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Delhi Medicine scam: अफसरों और सप्लायरों ने जानबूझकर पैदा की थी दवाओं की किल्लत, मैनुअल बांटे करोड़ों के टेंडर

Wed, 08 Jul 2026 03:15 AM IST
दुष्यंत शर्मा धनंजय मिश्रा, दिल्ली
धनंजय मिश्रा, दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 08 Jul 2026 03:15 AM IST
सार

रिकॉर्ड बताते हैं कि जनता को गुमराह करने के लिए सरकारी पोर्टल पर टेंडर का स्टेटस जानबूझकर एक्टिव या अंडर प्रोसेस दिखाया जाता रहा, जबकि हकीकत में उन टेंडरों का काम पूरा हो चुका था और चहेते सप्लायरों को करोड़ों का भुगतान भी किया जा चुका था।

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Delhi medicine scam: Officials and suppliers deliberately created a shortage of medicines
70 से 80 फीसदी महंगी दर पर दवाएं और उपकरण खरीदे गए। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

राजधानी के स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और सप्लायरों के गठजोड़ ने पहले जानबूझकर दवाओं की किल्लत पैदा की, उसके बाद मैनुअल वर्क ऑर्डर का सहारा लिया, ताकि 300 करोड़ की रिश्वत का रास्ता साफ हो सके। भ्रष्टाचार निरोधक शाखा (एसीबी) की ओर से दर्ज की गई एफआईआर में यह खुलासा हुआ है।

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नियमानुसार, सभी तरह की सरकारी खरीद ई-प्रोक्योरमेंट पोर्टल के जरिए होती हैं लेकिन दिल्ली स्वास्थ्य विभाग के आला अधिकारियों ने इस सिस्टम को ही हैक कर लिया। एफआईआर के अनुसार, तत्कालीन सीपीए प्रभारी डॉ. विनोद कुमार रंगा और तत्कालीन डीजीएसएस प्रमुख डॉ. वत्सला अग्रवाल ने सप्लायरों के साथ मिलकर वर्क ऑर्डर पोर्टल पर जारी करने के बजाय उसे मैनुअल तरीके से जारी किए। एफआईआर में साफ दर्ज है कि यह कोई प्रशासनिक गलती नहीं थी बल्कि साजिशन ऐसा किया गया था।
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रिकॉर्ड बताते हैं कि जनता को गुमराह करने के लिए सरकारी पोर्टल पर टेंडर का स्टेटस जानबूझकर एक्टिव या अंडर प्रोसेस दिखाया जाता रहा, जबकि हकीकत में उन टेंडरों का काम पूरा हो चुका था और चहेते सप्लायरों को करोड़ों का भुगतान भी किया जा चुका था। ऐसा इसलिए किया गया ताकि अन्य प्रतिस्पर्धी कंपनियां या आम जनता यह न जान सकें कि किसे और किस दर पर ठेका दिया गया है।
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70 से 80 फीसदी महंगी दर पर दवाएं और उपकरण खरीदे गए
जांच रिपोर्ट का सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि केंद्रीय खरीद एजेंसी (सीपीए) ने जानबूझकर राज्य स्तर पर दवाओं के टेंडर फाइनल नहीं होने दिए। इसके पीछे मकसद यह था कि अस्पतालों में दवाओं और सर्जिकल सामान की किल्लत हो जाए। इसके बाद अधिकारियों ने इमरजेंसी का हवाला देकर लोकल केमिस्टों से महंगी दरों पर खरीद का खेल शुरू किया।

स्थानीय स्तर पर खरीदी गई दवाएं राज्य स्तरीय टेंडर रेट से 70-80 फीसदी ज्यादा महंगीं थीं। अनुमान है कि इस फर्जीवाड़े के जरिए करीब 400 करोड़ रुपये की दवाएं और उपकरण खरीदे गए, जिसमें से लगभग 300 करोड़ रुपये की रिश्वत भ्रष्ट अधिकारियों और सप्लायर राजीव रंगीला के बीच बांटी गई।

धमकी देकर टेंडर दस्तावेजों पर कराए गए साइन
एफआईआर के दस्तावेज बताते हैं कि टेंडर की शर्तें खुद आरोपी सप्लायर राजीव रंगीला तैयार करता था। जब टेंडर कमेटी के सदस्यों ने इन फर्जी शर्तों पर हस्ताक्षर करने से मना किया या विरोध जताया तो उनके खिलाफ कार्रवाई करने की धमकी देकर चुप कराया गया।


रिपोर्ट बताती है कि जिन दवा कंपनियों ने बीते वर्षों में विभाग को सप्लाई दी थी, उनका भुगतान बीते दो वर्षों से जानबूझकर रोका गया, लेकिन सप्लायर राजीव रंगीला को विभाग ने वीआईपी ट्रीटमेंट दिया। अक्तूबर 2025 के बाद से रंगीला की कंपनियों के बिल जिस दिन जमा होते थे, उसी दिन या अगले दिन करोड़ों का भुगतान रिलीज कर दिया जाता था।

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