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Online Gaming: हकीकत की दुनिया से दूर वर्चुअल वर्ल्ड में खोया बचपन, इस 'डिजिटल अरेस्ट' से कैसे मिलेगी मुक्ति
सिमरन, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Fri, 06 Feb 2026 04:00 AM IST
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सार
मोबाइल स्क्रीन पर चलती रील्स, कोरियन ड्राम जैसी विदेशी वेब सीरीज, गेम्स और ट्रेंडिंग गानों के बीच बच्चों की दुनिया सिमटती जा रही है। खेल के मैदान, दोस्तों की बातें और परिवार का समय अब डिजिटल कंटेंट में बदल रहा है। विशेषज्ञ चेताते हैं कि यह महज पसंद या ट्रेंड नहीं, बल्कि योजनाबद्ध तरीके से बच्चों को आभासी दुनिया का आदी बनाने की प्रक्रिया है, जिसका असर बचपन और मानसिक विकास पर पड़ रहा है...
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- फोटो : अमर उजाला डिजिटल
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विस्तार
केस नंबर-1
बीते दिनाें की बात है। 12 साल का एक बच्चा अचानक स्मार्ट फोन लेने जिद करने लगा। अभिभावकों ने टरकाया तो उसने जान देने की धमकी दी। परिजनों ने नजरअंदाज किया तो उसने खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की तब से उसका इलाज चल रहा है। यह जानकारी आरएमएल के डि-एडिक्शन सेंटर के प्रो. डॉक्टर लोकेश शेखावत ने दी।
केस नंबर-2
पूर्वी दिल्ली का 17 वर्षीय छात्र कोविड काल के दौरान मोबाइल सेवी बना। पहले पढ़ाई की बाद में स्कूल खुला तो भी मोबाइल नहीं छूटा। घर वालों के मना करने पर वह लड़ने लगता। धीरे-धीरे पढ़ाई में भी कमजोर होने लगा। इहबास के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश की निगरानी में इस वक्त उसका इलाज चल रहा है।
केस 3
20 साल से कम की उम्र में ही ऑनलाइन जुआ खेलने वाले युवक को ऐसी लत लगी कि उसने तीन साल में 15 लाख रुपये पिता के गंवा दिए। पिता की फैक्ट्री है, जिसका कार्यभार संभालने के साथ युवक पैसे गायब करने लगा। अभिभावकों को जब तक पता चला तब तक वो कर्ज में डूब चुके थे। इसके बाद युवक को आरएमएल अस्पताल के डि-एडिक्शन सेंटर लाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है।
कहानी सिर्फ तीन बच्चों की नहीं, दिल्ली के आरएमएल अस्पताल, इहबास, एम्स, सफदरजंग समेत सभी बड़े अस्पतालों के मनोचिकित्सा विभाग में ऐसे मामले आ रहे हैं। गाजियाबाद में तीन सगी बहनों की खुदकुशी के बाद इनके अभिभावकों की फिक्र और भी बढ़ गई है। विशेषज्ञ बताते हैं कि बृहस्पतिवार को आम दिनों की तुलना में ज्यादा लोगों ने पूछताछ की। विशेषज्ञों का कहना है कि रंग-बिरंगे एप और तेज रफ्तार ऑनलाइन गेम्स बच्चों के मनोरंजन का जरिया भर नहीं रहे, बल्कि उन्हें इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे आदत बन जाएं। हर लेवल, हर नोटिफिकेशन और हर रिवॉर्ड बच्चों को स्क्रीन से बांधे रखने का काम कर रहा है। नतीजतन बच्चे असली दुनिया से कटते जा रहे हैं और डिजिटल दुनिया में उलझते जा रहे हैं।
देश में ऑनलाइन गेमिंग ले रहा विकराल स्वरूप
