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Master Plan Delhi-2047: लैंड पूलिंग को लगेंगे पंख, यमुना की भी होगी हदबंदी; डीडीए करेगा विकास के काम

Thu, 13 Aug 2026 02:14 AM IST
दुष्यंत शर्मा आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली
आदित्य पाण्डेय, नई दिल्ली Published by: दुष्यंत शर्मा Updated Thu, 13 Aug 2026 02:14 AM IST
सार

नीति में जमीन के बंटवारे का तरीका भी बदला गया है। कुल पूल की गई जमीन में 60 फीसदी हिस्सा डेवलपर को मिलेगा, जबकि 40 फीसदी डीडीए के पास रहेगा। डीडीए अपने हिस्से की 35 फीसदी जमीन पर सड़क, सीवेज और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं विकसित करेगा।

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Master Plan Delhi-2047: Land pooling to get a boost; Yamuna's boundaries to be demarcated.
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : ANI

विस्तार

मास्टर प्लान दिल्ली-2047 में बदलावों के बाद राजधानी में लैंड पूलिंग नीति को नई रफ्तार मिलने की उम्मीद है। अब 40 हेक्टेयर के बजाय 20 हेक्टेयर जमीन का समूह भी लैंड पूलिंग के दायरे में आ सकेगा। इससे छोटे भूखंडों के मालिकों के लिए जमीन को एक साथ लाकर आवासीय और अन्य योजनाबद्ध परियोजनाओं का रास्ता खुलेगा। खासकर बाहरी दिल्ली के उन इलाकों को इसका लाभ मिल सकता है, जहां बड़े भूखंड उपलब्ध नहीं हैं।

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नीति में जमीन के बंटवारे का तरीका भी बदला गया है। कुल पूल की गई जमीन में 60 फीसदी हिस्सा डेवलपर को मिलेगा, जबकि 40 फीसदी डीडीए के पास रहेगा। डीडीए अपने हिस्से की 35 फीसदी जमीन पर सड़क, सीवेज और अन्य सार्वजनिक सुविधाएं विकसित करेगा। शेष पांच फीसदी जमीन पर व्यावसायिक गतिविधियों की गुंजाइश होगी। इससे निजी विकास के साथ सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को भी एकीकृत तरीके से तैयार किया जा सकेगा।
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डेवलपर के साथ डीडीए भी करेगा विकास
लैंड पूलिंग में डीडीए की भूमिका सिर्फ जमीन लेने तक सीमित नहीं रहेगी। उसके हिस्से की जमीन का उपयोग सड़क, सीवेज और अन्य जरूरी सुविधाओं के विकास में किया जाएगा। पांच फीसदी जमीन पर व्यावसायिक गतिविधियां विकसित करने का प्रावधान भी है। इससे नए विकसित होने वाले क्षेत्रों में बुनियादी सुविधाओं और आर्थिक गतिविधियों को साथ बढ़ाने पर जोर रहेगा।
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टीओडी से परिवहन और आवास पर जोर
ट्रांजिट ओरिएंटेड डेवलपमेंट (टीओडी) के नियमों में भी बदलाव किया गया है। 2000 वर्गमीटर क्षेत्र को इसके दायरे में रखते हुए फ्लोर एरिया रेशियो (एफएआर) 500 से घटाकर 400 किया गया है। किफायती आवास में 65 फीसदी घर 60 वर्गमीटर क्षेत्रफल के होंगे। वहीं सोसाइटी की परिभाषा में बदलाव करते हुए 200 के बजाय 300 घरों वाली सोसाइटी को शामिल किया जा सकेगा। सार्वजनिक परिवहन के आसपास विकास को बढ़ावा देकर यातायात दबाव कम करने पर जोर है।

