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Noida News: पीढ़ियों का अनूठा जुड़ाव... सास, बहु और तीज

Mon, 03 Aug 2026 06:09 PM IST
Noida Bureau नोएडा ब्यूरो
Updated Mon, 03 Aug 2026 06:09 PM IST
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A unique bond across generations... mother-in-law, daughter-in-law, and Teej.
रिश्तों की मजबूती का त्योहार है तीज, रीति रिवाज वही, बस बदला उत्सव का अंदाज
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संवाद न्यूज एजेंसी
नोएडा। समय के साथ बदलते समाज का असर हमारे त्योहारों पर भी साफ दिखने लगा है, और इसका सबसे सुंदर उदाहरण हरियाली तीज का उत्सव है। जहां एक ओर पहले की पीढ़ी इस पर्व को पूरी तरह पारंपरिक रीति-रिवाजों, कठिन निर्जला व्रत और घर-परिवार की चौखट तक सीमित रखती थी, वहीं आज की नई पीढ़ी परंपरा और आधुनिकता के अनोखे तरीकों के साथ इसे मना रही है।
आधुनिक परिधानों, ट्रेंडी मेहंदी, सोसाइटियों की थीम पार्टीज और सोशल मीडिया रील्स के इस दौर में उत्सव का रंग-रूप भले ही बदल गया हो, लेकिन इसका मूल उद्देश्य आज भी परंपरागत है। दोनों पीढ़ियों का मानना है कि तीज का असली सार रिश्तों की मजबूती और परिवार की खुशहाली में है। आज भी कई घरों में यह परंपरा सदियों पुराने मूल्यों को संजोए हुए है, जो बदलते वक्त में भी समाज को परिवार की डोर से बांधे रखती है।
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सोशल मीडिया ने त्योहार को नया रूप दिया
हमारे समय में तीज कई दिन पहले से शुरू हो जाती थी। महिलाएं घर पर ही गीत गाती थीं, झूले पड़ते थे और पूरा परिवार साथ बैठकर त्योहार मनाता था। उस समय दिखावे से ज्यादा परंपरा और आस्था को महत्व दिया जाता था। - कर्मवती, सलारपुर
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आज भी मैं व्रत रखती हूं और पूजा करती हूं, लेकिन तरीका थोड़ा बदल गया है। अपनी दोनों बहुओं के साथ मिलकर ऑनलाइन खरीदारी और सोशल मीडिया ने त्योहार को नया रूप दिया है, लेकिन इसकी भावना वही है। -ज्योति शर्मा, सेक्टर-50
हम आधुनिक हैं, लेकिन अपनी संस्कृति से जुड़े रहना भी जरूरी मानते हैं। तीज पर पारंपरिक साड़ी या लहंगा पहनते हैं। अब त्योहार को यादगार बनाने के लिए फोटो, वीडियो और सोशल मीडिया भी इसका हिस्सा बन गए हैं। -पूर्णिमा, सेक्टर-63
हर साल तीज हो या करवाचौथ हम सब एक साथ खरीदारी करते हैं। मेरी दोनों बहुओं के साथ मैं भी आजकल के रीति रिवाज में पूजा करती हूं। सुंदर कपड़े पहनकर निकलते हैं। सेक्टर में पार्टी आयोजित होती है वहां शामिल होती हूं। मुन्नी, सेक्टर-12 निवासी

पहले महिलाएं अपने हाथों से घेवर, मिठाइयां और पूजा की थाली तैयार करती थीं। अब ज्यादातर सामान बाजार से आ जाता है। सुविधाएं बढ़ी हैं, लेकिन पहले जैसी सामूहिकता और अपनापन कुछ कम हुआ है। - सुनीत शर्मा, सेक्टर-12
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