Online Gaming: मोबाइल की लत पर तकनीक लगा सकती है लगाम, उससे भी जरूरी है बच्चों को अकेलेपन से बाहर निकालना
विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते संवाद, भावनात्मक जुड़ाव और तकनीक के संतुलित इस्तेमाल से इस खतरनाक लत को रोका जा सकता है। बच्चों को मोबाइल से नहीं, अकेलेपन से बाहर निकालना ही इस त्रासदी से सीख लेने का सबसे बड़ा समाधान है। तकनीक के सही इस्तेमाल से भी की इस लत पर काबू पाया जा सकता है।
विस्तार
गाजियाबाद में मोबाइल छीनने से नाराज तीन मासूम बेटियों की आत्महत्या ने पूरे एनसीआर को भीतर तक हिला दिया है। यह सिर्फ एक दुखद घटना नहीं, बल्कि उन अनसुने सवालों की चीख है, जिनसे आज हर घर के बच्चे जूझ रहे हैं। न्यूक्लियर फैमिली और भागदौड़ भरी जिंदगी में माता-पिता का समय कम होता जा रहा है, जबकि बच्चों की दुनिया मोबाइल और ऑनलाइन गेम्स तक सिमटती जा रही है।
नतीजतन पढ़ाई से दूरी, चिड़चिड़ापन, नींद की कमी और सामाजिक रिश्तों से कटाव। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते संवाद, भावनात्मक जुड़ाव और तकनीक के संतुलित इस्तेमाल से इस खतरनाक लत को रोका जा सकता है। बच्चों को मोबाइल से नहीं, अकेलेपन से बाहर निकालना ही इस त्रासदी से सीख लेने का सबसे बड़ा समाधान है। तकनीक के सही इस्तेमाल से भी की इस लत पर काबू पाया जा सकता है।
एक घंटे बाद अपने-आप लॉक हो जाएगा मोबाइल
स्मार्टफोन में मौजूद गूगल फैमिली लिंक के जरिये पैरेंटल कंट्रोल और स्क्रीन टाइम जैसी सेटिंग्स के जरिये बच्चों के मोबाइल टाइम को कम किया जा सकता है। एनरॉयड और आईफोन दोनों प्लेटफॉर्म पर ऐसी सेटिंग्स मौजूद हैं। तय समय जैसे ही पूरा होता है, मोबाइल अपने-आप लॉक हो जाता है और बिना पासकोड के दोबारा नहीं खुलता। बच्चा आपकी मर्जी के बिना अपने फोन में कुछ डाउनलोड भी नहीं कर सकेगा। इसके लिए पहले आपके पास एप्रूवल का मैसेज जाएगा। गूगल फैमिली लिंक में सेफ सर्च लगाते ही अनाधिकृत वेबसाइड भी बच्चा नहीं खोल सकेगा।
एनरॉयड यूजर्स के लिए
गूगल फैमिली लिंक पर जाएं, बच्चों के फोन के लिए सबसे प्रभावी टूल है। इसके जरिये माता-पिता रोजाना स्क्रीन टाइम तय कर सकते हैं। समय पूरा होते ही फोन लॉक कर सकते हैं। गेम, यूट्यूब और सोशल मीडिया की अलग-अलग लिमिट सेट की जा सकती हैं। रात में बेडटाइम मोड से बंद भी किया जा सकता है। डिजिटिल वेबलिंग फीचर के जरिये भी ऐप-वाइज टाइम लिमिट और बेडटाइम सेट किया जा सकता है।
आईफोन यूजर्स के लिए
आईफोन में एप्पल फैमिली शेयरिंग पर जाए और स्क्रीन टाइम फीचर के जरिये पूरे फोन की रोज की लिमिट तय की जा सकती है। समय पूरा होते ही फोन लॉक हो जाएगा। ऐप और गेम्स के लिए अलग-अलग पाबंदी हैं।
पासकोड से पैरेंट कंट्रोल सुरक्षित
साइबर एक्सपर्ट सत्यम रस्तोगी ने बताया कि सुरक्षा कारणों से ज्यादातर स्मार्टफोन में ऑटो पॉवर ऑफ फीचर नहीं दिया जाता, लेकिन फोन लॉक होना व्यावहारिक रूप से उतना ही असरदार समाधान है। इमरजेंसी कॉल जैसी सीमित सुविधाएं चालू रखी जा सकती हैं।
- मोबाइल इस्तेमाल का समय तय करें
- पढ़ाई और खाने के समय मोबाइल दूर रखें
- बच्चों को डिजिटल लत के नुकसान समझाएं
ये न करें...
- मोबाइल को बेबी-सिटर न बनाएं
- देर रात तक स्क्रीन देखने की छूट न दें
मोबाइल से दूरी, मैदान है जरूरी
बढ़ते स्क्रीन टाइम ने बच्चों के सोचने और समझने शक्ति को प्रभावित किया है। खेल प्रशिक्षकों का मानना है कि बच्चों का स्क्रीन टाइम घटाने और उन्हें सोशल बनाने का सबसे बेहतर माध्यम स्पोर्ट्स है। इससे जहां उनके भीतर प्रतिस्पर्धा की भावना जागृत होगी वहीं स्क्रीन टाइम भी कम होगा।इहबास के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओम प्रकाश ने कहा कि बच्चे जब नियमित रूप से किसी खेल से जुड़ते हैं तो डोपामिन और एंडॉर्फिन जैसे वही हार्मोन मिलते हैं जो मोबाइल गेम्स से मिलते हैं लेकिन बिना किसी नुकसान के।
क्रिकेट, फुटबॉल, बैडमिंटन, कबड्डी या एथलेटिक्स जैसे खेल बच्चों को न केवल व्यस्त रखते हैं, बल्कि टीमवर्क, अनुशासन और आत्मविश्वास भी सिखाते हैं। खेल अकादमी में और पार्क में बच्चों के साथ खेलने वाले बच्चों के परिजनों का भी मानना है कि खेल से जुड़ने के बाद बच्चों का मोबाइल टाइम अपने आप 30–40 प्रतिशत तक घट गया है। बच्चे देर रात तक ऑनलाइन रहने की बजाय थककर समय पर सोने लगे हैं।
