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wildlife: वन्यजीवों को भारी पड़ रहा अकेलापन, सदमे में तोड़ रहे दम; चिड़ियाघर की बंदिशें खड़े करती हैं कई सवाल

नितिन राजपूत, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Wed, 11 Feb 2026 06:08 AM IST
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सार

चिड़ियाघर में लगातार हो रही वन्यजीवों की मौतें न सिर्फ संरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं, बल्कि यह भी पूछती हैं कि क्या हम सचमुच उन्हें बचा रहे हैं या बस जिंदा रहने का भ्रम दे रहे हैं।

Loneliness is taking a toll on wildlife, and they are dying in shock.
demo - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

लोहे की सलाखों के पीछे कैद जिंदगी, सीमित दायरा और प्रकृति से कटे हुए हालात… राष्ट्रीय प्राणी उद्यान में वन्यजीवों की यह खामोश पीड़ा अब मौतों के आंकड़ों में बदलने लगी है। खुले जंगलों के लिए बने जीव, जब तंग बाड़ों और एकाकी जीवन में सिमटते हैं, तो उनका शरीर ही नहीं, मन भी टूटने लगता है। नतीजा यह है कि मानसिक तनाव, अकेलापन और बीमारी धीरे-धीरे उनकी सांसें छीन रही है। 

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चिड़ियाघर में लगातार हो रही वन्यजीवों की मौतें न सिर्फ संरक्षण व्यवस्था पर सवाल खड़े करती हैं, बल्कि यह भी पूछती हैं कि क्या हम सचमुच उन्हें बचा रहे हैं या बस जिंदा रहने का भ्रम दे रहे हैं। केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार, 1 अप्रैल 2024 से 31 मार्च 2025 के बीच 127 वन्यजीवों की मौत हुई, जिनमें चिंकारा, काले हिरण, बारहसिंगा, नील गाय, भारतीय हॉग हिरण और चीतल जैसे प्रजाति के जानवर शामिल हैं।
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रिपोर्ट में बताया गया है कि 35 जानवरों की मौत सदमे (शॉक) और 25 की मौत शारीरिक या मानसिक तनाव की वजह से हुई। पिछले वर्ष 2023-24 में 148 जानवरों में से 37 ने सदमे और 32 ने शॉक के कारण दम तोड़ा था। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, ये जानवर जंगल से अलग होने और चिड़ियाघर में कैद होने के कारण मानसिक और शारीरिक तनाव झेलते हैं। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, काले हिरण और शाकाहारी जानवर बहुत संवेदनशील होते हैं। छोटी आवाज या हल्की हरकत से भी वे डर जाते हैं और शारीरिक प्रतिक्रिया के कारण उनकी मौत तक हो सकती है। ऐसे में कैप्चर मायोपैथी, आपसी झगड़े और पर्यावरणीय बदलाव वन्यजीवों की मौत का बड़ा कारण हैं।

2017 से 2025 तक 1,000 से अधिक वन्यजीवों की मौत हुई
चिड़ियाघर की रिपोर्ट के अनुसार, 2017 से 2025 तक 1,000 से अधिक वन्यजीवों की मौत हुई है, जिसमें सदमा सबसे प्रमुख कारण रहा। शाकाहारी और कुत्ते जैसी प्रजातियों में दर्दनाक सदमा और कैप्चर मायोपैथी से मौतें अधिक देखने को मिली हैं। मर्सी फॉर एनीमल की सदस्य शिवांगी ने बताया कि जानवरों की मौत के अलग-अलग कारण हो सकते हैं, जैसे गर्मी, सर्दी, ट्रैफिक शोर, दर्शकों की छेड़खानी और कैद में जीवन। कोई भी जानवर कैद में रहना नहीं चाहता, जो रुपये चिड़ियाघरों पर खर्च किया जा रहा है, उसे प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और जंगल में रहने वाले जानवरों की मदद पर खर्च किया जाना चाहिए।

जानवरों का असली घर जंगल : विशेषज्ञ
चांदनी चौक के श्री दिगंबर जैन लाल मंदिर स्थित पक्षियों के धर्मार्थ चिकित्सालय के डॉ. हरवतार सिंह का कहना है कि जानवरों का असली घर जंगल है। चिड़ियाघरों में आकर उन्हें सबकुछ बनावटी लगता है, जिससे उनकी मानसिक स्थिति बिगड़ती है और उदासी बढ़ती है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यदि चिड़ियाघरों में वन्यजीवों के रहने की शर्तें सुधारी नहीं गईं, तो भविष्य में और अधिक जानवरों की मौत का खतरा बढ़ सकता है। उनका कहना है कि प्राकृतिक आवास की सुरक्षा और कैद में रहने वाले जानवरों के मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना जरूरी है।

मरने वाले वन्यजीवों की संख्या

  • 2024-2025-127
  • 2023-2024-148
  • 2022-2023- 125
  • 2019-2020-172
  • 2018-2019-188
  • 2017-2018-75
  • 2016-2017-325

(नोट: केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण की रिपोर्ट के अनुसार)

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