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Delhi: 'जन्मपत्री आयु का प्रमाण नहीं', 13 साल पुराने POCSO मामले में दिल्ली हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी
अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली
Published by: अनुज कुमार
Updated Thu, 26 Mar 2026 10:53 PM IST
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सार
दिल्ली हाईकोर्ट ने 13 साल पुराने पॉक्सो मामले में आरोपी को बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा। कोर्ट ने कहा कि जन्मपत्री और जच्चा-बच्चा रक्षा कार्ड जैसे पारंपरिक दस्तावेज आयु साबित करने के लिए वैध प्रमाण नहीं माने जा सकते।
दिल्ली हाईकोर्ट (फाइल फोटो)
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिल्ली हाईकोर्ट ने एक 13 वर्ष पुराने पॉक्सो मामले में आरोपी की 2019 की दोषमुक्ति को बरकरार रखते हुए कहा कि जन्म पत्री और जच्चा-बच्चा रक्षा कार्ड जैसे पारंपरिक दस्तावेज आयु साबित करने के लिए वैध प्रमाण नहीं माने जा सकते।
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अदालत ने स्पष्ट किया कि नाबालिग होने का मामला साबित करने का बोझ अभियोजन पक्ष पर होता है और इसे विश्वसनीय सबूतों जैसे स्कूल रिकॉर्ड या ऑसिफिकेशन टेस्ट पर आधारित होना चाहिए।
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मामला 2013 का है, जिसमें एक व्यक्ति पर कथित तौर पर नाबालिग लड़की का अपहरण और बलात्कार का आरोप लगा था। ट्रायल कोर्ट ने 2019 में आरोपी को बरी कर दिया था, क्योंकि अभियोजन पक्ष लड़की की आयु 18 वर्ष से कम साबित नहीं कर सका।
राज्य सरकार की अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति रविंद्र डुडेजा और न्यायमूर्ति नवीन चावला ने कहा कि लड़की के पिता द्वारा पेश की गई जन्मपत्री बाद में तैयार की गई थी और स्कूल रिकॉर्ड भी इसी पर आधारित था, इसलिए इसे आयु प्रमाण के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता।
न्यायालय ने टिप्पणी की, "स्वीकार किया गया है कि जन्मपत्री जन्म तिथि का प्रमाण नहीं मानी जा सकती, इसलिए जन्मपत्री के आधार पर स्कूल रिकॉर्ड में दर्ज आयु भी प्रमाण नहीं है। अदालत ने कहा कि पॉक्सो एक्ट के तहत नाबालिग की आयु आधारभूत तत्व है और इसे संदेह से परे साबित करना जरूरी है।