फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   Delhi NCR News ›   Court cannot create a new section like IPC Section 377 in the BNS: High Court

अदालत बीएनएस में आईपीसी की धारा 377 जैसी नई धारा नहीं बना सकती : हाईकोर्ट

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 12 Aug 2026 06:32 PM IST
विज्ञापन
खंडपीठ ने कहा- कानून में अपराध का स्पष्ट प्रावधान करना विधायिका का अधिकार
विज्ञापन

अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को कहा कि वह भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) में उन अपराधों के लिए नई धारा नहीं बना सकता, जिन्हें भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 377 के तहत अपराध माना जाता था, लेकिन नए कानून में हटा दिया गया है। अदालत ने कहा कि यह विधायी नीति का विषय है और इसमें हस्तक्षेप करने का अधिकार केवल विधायिका को है।
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और जस्टिस तेजस कारिया की खंडपीठ ने कहा कि अदालत याचिकाकर्ताओं की चिंता समझती है, लेकिन वह न्यायिक आदेश के जरिए ऐसा अपराध नहीं बना सकती, जिसका प्रावधान कानून में नहीं है। पीठ ने सवाल किया कि जब अपराध का स्पष्ट वर्णन ही कानून में नहीं है तो उसे कौन तय कर सकता है? इसका अधिकार विधायिका के पास है।
विज्ञापन

याचिका में दलील-प्रावधानों में पुरुष को अपराधी मानकर व्यवस्था बनाई गई है
अदालत एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें बीएनएस के दुष्कर्म, यौन हमला, पीछा करने और ताक-झांक से जुड़े प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिका में कहा गया है कि इन प्रावधानों में अपराधी को पुरुष और पीड़ित को महिला मानकर व्यवस्था बनाई गई है, जो समानता के सांविधानिक अधिकार के अनुरूप नहीं है।
विज्ञापन
विज्ञापन

बीएनएस के प्रावधानों को लिंग-तटस्थ बनाने की मांग
याचिकाकर्ताओं ने इन प्रावधानों की लिंग-तटस्थ व्याख्या करने या केंद्र सरकार को कानून में संशोधन का निर्देश देने की मांग की। उनका कहना है कि आईपीसी की धारा 377 को बीएनएस में पूरी तरह हटा दिया गया है और उसकी जगह कोई वैकल्पिक प्रावधान नहीं है। इससे पुरुषों, ट्रांसजेंडर और थर्ड जेंडर व्यक्तियों या जानवरों के खिलाफ होने वाले कुछ यौन अपराधों पर कानूनी संरक्षण का सवाल खड़ा होता है।

अगली सुनवाई अक्तूबर में
अदालत ने कहा कि बीएनएस में संबंधित प्रावधान महिलाओं के खिलाफ अपराधों से जुड़े हैं और उनकी व्याख्या कर अप्राकृतिक अपराधों को उनके दायरे में नहीं लाया जा सकता। मामले की अगली सुनवाई अक्तूबर में होगी।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed