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Noida News: जेवर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में ड्रग रेजिस्टेंस टीबी की हो रही है जांच
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यमुना सिटी (। जेवर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में टीबी की जांच और इलाज के लिए आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं। यहां टीबी की जांच माइक्रोस्कोपिक जांच और सीबीएनएएटी मशीन के माध्यम से की जा रही हैं। स्वास्थ्य कर्मियों के अनुसार सीबीएनएएटी मशीन से होने वाली जांच अधिक तेज और सटीक मानी जाती है। यह जांच मरीज के बलगम के नमूने से की जाती है। सीबीएनएएटी मशीन के माध्यम से होने वाली जांच पहले इस्तेमाल होने वाली ट्रूनेट तकनीक की तुलना में जल्दी प्रमाण देती है। यह मशीन गौतम बुद्ध नगर जिले में सिर्फ 4 से 5 सरकारी अस्पतालों में ही उपलब्ध है।
स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों के मुताबिक टीबी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है। पहली डीएसटीबी (ड्रग सेंसिटिव टीबी) होती है, जिसका इलाज सीधे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से ही शुरू कर दिया जाता है। दूसरी डीआरटीबी (ड्रग रेसिस्टेंस टीबी) होती है, जिसमें दवाओं का असर सामान्य से अलग होता है और इलाज थोड़ा जटिल होता है। ऐसे मरीजों को पहले गवर्नमेंट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस अस्पताल भेजा जाता है, जहां उन्हें एक दिन के लिए भर्ती कर डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाता है। इस दौरान यह देखा जाता है कि टीबी की दवाओं का मरीज के दिल या शरीर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा, क्योंकि डीआरटीबी की दवाएं अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी और कड़ी होती हैं।
टीबी के प्रमुख लक्षणों में दो सप्ताह से अधिक समय तक खांसी रहना, बुखार आना, वजन कम होना, रात में पसीना आना और पेट में दर्द शामिल हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यदि समय पर जांच और इलाज शुरू हो जाए तो 6 महीने से 9 दो साल की दवा से मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है। इसके अलावा फेफड़ों के बाहर पानी जमा होने वाली टीबी की जांच की सुविधा भी जेवर पीएचसी में उपलब्ध है। स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि यदि टीबी के लक्षण दिखाई दें तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर जांच कराएं, ताकि समय रहते इलाज शुरू किया जा सके।
- सीबीएनएएटी मशीन पूरे जिले में सिर्फ 4-5 सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध है, मरीजों के बलगम की जांच करके टीबी का पाता लगाया जाता है।
डॉ सरफे जया, जेवर सीएचसी अधीक्षक
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पुनीत कुमार
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स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों के मुताबिक टीबी मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है। पहली डीएसटीबी (ड्रग सेंसिटिव टीबी) होती है, जिसका इलाज सीधे प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र से ही शुरू कर दिया जाता है। दूसरी डीआरटीबी (ड्रग रेसिस्टेंस टीबी) होती है, जिसमें दवाओं का असर सामान्य से अलग होता है और इलाज थोड़ा जटिल होता है। ऐसे मरीजों को पहले गवर्नमेंट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस अस्पताल भेजा जाता है, जहां उन्हें एक दिन के लिए भर्ती कर डॉक्टरों की निगरानी में रखा जाता है। इस दौरान यह देखा जाता है कि टीबी की दवाओं का मरीज के दिल या शरीर पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं पड़ रहा, क्योंकि डीआरटीबी की दवाएं अपेक्षाकृत अधिक प्रभावी और कड़ी होती हैं।
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टीबी के प्रमुख लक्षणों में दो सप्ताह से अधिक समय तक खांसी रहना, बुखार आना, वजन कम होना, रात में पसीना आना और पेट में दर्द शामिल हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यदि समय पर जांच और इलाज शुरू हो जाए तो 6 महीने से 9 दो साल की दवा से मरीज पूरी तरह ठीक हो सकता है। इसके अलावा फेफड़ों के बाहर पानी जमा होने वाली टीबी की जांच की सुविधा भी जेवर पीएचसी में उपलब्ध है। स्वास्थ्य विभाग ने लोगों से अपील की है कि यदि टीबी के लक्षण दिखाई दें तो तुरंत नजदीकी स्वास्थ्य केंद्र पर जाकर जांच कराएं, ताकि समय रहते इलाज शुरू किया जा सके।
- सीबीएनएएटी मशीन पूरे जिले में सिर्फ 4-5 सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध है, मरीजों के बलगम की जांच करके टीबी का पाता लगाया जाता है।
डॉ सरफे जया, जेवर सीएचसी अधीक्षक
पुनीत कुमार