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Noida News: होमवर्क बच्चों का, पूरा करने में जुटे माता-पिता
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अभिभावक बोले- ग्रीष्मावकाश गृह कार्य बच्चों की उम्र के हिसाब से नहीं
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। गर्मियों की छुट्टियां शुरू हो गईं हैं। बच्चों को स्कूल से ग्रीष्मावकाश कार्य भी मिल चुका है लेकिन यह बच्चों की उम्र और उनकी क्लास के अनुरूप नहीं। एक्ट्रा करिकुलर एक्टिवटीज के नाम पर जो प्रोजेक्ट्स बच्चों को करने के लिए दिए गए हैं, असल में बच्चा उन्हें अकेला पूरा ही नहीं कर सकता। ऐसे में यह ग्रीष्मावकाश कार्य बच्चों के लिए ही नहीं, उनके माता-पिता के लिए भी सिरदर्दी बना हुआ है। कई बच्चों के अभिभावक नौकरीपेशा हैं। या तो वे समय निकालकर खुद इन प्रोजेक्ट्स को पूरा करवा रहे हैं या फिर पैसा देकर बाजार से प्रोजेक्ट्स बनवा रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि जब माता-पिता को ही काम पूरा करना है या बाहर से प्रोजेक्ट बनवाना है तो फिर ग्रीष्मावकाश कार्य देने का क्या ही मतलब बनता है। शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को ऐसी एक्टिविटीज दें, जो वे खुद कर सकें।
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वेस्ट मटेरियल से कलाकृति बनाने को दी
सेक्टर- 62 में रहने वाली खूश्बू पांडेय ने बताया कि उनका बेटा एलकेजी में है। गर्मियों की छुट्टियों में उसे वेस्ट मटेरियल से कलाकृति बनाने का प्रोजेक्ट दिया गया है। इसके अलावा चार्ट, स्क्रैप बुक, वीडियो रिकॉर्डिंग और तमाम गतिविधियों पर आधारित प्रोजेक्ट भी दे दिए हैं। इतना कैसे एक बच्चा कर पाएगा। मैं खुद से अब उसके प्राेजेक्ट्स कर रही हूं, ताकि काम पूरा होने के बाद बाहर घूमने का प्लान बनाया जा सके।
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पत्तियों से जानवरों की कलाकृतियां प्रोजेक्ट का हिस्सा
सेक्टर-52 निवासी कृष्णा दुबे ने बताया कि उनका बेटा एलकेजी में पढ़ता है। ग्रीष्मावकाश कार्य में उसे पत्तियों से अलग-अलग जानवरों की कलाकृतियां बनाने को दी गईं हैं। इसके अलावा होमवर्क में कविताओं की रिकॉर्डिंग, चिड़ियों के लिए घोंसला बनाने, अपनी दिनचर्या बताते हुए चार्ट तैयार करने सरीखे प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। इनमें से अधिकांश काम ऐसा है, जिसे बच्चा पूरा नहीं कर सकता। ऐसे में पूरा परिवार बच्चे के प्रोजेक्ट्स तैयार करने में जुटा हुआ है।
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अभिभावक नौकरीपेशा, मजबूरन बाहर से करवाया काम
अभिभावक रेनू चतुर्वेदी ने बताया कि हम दोनों कामकाजी हैं। बच्चे का प्रोजेक्ट करना हम लोगाें के लिए और भी मुश्किल हो रहा है। इसलिए मजबूरी में बाहर से उसे तैयार करवाना पड़ रहा है। इसलिए अभी से प्रोजेक्ट बनने के लिए दे दिए हैं, क्योंकि आखिरी समय में प्रोजेक्ट देने पर समय पर दुकानदार नहीं दे पाते। रेनू ने कहा कि जब बच्चों के प्रोजेक्ट्स बाहर से ही तैयार कराने पड़ें तो क्या ही फायदा।
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अभिभावक बाजार से तैयार करा रहे प्रोजेक्ट