बाढ़ क्षेत्र की नई सीमा तय, 6295 हेक्टेयर में निर्माण पर रोक
मास्टर प्लान में यमुना के ओ-जोन और बाढ़ क्षेत्र की नई सीमा तय की गई है। दिल्ली में यमुना का कुल बाढ़ क्षेत्र 9934 हेक्टेयर निर्धारित किया गया है, जिसमें 6295 हेक्टेयर को सक्रिय बाढ़ क्षेत्र माना गया है। इस क्षेत्र में किसी भी तरह के निर्माण की अनुमति नहीं होगी। सक्रिय फ्लड एरिया के बाहर बचे फ्लड प्लेन में मनोरंजन से जुड़ी गतिविधियां विकसित की जा सकेंगी। यमुना रिवर फ्रंट पर करीब 52 किलोमीटर लंबा साइकिल ट्रैक विकसित करने की योजना है। इससे नदी किनारे हरित, पैदल और साइकिल आधारित गतिविधियों को बढ़ावा देने की कोशिश होगी।

विरासत वाली इमारतों और कम घनत्व वाले इलाकों को राहत
विरासत वाली इमारतों के संरक्षण के लिए एफएआर 50 करने का प्रावधान किया गया है। इससे इनके संरक्षण, सुधार और सुंदरीकरण के लिए सीमित विकास की अनुमति मिल सकेगी। वहीं कम घनत्व वाले क्षेत्रों को नियमित करने का रास्ता खुलने से लंबे समय से नियमन की प्रतीक्षा कर रहे इलाकों को राहत मिलने की उम्मीद है।

मेट्रो की रफ्तार से बदलेगा नरेला, डिपो के साथ खुलेंगे विकास के नए रास्ते
नरेला सब-सिटी के विकास को अब मेट्रो की रफ्तार मिलने की उम्मीद है। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) ने नरेला में 19.63 हेक्टेयर जमीन का लैंड यूज बदलकर परिवहन कर दिया है। इस जमीन पर रिठाला-नरेला-नाथूपुर (कुंडली) मेट्रो कॉरिडोर के डिपो का विकास किया जाएगा। इससे नरेला में मेट्रो की मौजूदगी केवल स्टेशन और लाइन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि पूरे कॉरिडोर के संचालन के लिए जरूरी बुनियादी ढांचा भी यहीं विकसित होगा।

नरेला लंबे समय से दिल्ली के नियोजित उपनगरों में शामिल होने के बावजूद अपेक्षित रफ्तार नहीं पकड़ सका है। डीडीए ने यहां बड़े पैमाने पर आवासीय विकास किया, सस्ती दरों पर फ्लैट और जमीन उपलब्ध कराई, लेकिन कमजोर सार्वजनिक परिवहन कनेक्टिविटी इसकी सबसे बड़ी बाधा बनी रही। डीडीए के दस्तावेजों में भी माना गया है कि परिवहन सुविधाओं की कमी के कारण नरेला की आवासीय योजनाओं को दूसरे उपनगरों की तरह अपेक्षित पसंद नहीं मिली।

ऐसे में मेट्रो कॉरिडोर और उसके डिपो के लिए जमीन का लैंड यूज बदलना नरेला के भविष्य के लिहाज से महत्वपूर्ण है। 26.463 किलोमीटर लंबे रिठाला-नरेला-नाथूपुर कॉरिडोर में 21 स्टेशन होंगे। यह रिठाला से नरेला होते हुए हरियाणा के कुंडली और नाथूपुर तक पहुंचेगा। इससे नरेला के साथ बवाना और उत्तर-पश्चिम दिल्ली के कई इलाकों को बेहतर कनेक्टिविटी मिलेगी। दिल्ली और हरियाणा के बीच संपर्क मजबूत होने के साथ सड़क नेटवर्क पर दबाव और कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मदद मिलने की उम्मीद है।

मेट्रो की सीधी कनेक्टिविटी नरेला के उन निवासियों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण होगी, जो नौकरी, कारोबार और पढ़ाई के लिए दिल्ली के दूसरे हिस्सों में रोजाना आते-जाते हैं। रिठाला और रोहिणी से सीधा संपर्क बनने के बाद यात्रा का समय और सार्वजनिक परिवहन पर निर्भर लोगों की परेशानी कम हो सकती है। यही बदलाव नरेला के आवासीय बाजार को भी नई मांग दे सकता है।

