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Noida News: अपंजीकृत प्रोजेक्टों के खरीदारों का भी दर्द सुनेगा यूपी रेरा
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अपंजीकृत प्रोजेक्टों के खरीदारों का भी दर्द सुनेगा यूपी रेरा
-यूपी रेरा ने अपने सामान्य विनियम 2019 में 10वां संशोधन किया, लाखों लोगों को मिलेगा फायदा
-अब मूल आवंटी के उत्तराधिकारी से प्रोसेसिंग फीस के रूप में केवल 1000 रुपये ले सकेगा बिल्डर
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। उत्तर प्रदेश भूसंपदा विनियामक प्राधिकरण अब अपंजीकृत प्रोजेक्टों के खरीदारों का दर्द भी सुनेगा। इसके लिए यूपी रेरा ने अपने सामान्य विनियम 2019 में 10वां संशोधन किया है। ताकि खरीदारों को इधर-उधर भटकना न पड़े। हालांकि यूपी रेरा ने कहा है कि इन प्रोजेक्टों के खरीदारों को बिल्डर से जुड़ी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। पहले यूपी रेरा प्रोजेक्ट के पंजीकरण कराने का प्रयास करेगा। वहीं यूपी रेरा ने प्रोसेसिंग फीस को भी निर्धारित कर दिया है। उससे ज्यादा बिल्डर धनराशि नहीं मांग सकेंगे।
यूपी रेरा के अफसरों ने बताया कि यह संशोधन रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 (रेरा अधिनियम) की धारा-85 में किया गया है। जो 25 मार्च, 2026 से प्रभावी हो गए हैं। यूपी रेरा ने विनियम 24 और 47 में संशोधन किया है। विनियम-24 में तीन नए उपबंधों को शामिल किया गया है। जो प्रोजेक्ट यूपी रेरा में पंजीकृत नहीं है, उनके खरीदार यूपी रेरा में शिकायत कर सकते हैं। बदलाव में नियमों को स्पष्ट कर दिया गया है। यूपी रेरा की पीठ निर्धारित प्रक्रिया के तहत सुना जाएगा। सुनवाइ के दौरान देखा जाएगा कि प्रोजेक्ट को अधिनियम की धारा-3 और यूपी रेरा नियमावली के नियम-2(वन)(एच) के तहत पंजीकरण से छूट प्राप्त है या नहीं है। इस सवाल का निर्णय होने के बाद अगर कोई राहत दे जा सकती है तो वह दी जाएगी।
अफसरों ने बताया कि अपंजीकृत प्रोजेक्टों की जानकारी यूपी रेरा के पास नहीं होगी, ऐसे में खरीदारों को प्रोजेक्ट के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। जल्द ही यूपी रेरा एक आदेश जारी करेगा। जिसमें यूपी रेरा पोर्टल पर ऐसी सुविधा दी जाएगी, जिसमें खरीदार फॉर्म-एम के माध्यम से अपनी शिकायत दर्ज कर सकेंगे। पीठ सबसे पहले प्रोजेक्ट के पंजीकरण पर निर्णय करेगी। अगर प्रोजेक्ट पंजीकरण होने लायक है तो फिर उसका पंजीकरण कराया जाएगा।
नाम चढ़वाने के नाम पर नहीं वसूल सकेंगे अधिक पैसा: यूपी रेरा ने मूल खरीदार की मौत के बाद उत्तराधिकारी का नाम चढ़वाने के नाम पर वसूली करने वाले बिल्डरों पर भी नकेल कसी है। यूपी रेरा के अफसरों ने बताया कि अगर खरीदार की मौत हो जाती है और उत्तराधिकारी परिवार का सदस्य है तो बिल्डर केवल 1000 रुपये की प्रोसेसिंग फीस ले सकेगा। अभी तक बिल्डर 50 हजार रुपये तक मांगते है। उत्तराधिकारी को मृत्यु प्रमाण पत्र, सक्षम प्राधिकारी की तरफ से जारी उत्तराधिकार प्रमाण पत्र व अन्य विधिक वारिसों की एनओसी जैसे दस्तावेज देने होंगे। वहीं अगर संपत्ति परिवार के सदस्य के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के नाम होती है तो तब बिल्डर केवल 25000 रुपये प्रोसेसिंग फीस ले सकता है। अभी बिल्डर एक से दो लाख तक वसूल रहे है। अफसरों ने बताया कि इन मामलों में नया विक्रय या लीज अनुबंध नहीं किया जाएगा। इसके स्थान पर मौजूदा अनुबंध में अनुमोदन के रूप में आवश्यक परिवर्तन दर्ज किए जाएंगे।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर :
इस विकास पर प्रतिक्रिया देते हुए यूपी रेरा के अध्यक्ष श्री संजय भूसरेड्डी ने कहा कि यह संशोधन रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने और आवंटियों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से किया गया है। यूपी रेरा का यह कदम विशेष रूप से अपंजीकृत परियोजनाओं और डेवलपर्स द्वारा मनमाने शुल्क वसूलने से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दों के समाधान की दिशा में एक सक्रिय पहल के रूप में देखा जा रहा है।
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-यूपी रेरा ने अपने सामान्य विनियम 2019 में 10वां संशोधन किया, लाखों लोगों को मिलेगा फायदा
-अब मूल आवंटी के उत्तराधिकारी से प्रोसेसिंग फीस के रूप में केवल 1000 रुपये ले सकेगा बिल्डर
माई सिटी रिपोर्टर
ग्रेटर नोएडा। उत्तर प्रदेश भूसंपदा विनियामक प्राधिकरण अब अपंजीकृत प्रोजेक्टों के खरीदारों का दर्द भी सुनेगा। इसके लिए यूपी रेरा ने अपने सामान्य विनियम 2019 में 10वां संशोधन किया है। ताकि खरीदारों को इधर-उधर भटकना न पड़े। हालांकि यूपी रेरा ने कहा है कि इन प्रोजेक्टों के खरीदारों को बिल्डर से जुड़ी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। पहले यूपी रेरा प्रोजेक्ट के पंजीकरण कराने का प्रयास करेगा। वहीं यूपी रेरा ने प्रोसेसिंग फीस को भी निर्धारित कर दिया है। उससे ज्यादा बिल्डर धनराशि नहीं मांग सकेंगे।
यूपी रेरा के अफसरों ने बताया कि यह संशोधन रियल एस्टेट (विनियमन एवं विकास) अधिनियम, 2016 (रेरा अधिनियम) की धारा-85 में किया गया है। जो 25 मार्च, 2026 से प्रभावी हो गए हैं। यूपी रेरा ने विनियम 24 और 47 में संशोधन किया है। विनियम-24 में तीन नए उपबंधों को शामिल किया गया है। जो प्रोजेक्ट यूपी रेरा में पंजीकृत नहीं है, उनके खरीदार यूपी रेरा में शिकायत कर सकते हैं। बदलाव में नियमों को स्पष्ट कर दिया गया है। यूपी रेरा की पीठ निर्धारित प्रक्रिया के तहत सुना जाएगा। सुनवाइ के दौरान देखा जाएगा कि प्रोजेक्ट को अधिनियम की धारा-3 और यूपी रेरा नियमावली के नियम-2(वन)(एच) के तहत पंजीकरण से छूट प्राप्त है या नहीं है। इस सवाल का निर्णय होने के बाद अगर कोई राहत दे जा सकती है तो वह दी जाएगी।
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अफसरों ने बताया कि अपंजीकृत प्रोजेक्टों की जानकारी यूपी रेरा के पास नहीं होगी, ऐसे में खरीदारों को प्रोजेक्ट के बारे में पूरी जानकारी उपलब्ध करानी होगी। जल्द ही यूपी रेरा एक आदेश जारी करेगा। जिसमें यूपी रेरा पोर्टल पर ऐसी सुविधा दी जाएगी, जिसमें खरीदार फॉर्म-एम के माध्यम से अपनी शिकायत दर्ज कर सकेंगे। पीठ सबसे पहले प्रोजेक्ट के पंजीकरण पर निर्णय करेगी। अगर प्रोजेक्ट पंजीकरण होने लायक है तो फिर उसका पंजीकरण कराया जाएगा।
नाम चढ़वाने के नाम पर नहीं वसूल सकेंगे अधिक पैसा: यूपी रेरा ने मूल खरीदार की मौत के बाद उत्तराधिकारी का नाम चढ़वाने के नाम पर वसूली करने वाले बिल्डरों पर भी नकेल कसी है। यूपी रेरा के अफसरों ने बताया कि अगर खरीदार की मौत हो जाती है और उत्तराधिकारी परिवार का सदस्य है तो बिल्डर केवल 1000 रुपये की प्रोसेसिंग फीस ले सकेगा। अभी तक बिल्डर 50 हजार रुपये तक मांगते है। उत्तराधिकारी को मृत्यु प्रमाण पत्र, सक्षम प्राधिकारी की तरफ से जारी उत्तराधिकार प्रमाण पत्र व अन्य विधिक वारिसों की एनओसी जैसे दस्तावेज देने होंगे। वहीं अगर संपत्ति परिवार के सदस्य के अलावा किसी अन्य व्यक्ति के नाम होती है तो तब बिल्डर केवल 25000 रुपये प्रोसेसिंग फीस ले सकता है। अभी बिल्डर एक से दो लाख तक वसूल रहे है। अफसरों ने बताया कि इन मामलों में नया विक्रय या लीज अनुबंध नहीं किया जाएगा। इसके स्थान पर मौजूदा अनुबंध में अनुमोदन के रूप में आवश्यक परिवर्तन दर्ज किए जाएंगे।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर :
इस विकास पर प्रतिक्रिया देते हुए यूपी रेरा के अध्यक्ष श्री संजय भूसरेड्डी ने कहा कि यह संशोधन रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने और आवंटियों के हितों की रक्षा के उद्देश्य से किया गया है। यूपी रेरा का यह कदम विशेष रूप से अपंजीकृत परियोजनाओं और डेवलपर्स द्वारा मनमाने शुल्क वसूलने से जुड़े लंबे समय से लंबित मुद्दों के समाधान की दिशा में एक सक्रिय पहल के रूप में देखा जा रहा है।