जिन प्रोजेक्ट्स को करना मां-बाप के बस की भी बात नहीं, उन्हें वे बाजार से तैयार करा रहे हैं। स्टेशनरी दुकानों के पास स्कूलों की विभिन्न कक्षाओं की प्रोजेक्ट लिस्ट हैं। बस अभिभावकों को जाकर कक्षा और स्कूल बताना है उसके बाद प्रोजेक्ट के आकार के अनुसार, 500 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक में पूरा प्रोजेक्ट तैयार कर दिया जा रहा है। अभिभावक कहते हैं कि ऐसा करना उनकी मजबूर है।
माई सिटी रिपोर्टर
नोएडा। गर्मियों की छुट्टियां शुरू हो गईं हैं। बच्चों को स्कूल से ग्रीष्मावकाश कार्य भी मिल चुका है लेकिन यह बच्चों की उम्र और उनकी क्लास के अनुरूप नहीं। एक्ट्रा करिकुलर एक्टिवटीज के नाम पर जो प्रोजेक्ट्स बच्चों को करने के लिए दिए गए हैं, असल में बच्चा उन्हें अकेला पूरा ही नहीं कर सकता। ऐसे में यह ग्रीष्मावकाश कार्य बच्चों के लिए ही नहीं, उनके माता-पिता के लिए भी सिरदर्दी बना हुआ है। कई बच्चों के अभिभावक नौकरीपेशा हैं। या तो वे समय निकालकर खुद इन प्रोजेक्ट्स को पूरा करवा रहे हैं या फिर पैसा देकर बाजार से प्रोजेक्ट्स बनवा रहे हैं। अभिभावकों का कहना है कि जब माता-पिता को ही काम पूरा करना है या बाहर से प्रोजेक्ट बनवाना है तो फिर ग्रीष्मावकाश कार्य देने का क्या ही मतलब बनता है। शिक्षकों को चाहिए कि वे बच्चों को ऐसी एक्टिविटीज दें, जो वे खुद कर सकें।
वेस्ट मटेरियल से कलाकृति बनाने को दी
सेक्टर- 62 में रहने वाली खूश्बू पांडेय ने बताया कि उनका बेटा एलकेजी में है। गर्मियों की छुट्टियों में उसे वेस्ट मटेरियल से कलाकृति बनाने का प्रोजेक्ट दिया गया है। इसके अलावा चार्ट, स्क्रैप बुक, वीडियो रिकॉर्डिंग और तमाम गतिविधियों पर आधारित प्रोजेक्ट भी दे दिए हैं। इतना कैसे एक बच्चा कर पाएगा। मैं खुद से अब उसके प्राेजेक्ट्स कर रही हूं, ताकि काम पूरा होने के बाद बाहर घूमने का प्लान बनाया जा सके।
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पत्तियों से जानवरों की कलाकृतियां प्रोजेक्ट का हिस्सा
सेक्टर-52 निवासी कृष्णा दुबे ने बताया कि उनका बेटा एलकेजी में पढ़ता है। ग्रीष्मावकाश कार्य में उसे पत्तियों से अलग-अलग जानवरों की कलाकृतियां बनाने को दी गईं हैं। इसके अलावा होमवर्क में कविताओं की रिकॉर्डिंग, चिड़ियों के लिए घोंसला बनाने, अपनी दिनचर्या बताते हुए चार्ट तैयार करने सरीखे प्रोजेक्ट्स शामिल हैं। इनमें से अधिकांश काम ऐसा है, जिसे बच्चा पूरा नहीं कर सकता। ऐसे में पूरा परिवार बच्चे के प्रोजेक्ट्स तैयार करने में जुटा हुआ है।
अभिभावक नौकरीपेशा, मजबूरन बाहर से करवाया काम
अभिभावक रेनू चतुर्वेदी ने बताया कि हम दोनों कामकाजी हैं। बच्चे का प्रोजेक्ट करना हम लोगाें के लिए और भी मुश्किल हो रहा है। इसलिए मजबूरी में बाहर से उसे तैयार करवाना पड़ रहा है। इसलिए अभी से प्रोजेक्ट बनने के लिए दे दिए हैं, क्योंकि आखिरी समय में प्रोजेक्ट देने पर समय पर दुकानदार नहीं दे पाते। रेनू ने कहा कि जब बच्चों के प्रोजेक्ट्स बाहर से ही तैयार कराने पड़ें तो क्या ही फायदा।
अभिभावक बाजार से तैयार करा रहे प्रोजेक्ट
जिन प्रोजेक्ट्स को करना मां-बाप के बस की भी बात नहीं, उन्हें वे बाजार से तैयार करा रहे हैं। स्टेशनरी दुकानों के पास स्कूलों की विभिन्न कक्षाओं की प्रोजेक्ट लिस्ट हैं। बस अभिभावकों को जाकर कक्षा और स्कूल बताना है उसके बाद प्रोजेक्ट के आकार के अनुसार, 500 रुपये से लेकर 2000 रुपये तक में पूरा प्रोजेक्ट तैयार कर दिया जा रहा है। अभिभावक कहते हैं कि ऐसा करना उनकी मजबूर है।