देश में डिजिटल एडिक्शन बड़ी समस्या है लेकिन इसे रोकने के लिए मजबूत कानून नहीं हैं। ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री अरबों रुपये की है, लेकिन रेगुलेशन कमजोर है। 2025 में पास हुए ऑनलाइन गेमिंग रेगुलेशन एक्ट ने रियल मनी गेम्स पर बैन लगाया है, जो दांव लगाने वाले गेम्स को रोकता है। लेकिन सामान्य गेम्स, जैसे कोरियन टास्क-बेस्ड गेम्स पर ज्यादा नियंत्रण नहीं है। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स 2025 में 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पैरेंटल कंसेंट जरूरी है, लेकिन उम्र वेरिफिकेशन प्लेटफॉर्म्स पर छोड़ दिया गया है।
फोन छीनने पर गुस्सा, नींद की कमी है बच्चों के चुप्पी की भाषा
मनोचिकित्सक डॉक्टर मोनिका के अनुसार, बच्चे हमेशा बोलकर अपनी परेशानी नहीं बताते, लेकिन उनके व्यवहार में बदलाव आते हैं। गेम में हारना उनके आत्मसम्मान को तोड़ देता है। वर्चुअल दुनिया में वे अपनी पहचान बनाते हैं, लेकिन असल जिंदगी में अकेले रह जाते हैं। बच्चे विड्रॉल सिम्पटम्स दिखाते हैं। इसमें फोन छीनने पर गुस्सा, नींद की कमी, स्कूल से भागना या दोस्तों से दूर होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। मनोचिकित्सक डॉ. पल्लवी भटनागर के अनुसार, अभिभावक और बच्चों के बीच बॉन्ड कमजोर हो रहा है।
बच्चों के हाथ में फोन थमाना लत का पहला पड़ाव
प्रो. डॉक्टर लोकेश शेखावत बताते हैं कि मौजूदा समय की भागदौड़ वाली जिंदगी में नौकरी और मोबाइल ने घर में बातचीत खत्म कर दी है। न्यूक्लियर फैमिली में अभिभावक बच्चों को सुविधाएं तो देते हैं, लेकिन समय नहीं। व्यस्त बच्चा-सुरक्षित बच्चा का भ्रम उन्हें संकेतों को नजरअंदाज करने पर मजबूर करता है। पड़ोसियों से मिलना-जुलना कम हो गया है, जिससे बच्चे और अकेले पड़ जाते हैं। व्यस्त अभिभावक शुरुआती संकेत जैसे ज्यादा स्क्रीन टाइम या मूड चेंज को मिस कर देते हैं। स्कूलों में परामर्शदाता की कमी है। ज्यादातर स्कूलों में मोबाइल पॉलिसी नहीं है और टीचर्स को मानसिक संकेत पहचानने की ट्रेनिंग नहीं मिलती। देश में मनोदर्पण जैसी पहल है, जो छात्रों की मेंटल हेल्थ के लिए सलाह देती है। केरल में टीचर्स को मेंटल हेल्थ काउंसलर बनने की ट्रेनिंग दी जा रही है। लेकिन, दिल्ली-एनसीआर के स्कूलों में ऐसी सुविधाएं कम हैं।
डराते है सरकारी आंकड़े
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में 13,892 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। ये आंकड़ा पिछले दस साल में सबसे ज्यादा है। 2023 में हुई आत्महत्याओं में 8.1 फीसदी विद्यार्थियों ने की थी। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच स्टूडेंट्स सुसाइड के मामले 72.9 फीसदी तक बढ़ गए हैं। 2015 में 900 छात्र आत्महत्या के मामले बढ़े थे। साल 2020 में 2,100 ज्यादा छात्र ने सुसाइड किया। यह आंकड़ा 2022 में थोड़ा कम जरूर हुआ लेकिन 2023 में फिर 848 छात्र आत्महत्या ज्यादा दर्ज किए गए।
आरएमएल अस्पताल में मोबाइल लत छुड़ाने का सेंटर
डॉ. राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल में मनोरोग विभाग के तहत एक डी-एडिक्शन क्लीनिक है, जो नशे की लत (सब्स्टेंस यूज डिसऑर्डर) और व्यवहारिक लतों (बिहेवियरल एडिक्शन) का इलाज करता है। इसमें मोबाइल फोन या इंटरनेट की लत भी शामिल है, क्योंकि राष्ट्रीय दिशानिर्देशों में बिहेवियरल एडिक्शन को कवर किया गया है। यह सेंटर ड्रग डी-एडिक्शन प्रोग्राम (डीडीएपी) के तहत चलता है, जिसमें 30 बेड की सुविधा है। यहां आउटपेशेंट क्लिनिक, इनपेशेंट सेवाएं, इमरजेंसी मनोरोग सेवाएं और थेरेपी उपलब्ध हैं। यहां के एक डॉक्टर के अनुसार, एक किशोर 14-16 साल की उम्र के मरीज मोबाइल डिवाइस की लत में था। वह दिन में 10-12 घंटे फोन पर बिताता था, जिससे नींद की कमी, पढ़ाई में गिरावट, चिड़चिड़ापन और परिवार से झगड़े होते थे। लत इतनी थी कि फोन छीनने पर गुस्सा आता था। उसका इलाज मनोचिकित्सक ने काउंसलिंग, बिहेवियर थेरेपी और परिवार की भागीदारी से शुरू किया। दवाएं जैसे एंटी-एंग्जायटी मेडिसिन दी गईं।
भारत में छात्र आत्महत्या की रोकथाम के लिए सरकार ने ये नियम बनाए
आरएमएल अस्पताल में मेडिसिन विभाग में डॉ. सुभाष गिरि बताते हैं कि मोबाइल की लत से दूर करने के लिए माता-पिता को सबसे पहले बच्चे के साथ खुलकर बातचीत करनी चाहिए। बच्चों को समझाना जरूरी है कि मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल उनकी सेहत, पढ़ाई और मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव डाल सकता है। समय-सीमा तय करना, मोबाइल के लिए विशेष समय निर्धारित करना और अन्य मनोरंजक एक्टिविटी की ओर बच्चों को आकर्षित करना मददगार होता है। परिवार के साथ खेल, बाहर घूमना, पढ़ाई और हॉबी के काम मोबाइल से ध्यान हटाने में मदद करते हैं। माता-पिता को खुद भी मोबाइल का सीमित उपयोग करना चाहिए ताकि बच्चे अच्छा उदाहरण देख सकें।
ज्यादा मोबाइल देखने से यह समस्याएं
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बीते दिनाें की बात है। 12 साल का एक बच्चा अचानक स्मार्ट फोन लेने जिद करने लगा। अभिभावकों ने टरकाया तो उसने जान देने की धमकी दी। परिजनों ने नजरअंदाज किया तो उसने खुद को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की तब से उसका इलाज चल रहा है। यह जानकारी आरएमएल के डि-एडिक्शन सेंटर के प्रो. डॉक्टर लोकेश शेखावत ने दी।
केस नंबर-2
पूर्वी दिल्ली का 17 वर्षीय छात्र कोविड काल के दौरान मोबाइल सेवी बना। पहले पढ़ाई की बाद में स्कूल खुला तो भी मोबाइल नहीं छूटा। घर वालों के मना करने पर वह लड़ने लगता। धीरे-धीरे पढ़ाई में भी कमजोर होने लगा। इहबास के वरिष्ठ मनोचिकित्सक डॉ. ओमप्रकाश की निगरानी में इस वक्त उसका इलाज चल रहा है।
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20 साल से कम की उम्र में ही ऑनलाइन जुआ खेलने वाले युवक को ऐसी लत लगी कि उसने तीन साल में 15 लाख रुपये पिता के गंवा दिए। पिता की फैक्ट्री है, जिसका कार्यभार संभालने के साथ युवक पैसे गायब करने लगा। अभिभावकों को जब तक पता चला तब तक वो कर्ज में डूब चुके थे। इसके बाद युवक को आरएमएल अस्पताल के डि-एडिक्शन सेंटर लाया गया, जहां उनका इलाज चल रहा है।
