने लगती और खुद को दूसरों से कमतर समझने लगी थी। सोशल मीडिया पर साथियों से तुलना के कारण उसका आत्मविश्वास भी कमजोर हो गया। समय पर ध्यान न देने पर बच्ची में डिप्रेशन के लक्षण साफ नजर आने लगे।

किशोरावस्था है बच्चों के जीवन का संवेदनशील दौर
डॉक्टरों ने कहा कि अभिभावकों को बच्चों से खुलकर बातचीत कर उनकी भावनाओं को समझने की कोशिश करनी चाहिए। पढ़ाई या प्रदर्शन को लेकर अत्यधिक दबाव बनाने से बचें। जरूरत पड़ने पर समय रहते काउंसलिंग और विशेषज्ञ की मदद लेना बेहद जरूरी है। किशोरावस्था बच्चों के जीवन का सबसे संवेदनशील दौर है।

दिल्ली की स्कूली छात्राएं समय से पहले हो रहीं शारीरिक रूप से परिपक्व
फास्ट फूड, मोबाइल, टीवी की बढ़ती आदत और खेल-कूद से दूरी अब बच्चों के सेहत पर गहरा असर डाल रही है। इसका असर सिर्फ वजन बढ़ने तक सीमित नहीं है, बल्कि बच्चों के शारीरिक विकास की रफ्तार भी बदल रही है। मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की एक नई रिसर्च में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि दिल्ली के स्कूलों में पढ़ने वाली छात्राएं समय से पहले शारीरिक रूप से परिपक्व हो रही हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, असंतुलित खान-पान, जंक फूड और बढ़ता मोटापा लड़कियों के शरीर में हार्मोनल बदलाव जल्दी ला रहा है। यह शोध माता-पिता और समाज दोनों के लिए चेतावनी है कि बच्चों की जीवनशैली पर अब गंभीर ध्यान देने की जरूरत है।

अध्ययन में स्कूली लड़कियों पर विस्तृत अध्ययन किया गया। इसमें सामने आया कि बच्चों के बढ़ने और प्यूबर्टी शुरू होने के पैटर्न में पिछले कुछ वर्षों में साफ बदलाव देखने को मिल रहा है। शोध के मुताबिक, मौजूदा समय की लड़कियों में किशोरावस्था पहले शुरू हो रही है और इस दौरान उनकी लंबाई बढ़ने की गति भी ज्यादा देखी जा रही है। विशेषज्ञ इसे पोषण, जीवनशैली और शरीर के वजन में बदलाव से जोड़कर देख रहे हैं। यह प्रोस्पेक्टिव कोहोर्ट स्टडी साल 2018 में शुरू की गई थी, जिसमें 3 से 18 साल की 2470 स्कूली लड़कियों को शामिल किया गया। माता-पिता की सहमति के बाद करीब ढाई साल तक इन लड़कियों की निगरानी की गई। इस दौरान हर छह महीने पर स्कूल विजिट के समय उनकी लंबाई और वजन मापा गया, जबकि प्यूबर्टी से जुड़े शारीरिक बदलावों का आकलन हर साल किया गया।

अब पहले ही शुरू हो रही प्यूबर्टी
अध्ययन में शामिल लड़कियों की औसत उम्र लगभग 10 साल थी। शोध के नतीजों के मुताबिक, लड़कियों में स्तनों का विकास यानी थेलार्चे की औसत उम्र करीब 10 साल और माहवारी शुरू होने यानी मेनार्चे की औसत उम्र करीब 12 साल पाई गई। यह उम्र पहले की तुलना में कम मानी जा रही है, जिससे यह संकेत मिलता है कि प्यूबर्टी अब पहले शुरू हो रही है। प्यूबर्टी के दूसरे चरण में लड़कियों की लंबाई बढ़ने की गति सबसे अधिक होती है। इस दौरान औसतन 6 सेंटीमीटर से अधिक लंबाई हर साल बढ़ी, जो अन्य चरणों की तुलना में काफी ज्यादा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि किशोरावस्था के शुरुआती बरसों में शारीरिक विकास सबसे तेज होता है। ज्यादा वजन या मोटापे से ग्रस्त लड़कियों में प्यूबर्टी और माहवारी पहले हो रही है।

माता-पिता दें इस पर विशेष ध्यान
विशेषज्ञों के मुताबिक, समय के साथ बच्चों के विकास का पैटर्न बदला है। बेहतर पोषण, शहरी जीवनशैली, शारीरिक गतिविधियों में कमी और खानपान की आदतों में बदलाव इसके प्रमुख कारण माने जा रहे। डॉक्टरों और बाल रोग विशेषज्ञों के मुताबिक, इस तरह के अध्ययन माता-पिता और शिक्षकों के लिए बेहद उपयोगी हैं। इससे बच्चों के शारीरिक विकास को समझने और समय पर सही मार्गदर्शन देने में मदद मिलती है। डॉ आशीमा डबास ने कहा कि खान पान और आसपास के माहौल का बच्चों के विकास पर गहरा असर पड़ रहा है। समय से पहले शारीरिक बदलाव भविष्य में अंगों की सेहत को प्रभावित कर सकते हैं। ऐसे में बच्चों की डाइट और उनके सक्रिय लाइफस्टाइल पर खासकर ध्यान देने की जरूरत है।

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