मेट्रो के साथ नरेला में शिक्षा और संस्थागत गतिविधियों के विस्तार की भी जमीन तैयार हो रही है। डीडीए ने विश्वविद्यालयों के लिए भूमि आवंटन से जुड़े फैसले किए हैं। 2026 में सात सरकारी विश्वविद्यालयों के लिए आवंटित जमीन की वित्तीय शर्तों को आसान करने का फैसला भी इसी दिशा में महत्वपूर्ण है। इससे नरेला में उच्च शिक्षा और उससे जुड़ी आर्थिक गतिविधियों के बढ़ने की संभावना है। आवास, मेट्रो, शिक्षा, रोजगार और बाजार के बीच बेहतर तालमेल बनने पर नरेला की पहचान केवल बाहरी दिल्ली के दूरस्थ आवासीय इलाके के रूप में नहीं, बल्कि एक नए शहरी केंद्र के रूप में विकसित हो सकती है।

डीडीए ने मकान तो बनाए...लेकिन रोहिणी, द्वारका जैसी सुविधाएं विकसित नहीं हो सकीं
नरेला की सबसे बड़ी समस्या यह रही है कि यहां घर तो बने, लेकिन उनके आसपास रोहिणी और द्वारका जैसे नियोजित उपनगरों के अनुरूप परिवहन और शहरी सुविधाएं विकसित नहीं हो सकीं। डीडीए ने कई वर्ष पहले यहां 25 हजार से अधिक फ्लैट तैयार किए थे और मेट्रो आने के बाद आवासीय तथा व्यावसायिक विकास में तेजी की उम्मीद जताई थी। पिछले वर्षों में डीडीए को नरेला के फ्लैट बेचने में भी चुनौती का सामना करना पड़ा। अब मेट्रो से रिठाला और रोहिणी तक सीधा संपर्क बनने पर नौकरीपेशा, कारोबारी और विद्यार्थियों के लिए नरेला में रहना अधिक सुविधाजनक हो सकता है। इससे खाली या कम आबादी वाले आवासीय क्षेत्रों में भी गतिविधियां बढ़ने की उम्मीद है।

पूर्वी दिल्ली का गाजीपुर बनेगा वेस्ट-टू-एनर्जी हब
पूर्वी दिल्ली में कचरा प्रबंधन को मजबूत करने के लिए डीडीए ने गाजीपुर के पॉकेट-सी (आईएफसी) में भूमि का लैंड यूज व्यावसायिक से यूटिलिटी करने की मंजूरी दी है। यहां वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट स्थापित किया जाएगा। पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए गाजीपुर के पॉकेट-बी (आईएफसी) में 752.51 वर्ग मीटर भूमि का उपयोग बदलकर मनोरंजन केंद्र और सामुदायिक पार्क विकसित करने की मंजूरी दी गई है।

दिल्ली के इन खास इलाकों में लैंड यूज बदलकर होगा ढांचागत सुधार
सरोजिनी नगर: आवासीय क्षेत्र के पास स्थित प्लॉट वाई की 24,400 वर्ग मीटर जमीन का उपयोग परिवहन (रेलवे सर्कुलेशन) से बदलकर आवासीय करने की मंजूरी दी गई है। इससे क्षेत्र में आवासीय विकास के विस्तार का रास्ता खुलेगा।

कॉपरनिकस लेन: नई दिल्ली क्षेत्र में भारतीय विद्या भवन को आवंटित बंगला नंबर 12, 14 और 16 के तीन भूखंडों का लैंड यूज आवासीय से सार्वजनिक एवं अर्ध-सार्वजनिक किया गया है। इससे यहां उच्च शिक्षा और भारतीय ज्ञान प्रणालियों से जुड़े शोध कार्यों के विस्तार की संभावना बढ़ेगी।

रोशनपुरा: वेटरनरी काउंसिल ऑफ इंडिया के मुख्यालय के लिए 7,978 वर्ग मीटर (1.97 एकड़) जमीन का लैंड यूज आवासीय से सार्वजनिक एवं अर्ध-सार्वजनिक करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई है।


केशोपुर-मंगोलपुरी: केशोपुर और मंगोलपुरी औद्योगिक क्षेत्र फेज-1 को विकास क्षेत्र के रूप में डिनोटिफाई किया गया है। इससे इन क्षेत्रों में नागरिक बुनियादी ढांचे, रखरखाव और स्थानीय निकायों की सेवाओं को व्यवस्थित करने में मदद मिलेगी।

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