कहानी सिर्फ तीन बच्चों की नहीं, दिल्ली के आरएमएल अस्पताल, इहबास, एम्स, सफदरजंग समेत सभी बड़े अस्पतालों के मनोचिकित्सा विभाग में ऐसे मामले आ रहे हैं। गाजियाबाद में तीन सगी बहनों की खुदकुशी के बाद इनके अभिभावकों की फिक्र और भी बढ़ गई है। विशेषज्ञ बताते हैं कि बृहस्पतिवार को आम दिनों की तुलना में ज्यादा लोगों ने पूछताछ की। विशेषज्ञों का कहना है कि रंग-बिरंगे एप और तेज रफ्तार ऑनलाइन गेम्स बच्चों के मनोरंजन का जरिया भर नहीं रहे, बल्कि उन्हें इस तरह डिजाइन किया जा रहा है कि वे आदत बन जाएं। हर लेवल, हर नोटिफिकेशन और हर रिवॉर्ड बच्चों को स्क्रीन से बांधे रखने का काम कर रहा है। नतीजतन बच्चे असली दुनिया से कटते जा रहे हैं और डिजिटल दुनिया में उलझते जा रहे हैं।
देश में ऑनलाइन गेमिंग ले रहा विकराल स्वरूप
देश में डिजिटल एडिक्शन बड़ी समस्या है लेकिन इसे रोकने के लिए मजबूत कानून नहीं हैं। ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री अरबों रुपये की है, लेकिन रेगुलेशन कमजोर है। 2025 में पास हुए ऑनलाइन गेमिंग रेगुलेशन एक्ट ने रियल मनी गेम्स पर बैन लगाया है, जो दांव लगाने वाले गेम्स को रोकता है। लेकिन सामान्य गेम्स, जैसे कोरियन टास्क-बेस्ड गेम्स पर ज्यादा नियंत्रण नहीं है। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन रूल्स 2025 में 18 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए पैरेंटल कंसेंट जरूरी है, लेकिन उम्र वेरिफिकेशन प्लेटफॉर्म्स पर छोड़ दिया गया है।
फोन छीनने पर गुस्सा, नींद की कमी है बच्चों के चुप्पी की भाषा
मनोचिकित्सक डॉक्टर मोनिका के अनुसार, बच्चे हमेशा बोलकर अपनी परेशानी नहीं बताते, लेकिन उनके व्यवहार में बदलाव आते हैं। गेम में हारना उनके आत्मसम्मान को तोड़ देता है। वर्चुअल दुनिया में वे अपनी पहचान बनाते हैं, लेकिन असल जिंदगी में अकेले रह जाते हैं। बच्चे विड्रॉल सिम्पटम्स दिखाते हैं। इसमें फोन छीनने पर गुस्सा, नींद की कमी, स्कूल से भागना या दोस्तों से दूर होना जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। मनोचिकित्सक डॉ. पल्लवी भटनागर के अनुसार, अभिभावक और बच्चों के बीच बॉन्ड कमजोर हो रहा है।
बच्चों के हाथ में फोन थमाना लत का पहला पड़ाव
प्रो. डॉक्टर लोकेश शेखावत बताते हैं कि मौजूदा समय की भागदौड़ वाली जिंदगी में नौकरी और मोबाइल ने घर में बातचीत खत्म कर दी है। न्यूक्लियर फैमिली में अभिभावक बच्चों को सुविधाएं तो देते हैं, लेकिन समय नहीं। व्यस्त बच्चा-सुरक्षित बच्चा का भ्रम उन्हें संकेतों को नजरअंदाज करने पर मजबूर करता है। पड़ोसियों से मिलना-जुलना कम हो गया है, जिससे बच्चे और अकेले पड़ जाते हैं। व्यस्त अभिभावक शुरुआती संकेत जैसे ज्यादा स्क्रीन टाइम या मूड चेंज को मिस कर देते हैं। स्कूलों में परामर्शदाता की कमी है। ज्यादातर स्कूलों में मोबाइल पॉलिसी नहीं है और टीचर्स को मानसिक संकेत पहचानने की ट्रेनिंग नहीं मिलती। देश में मनोदर्पण जैसी पहल है, जो छात्रों की मेंटल हेल्थ के लिए सलाह देती है। केरल में टीचर्स को मेंटल हेल्थ काउंसलर बनने की ट्रेनिंग दी जा रही है। लेकिन, दिल्ली-एनसीआर के स्कूलों में ऐसी सुविधाएं कम हैं।
डराते है सरकारी आंकड़े
