ग्रेटर नोएडा: ईसीएचएस कार्ड से फर्जी इलाज कराने वाले गिरोह का पर्दाफाश, पुलिस ने चार आरोपियों को किया गिरफ्तार
मामले का खुलासा तब हुआ जब जांच में सामने आया कि आरोपियों ने अलीगढ़ निवासी एक व्यक्ति की बेटी शालिनी के ईसीएचएस कार्ड और आधार कार्ड का फर्जी तरीके से इस्तेमाल किया। इस कार्ड के जरिए गाजियाबाद की रहने वाली तनु नाम की महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया। तनु को 29 जुलाई 2025 को शालिनी के नाम से भर्ती कराया गया और उसका इलाज शुरू हुआ। इलाज के दौरान करीब 6 लाख 50 हजार रुपये का खर्च आया।
विस्तार
ग्रेटर नोएडा के थाना बिसरख पुलिस ने फर्जी तरीके से ईसीएचएस( पूर्व-सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना) कार्ड का इस्तेमाल कर अस्पतालों में इलाज कराने वाले एक संगठित गिरोह का मंगलवार को पर्दाफाश किया है। पुलिस ने इस मामले में तीन पुरुष और एक महिला आरोपी को गिरफ्तार किया है। आरोपियों के कब्जे से एक आईफोन-15 मोबाइल, व्हाट्सएप के जरिए इस्तेमाल किए गए फर्जी ईसीएचएस कार्ड और आधार कार्ड के दस्तावेज बरामद किए गए हैं।
डीसीपी सेंट्रल नोएडा शक्ति मोहन अवस्थी ने बताया कि यह गिरोह पिछले करीब दो वर्षों से सक्रिय था और ऐसे लोगों को निशाना बनाता था जो इलाज का खर्च वहन करने में असमर्थ होते थे। गिरोह उन्हें दूसरे व्यक्तियों के नाम और कार्ड पर अस्पताल में भर्ती कराकर लाखों रुपये का इलाज मुफ्त में कराता था और इसके बदले मोटी रकम वसूलता था।
फर्जी नाम से कराया गया इलाज, मरीज की मौत के बाद भी खेल जारी
मामले का खुलासा तब हुआ जब जांच में सामने आया कि आरोपियों ने अलीगढ़ निवासी एक व्यक्ति की बेटी शालिनी के ईसीएचएस कार्ड और आधार कार्ड का फर्जी तरीके से इस्तेमाल किया। इस कार्ड के जरिए गाजियाबाद की रहने वाली तनु नाम की महिला को अस्पताल में भर्ती कराया गया। तनु को 29 जुलाई 2025 को शालिनी के नाम से भर्ती कराया गया और उसका इलाज शुरू हुआ। इलाज के दौरान करीब 6 लाख 50 हजार रुपये का खर्च आया, जिसे आरोपियों ने बचा लिया। हालांकि, 5 अगस्त 2025 को इलाज के दौरान तनु की मौत हो गई। चौंकाने वाली बात यह रही कि मौत के बाद भी आरोपियों ने अस्पताल में असली पहचान छिपाए रखी और शालिनी के नाम पर ही डेथ सर्टिफिकेट लगवाकर शव प्राप्त कर लिया।
व्हाट्सएप के जरिए भेजे जाते थे फर्जी दस्तावेज
एसीपी सेंट्रल नोएडा पवन कुमार ने बताया कि पूछताछ में मुख्य आरोपी शिखा सिंह ने बताया कि उसकी बहन तनु लंबे समय से बीमार थी और आर्थिक तंगी के कारण इलाज संभव नहीं हो पा रहा था। इसी दौरान उसकी एक परिचित ने उसे दानिश खान से मिलवाया। दानिश खान ने भरोसा दिलाया कि वह कम पैसों में अच्छे अस्पताल में इलाज करवा देगा, लेकिन इसके लिए मरीज का नाम बदलकर किसी और के दस्तावेज पर भर्ती कराना होगा। इसके बाद दानिश ने व्हाट्सएप पर शालिनी का ईसीएचएस कार्ड और आधार कार्ड भेजा, जिसका इस्तेमाल कर तनु को अस्पताल में भर्ती कराया गया। शिखा ने बताया कि इस काम के बदले उसने दानिश को करीब 65 हजार रुपये ऑनलाइन ट्रांसफर किए और कुछ रकम नकद दी।
गिरोह का नेटवर्क और काम करने का तरीका
पुलिस जांच में सामने आया कि यह गिरोह सुनियोजित तरीके से काम करता था। गिरोह के सदस्य पहले ऐसे लोगों की तलाश करते थे जो इलाज का खर्च नहीं उठा सकते। इसके बाद उन्हें लालच देकर फर्जी नाम और दस्तावेजों के जरिए अस्पताल में भर्ती कराया जाता था।
गिरोह का मास्टरमाइंड दानिश खान और उसका साथी प्रदीप बताया जा रहा है, जो फर्जी ईसीएचएस कार्ड और आधार कार्ड का इंतजाम करते थे। अस्पतालों में अपनी सेटिंग के चलते ये बिना मूल दस्तावेजों की जांच के मरीजों को भर्ती करा देते थे। दानिश ने पूछताछ में बताया कि वह और उसका साथी प्रदीप पिछले दो वर्षों से इस तरह की ठगी कर रहे हैं। दोनों पहले भी इसी तरह के मामले में नोएडा फेस-2 थाना क्षेत्र से जेल जा चुके हैं, लेकिन जमानत पर छूटने के बाद फिर से इस अवैध धंधे में लग गए।
चार आरोपी गिरफ्तार, एक की तलाश जारी, पहले भी दर्ज हैं मुकदमे
एडीसीपी सेंट्रल नोएडा आरके गौतम ने बताया कि पुलिस ने इस मामले में दानिश खान (22 वर्ष), शिखा सिंह (25 वर्ष), यश सिंह (20 वर्ष) और जितेंद्र यादव (31 वर्ष) को गिरफ्तार किया है। वहीं, गिरोह का एक अन्य सदस्य प्रदीप अभी फरार है, जिसकी गिरफ्तारी के लिए पुलिस टीम गठित कर दबिश दे रही है। गिरफ्तार आरोपियों के पास से घटना में इस्तेमाल किया गया एप्पल आईफोन-15 बरामद हुआ है। इसी मोबाइल के जरिए व्हाट्सएप पर फर्जी ईसीएचएस कार्ड और आधार कार्ड भेजे गए थे। पुलिस को मोबाइल से कई अहम डिजिटल साक्ष्य भी मिले हैं, जिनके आधार पर गिरोह के अन्य सदस्यों और मामलों की जांच की जा रही है। मुख्य आरोपी दानिश खान के खिलाफ पहले से भी धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र के मामले दर्ज हैं। वर्ष 2025 में नोएडा फेस-2 थाना क्षेत्र में भी उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ था। इसके अलावा वर्ष 2026 में बिसरख थाना क्षेत्र में भी इसी तरह के अपराध में मामला दर्ज है। यह एक बड़ा संगठित रैकेट हो सकता है, जिसमें अस्पताल कर्मियों की भूमिका भी संदिग्ध है। पुलिस अब इस बात की भी जांच कर रही है कि किन-किन अस्पतालों में इस तरह से फर्जी नामों पर मरीजों को भर्ती कराया गया और कितने लोगों को इस गिरोह ने अपना शिकार बनाया है।