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Pollution: पराली नहीं...फिर क्यों दमघोंटू रही दिल्ली-एनसीआर की हवा, रिपोर्ट में सामने आया ये चौंकाने वाला कारण

अमर उजाला ब्यूरो, नई दिल्ली Published by: राहुल तिवारी Updated Thu, 01 Jan 2026 08:39 AM IST
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सार

दिल्ली-एनसीआर में अक्तूबर-नवंबर में पराली जलाने से प्रदूषण बढ़ता है, लेकिन अध्ययन में खुलासा हुआ है कि दिसंबर में भी हवा दमघोंटू रहती है। साफ है कि वायु प्रदूषण के लिए सिर्फ पराली नहीं, बल्कि वाहन, उद्योग और अन्य स्थानीय कारण भी जिम्मेदार हैं।

effect of stubble smoke is less in December but air of Delhi-NCR is still polluted according to CSE report
दिल्ली प्रदूषण पर सीएसई रिपोर्ट - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में वायु प्रदूषण का स्तर अक्सर अक्तूबर के महीने से बढ़ने लगता है। नवंबर आते-आते यह अपने चरम पर होता है। अक्तूबर और नवंबर का महीना ऐसा समय होता है जब पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश में खरीफ की फसलों की कटाई के बाद खेतों में बची पराली को जलाया जाता है। 

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यह माना जाता है कि पराली के जलाने से निकलने वाला धुआं दिल्ली-एनसीआर के वातावरण में आता है तो वायु प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाता है। सांस लेने में दिक्कत होने के साथ-साथ आंखों में जलन होने लगती है। लेकिन एक अध्ययन रिपोर्ट में यह स्याह सच सामने आया है कि दिसंबर के महीने में जब पराली के धुएं का असर बहुत कम हो जाता है, तब भी दिल्ली-एनसीआर की हवा दमघोंटू ही बनी रहती है। स्पष्ट है दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण की समस्या सिर्फ पराली जलाने से नहीं है, बल्कि इसके दूसरे कारक भी हैं।  

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विज्ञान और पर्यावरण केंद्र (सीएसई) ने दिल्ली-एनसीआर में अक्तूबर-नवंबर और दिसंबर के महीने में प्रदूषण और उसके कारकों का विश्लेषण किया है और 2025 के समापन के मौके पर रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दिसंबर में यानी पराली जलाने के बाद के चरण में एनसीआर में व्यापक और तीव्र धुंध छाई रही, जो पराली जलाने की अवधि से भी अधिक गंभीर थी। साफ है कि पराली जलाना बंद होने के बाद भी हवा में प्रदूषक बने रहते हैं। नोएडा और बागपत जैसे छोटे शहरों में दिल्ली की तुलना में प्रदूषण में अधिक प्रतिशत वृद्धि देखी गई है। कहा गया है कि दिल्ली के प्रदूषण के स्थानीय स्रोत शहर के प्रदूषक पीएम 2.5 का एक तिहाई हिस्सा बनाते हैं, इनमें से एनसीआर क्षेत्र का योगदान ज्यादा होता है। इसमें भी वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन की हिस्सेदारी सबसे अधिक होती है। 

चिंताजनक सच्चाई उजागर
 सीएसई में कार्यकारी निदेशक अनुमिता रॉयचौधरी कहती हैं कि यह अध्ययन एक चिंताजनक सच्चाई को उजागर करते हैं कि पराली जलाने के बंद होने के बाद भी दिल्ली का सर्दी के मौसम में प्रदूषण कम नहीं होता, बल्कि और बढ़ जाता है। यह स्थानीय और क्षेत्रीय स्रोतों जैसे वाहनों, उद्योगों, अपशिष्ट जलाने, घरेलू खाना पकाने और गर्म करने के लिए ठोस ईंधन के उपयोग को दर्शाता है। 

खेतों में आग पर नियंत्रण महत्वपूर्ण है, लेकिन शून्य उत्सर्जन की ओर अग्रसर होने के लिए शहरी और क्षेत्रीय उत्सर्जन स्रोतों के खिलाफ आक्रामक, साल भर चलने वाली कार्रवाई के बिना वायु गुणवत्ता लक्ष्यों को पूरा नहीं किया जा सकता है। समस्या की जटिलता सामने आई : सीएसई में स्वच्छ वायु कार्यक्रम की कार्यक्रम प्रबंधक शांभवी शुक्ला कहती हैं, 1 से 15 दिसंबर तक के डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (डीएसएस) के आंकड़ों का अध्ययन करने पर पाया गया कि समस्या कितनी जटिल है।

पीएम 2.5 स्तर में तेज वृद्धि
विश्लेषण के अनुसार, एनसीआर के शहरी केंद्रों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने का असर महसूस किया गया। कुछ शहरों में मामूली गिरावट देखी गई, जबकि अधिकांश शहरों में पीएम2.5 के स्तर में तेज वृद्धि दर्ज की गई। नोएडा में 38%, बल्लभगढ़ में 32%, बागपत में 31% और दिल्ली में 29% की वृद्धि हुई। सीएसई के अर्बन लैब की उप कार्यक्रम प्रबंधक शरणजीत कौर का कहना है, क्षेत्रीय स्तर पर प्रदूषण में यह वृद्धि स्थानीय उत्सर्जन स्रोतों के कारण हुई। शीतकालीन मौसम के कारण यह और भी बढ़ गई है, जिससे प्रदूषकों का फैलाव बाधित होता है।

हवा की गतिशीलता में महत्वपूर्ण बदलाव
पराली जलाने और जलाने के बाद की अवधियों के बीच भिन्न-भिन्न रुझान देखने को मिले। पीएम 2.5 रुझानों के विश्लेषण में पाया गया कि दिल्ली में सर्दी के मौसम में प्रदूषण का एकमात्र कारण पराली जलाना नहीं है। आंकड़ों से पता चलता है कि वायु गुणवत्ता की गतिशीलता में दो अलग-अलग चरणों में महत्वपूर्ण बदलाव आया है। 

एन पहला: पराली जलाने की अवधि (1 अक्टूबर से 30 नवंबर) के दौरान, पीएम 2.5 का औसत स्तर 163 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर रहा।
एन दूसरा: पराली जलाने के बाद की अवधि (1-28 दिसंबर) के दौरान उम्मीदों के विपरीत वायु गुणवत्ता में गिरावट आई। पीएम 2.5 का औसत स्तर तेजी से बढ़कर 210 माइक्रोग्राम प्रति घन मीटर हो गया, जो पिछली अवधि की तुलना में 29% की वृद्धि दर्शाता है। यह वृद्धि तब हुई जब खेतों में आग लगने से वायु गुणवत्ता में योगदान घटकर मात्र 0.2 प्रतिशत रह गया था। 

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