जब आस्था बनी संकल्प: गंगोत्री से गाजियाबाद तक 101 दिन की दंडवत यात्रा, गौरव की भक्ति के आगे दर्द भी नतमस्तक
शिवभक्त गौरव ने 101 दिनों में गंगोत्री से दूधेश्वरनाथ मंदिर तक 500 किलोमीटर की दंडवत यात्रा पूरी की। चोटों के बावजूद उन्होंने भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाया।
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आस्था जब संकल्प बन जाए तो मंजिल की दूरी मायने नहीं रखती और शरीर का दर्द भी भक्ति के सामने छोटा पड़ जाता है। भगवान शिव के प्रति ऐसी ही अटूट श्रद्धा लेकर शिवभक्त गौरव ने गंगोत्री से करीब 500 किलोमीटर की कठिन यात्रा दंडवत करते हुए पूरी की। तपती राहें, पथरीले रास्ते, पहाड़ियों की कठिन चढ़ाई और शरीर पर पड़ते घाव भी उनके कदमों को रोक नहीं सके। 101 दिनों तक बिना रुके, बिना थके दंडवत करते हुए वह छोटी पालकी वाली कांवड़ में गंगाजल लेकर गंगोत्री से आखिरकार गाजियाबाद के दूधेश्वरनाथ मंदिर पहुंचे और अपने आराध्य भगवान शिव के चरणों में जल अर्पित किया।
पटेल नगर-2 के रहने वाले कारोबारी गौरव शर्मा के लिए यह यात्रा केवल कांवड़ यात्रा नहीं, बल्कि मनोकामना, विश्वास और संकल्प की अग्निपरीक्षा थी। हर कुछ कदम पर जमीन को माथा टेकना, फिर उठना और आगे बढ़ना... इसी तरह 101 दिनों तक चलते रहे।
रास्ते की मुश्किलों ने उनके शरीर को तोड़ने की कोशिश की, लेकिन शिव के प्रति उसकी आस्था ने हौसला बनाए रखा। लंबी यात्रा के दौरान उसके पैरों में गहरे छाले पड़ गए और एक घुटना बुरी तरह जख्मी हो गया। इसके बावजूद उसने दंडवत यात्रा नहीं छोड़ी।
हर दंडवत के साथ आगे बढ़ता रहा संकल्प
गौरव ने बताया कि करीब 500 किलोमीटर की इस यात्रा में उन्होंने छोटी पालकी वाली कांवड़ में गंगाजल संभालकर रखा। तपती सड़क हो या पथरीली राह, पहाड़ी ढलान हो या थका देने वाला सफर, वह हर बार शरीर को जमीन पर रखकर दंडवत करता और फिर उसी विश्वास के साथ आगे बढ़ जाते थे। कई बार घावों का दर्द असहनीय हुआ, लेकिन मन में बस एक ही धुन थी अपने आराध्य दूधेश्वरनाथ के दर्शन और जलाभिषेक।
घाव शरीर पर थे, लेकिन हौसला अडिग रहा
यात्रा के 101वें दिन जब वह दूधेश्वरनाथ मंदिर के पास पहुंचे तो उनके पैरों के छाले और जख्मी घुटना उसकी तपस्या की कहानी खुद बयां कर रहे थे। शरीर थका हुआ था, मगर चेहरे पर संतोष था। जिस संकल्प के साथ उसने 101 दिन पहले यात्रा शुरू की थी, वह आखिरकार पूरा हो चुका था।
गौरव ने बताया कि इस दौरान उन्हें 50 से अधिक स्थानों पर ट्रॉफियां व प्रमाण पत्र देकर सम्मानित भी किया गया है। उन्होंने बताया कि उन्हें मिले इन ट्रॉफियों में से उन्होंने भी कई कांवड़ियों को सम्मानित किया, जो दंडवत करते हुए हरिद्वार से जल लेकर आ रहे थे।