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, साल 2023 में 13,892 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं। ये आंकड़ा पिछले दस साल में सबसे ज्यादा है। 2023 में हुई आत्महत्याओं में 8.1 फीसदी विद्यार्थियों ने की थी। एनसीआरबी की रिपोर्ट के अनुसार, 2014 से 2023 के बीच स्टूडेंट्स सुसाइड के मामले 72.9 फीसदी तक बढ़ गए हैं। 2015 में 900 छात्र आत्महत्या के मामले बढ़े थे। साल 2020 में 2,100 ज्यादा छात्र ने सुसाइड किया। यह आंकड़ा 2022 में थोड़ा कम जरूर हुआ लेकिन 2023 में फिर 848 छात्र आत्महत्या ज्यादा दर्ज किए गए।
आरएमएल अस्पताल में मोबाइल लत छुड़ाने का सेंटर
डॉ. राम मनोहर लोहिया (आरएमएल) अस्पताल में मनोरोग विभाग के तहत एक डी-एडिक्शन क्लीनिक है, जो नशे की लत (सब्स्टेंस यूज डिसऑर्डर) और व्यवहारिक लतों (बिहेवियरल एडिक्शन) का इलाज करता है। इसमें मोबाइल फोन या इंटरनेट की लत भी शामिल है, क्योंकि राष्ट्रीय दिशानिर्देशों में बिहेवियरल एडिक्शन को कवर किया गया है। यह सेंटर ड्रग डी-एडिक्शन प्रोग्राम (डीडीएपी) के तहत चलता है, जिसमें 30 बेड की सुविधा है। यहां आउटपेशेंट क्लिनिक, इनपेशेंट सेवाएं, इमरजेंसी मनोरोग सेवाएं और थेरेपी उपलब्ध हैं। यहां के एक डॉक्टर के अनुसार, एक किशोर 14-16 साल की उम्र के मरीज मोबाइल डिवाइस की लत में था। वह दिन में 10-12 घंटे फोन पर बिताता था, जिससे नींद की कमी, पढ़ाई में गिरावट, चिड़चिड़ापन और परिवार से झगड़े होते थे। लत इतनी थी कि फोन छीनने पर गुस्सा आता था। उसका इलाज मनोचिकित्सक ने काउंसलिंग, बिहेवियर थेरेपी और परिवार की भागीदारी से शुरू किया। दवाएं जैसे एंटी-एंग्जायटी मेडिसिन दी गईं।
भारत में छात्र आत्महत्या की रोकथाम के लिए सरकार ने ये नियम बनाए
- मेंटल हेल्थकेयर एक्ट, 2017
- एंटी रैगिंग मेजर्स
- स्टूडेंट काउंसलिंग सिस्टम
- गेटकीपर्स ट्रेनिंग फॉर सुसाइड प्रिवेंशन बॉय निमहंस, एसपीआईएफ
- एनईपी 2020
आरएमएल अस्पताल में मेडिसिन विभाग में डॉ. सुभाष गिरि बताते हैं कि मोबाइल की लत से दूर करने के लिए माता-पिता को सबसे पहले बच्चे के साथ खुलकर बातचीत करनी चाहिए। बच्चों को समझाना जरूरी है कि मोबाइल का अत्यधिक इस्तेमाल उनकी सेहत, पढ़ाई और मानसिक विकास पर बुरा प्रभाव डाल सकता है। समय-सीमा तय करना, मोबाइल के लिए विशेष समय निर्धारित करना और अन्य मनोरंजक एक्टिविटी की ओर बच्चों को आकर्षित करना मददगार होता है। परिवार के साथ खेल, बाहर घूमना, पढ़ाई और हॉबी के काम मोबाइल से ध्यान हटाने में मदद करते हैं। माता-पिता को खुद भी मोबाइल का सीमित उपयोग करना चाहिए ताकि बच्चे अच्छा उदाहरण देख सकें।
ज्यादा मोबाइल देखने से यह समस्याएं
- आंखों में थकान, जलन, धुंधला दिखना और सिरदर्द
- बच्चों की नींद में कमीचिड़चिड़ापन
- फोकस करने की क्षमता में कमी
- मोबाइल का इस्तेमाल दिन में सीमित समय तक करें
- बच्चों को बाहर खेलने और शारीरिक एक्टिविटी के लिए प्रेरित करें
- रात में सोने से पहले मोबाइल ना दें
- बच्चे के साथ समय बिताएं और उनसे खुलकर बातचीत करें
- मोबाइल इस्तेमाल के नियम स्पष्ट करें और उनका पालन करवाएं
- कोरियन लव गेम
- ब्लू व्हेल चैलेंज
- पबजी
- फ्री फायर
- पोकेमॉन गो
- मोमो चैलेंज
