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Delhi NCR News: कमानी में डांस लाइक अ मैन का जादू, दर्शक हुए मंत्रमुग्ध
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- रिश्तों, कला और समाज के द्वंद्व को मंच पर किया जीवंत
संवाद न्यूज एजेंसी
नई दिल्ली। कमानी ऑडिटोरियम में रविवार को अनमास्क थिएटर ग्रुप की ओर से मशहूर नाटक डांस लाइक अ मैन का प्रभावशाली मंचन किया गया। खचाखच भरे सभागार में यह प्रस्तुति भावनाओं, अंतर्द्वंद्व और सामाजिक परतों को उजागर करती हुई एक यादगार रंगानुभूति बन गई। प्रख्यात नाटककार महेश दत्तानी की इस कालजयी कृति का निर्देशन जानी-मानी रंगकर्मी लिलेट दुबे ने किया। अपनी लोकप्रियता के चलते यह नाटक दुनिया के कई देशों में सैकड़ों बार मंचित हो चुका है और भारतीय अंग्रेजी रंगमंच के सबसे लंबे समय तक चलने वाले नाटकों में शुमार है।
नाटक की कहानी जयराज और रत्ना, दो भरतनाट्यम नर्तकों के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने करियर के ढलान पर खड़े हैं। उनकी बेटी लता की सफलता परिवार के भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या और अधूरे सपनों को सामने लाती है। रिश्तों की यह जटिल परतें कभी मुस्कान बिखेरती हैं तो कभी दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती हैं। संवादों की गहराई और प्रस्तुति की सादगी ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। नाटक ने यह भी सवाल उठाया कि कला केवल अभिव्यक्ति है या सामाजिक बंधनों और लैंगिक पूर्वाग्रहों से संघर्ष का माध्यम भी। हल्के व्यंग्य के साथ गंभीर विषयों की प्रस्तुति ने दर्शकों को हंसी और संवेदना के बीच झुलाया।
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नई दिल्ली। कमानी ऑडिटोरियम में रविवार को अनमास्क थिएटर ग्रुप की ओर से मशहूर नाटक डांस लाइक अ मैन का प्रभावशाली मंचन किया गया। खचाखच भरे सभागार में यह प्रस्तुति भावनाओं, अंतर्द्वंद्व और सामाजिक परतों को उजागर करती हुई एक यादगार रंगानुभूति बन गई। प्रख्यात नाटककार महेश दत्तानी की इस कालजयी कृति का निर्देशन जानी-मानी रंगकर्मी लिलेट दुबे ने किया। अपनी लोकप्रियता के चलते यह नाटक दुनिया के कई देशों में सैकड़ों बार मंचित हो चुका है और भारतीय अंग्रेजी रंगमंच के सबसे लंबे समय तक चलने वाले नाटकों में शुमार है।
नाटक की कहानी जयराज और रत्ना, दो भरतनाट्यम नर्तकों के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने करियर के ढलान पर खड़े हैं। उनकी बेटी लता की सफलता परिवार के भीतर छिपे अहंकार, ईर्ष्या और अधूरे सपनों को सामने लाती है। रिश्तों की यह जटिल परतें कभी मुस्कान बिखेरती हैं तो कभी दर्शकों को भीतर तक झकझोर देती हैं। संवादों की गहराई और प्रस्तुति की सादगी ने दर्शकों को अंत तक बांधे रखा। नाटक ने यह भी सवाल उठाया कि कला केवल अभिव्यक्ति है या सामाजिक बंधनों और लैंगिक पूर्वाग्रहों से संघर्ष का माध्यम भी। हल्के व्यंग्य के साथ गंभीर विषयों की प्रस्तुति ने दर्शकों को हंसी और संवेदना के बीच झुलाया।
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