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योग्यता का मतलब वास्तविक आय नहीं, पति की 30 प्रतिशत सैलरी पत्नी को मिलेगी : हाईकोर्ट
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दिल्ली हाईकोर्ट ने सेना को निर्देश दिया कि पति की सैलरी वैधानिक कटौतियों के बाद ही दी जाए
तलाक की याचिका लंबित रहने के दौरान भी अंतरिम मेंटेनेंस वैध
गौरव बाजपेई
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने सेना में कार्यरत एक युवक को तलाक की अपील लंबित रहने के बाद भी पत्नी को 30 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया है। पति ने आपत्ति जताई थी कि पत्नी एमबीए है और सक्षम है जिस पर अदालत ने कहा कि योग्यता का अर्थ वास्तविक आय से नहीं है। हाईकोर्ट ने 14 जुलाई 2026 को फैसले में कहा है कि तलाक की अपील लंबित रहने के दौरान भी पत्नी को अंतरिम मेंटेनेंस (अस्थायी भरण-पोषण) मिलता रहेगा। अदालत ने भारतीय सेना में तैनात पति के वेतन से 30 प्रतिशत राशि काटकर पत्नी को देने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर की खंडपीठ ने फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता पत्नी ने पति के खिलाफ अपील दायर की थी। दोनों का विवाह 10 दिसंबर 2012 को दिल्ली कैंटोनमेंट में हुआ था। 22 मई 2015 से दोनों अलग-अलग रह रहे हैं। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ए) एवं (बी) के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। परिवार अदालत ने 12 जनवरी 2024 को अंतरिम मेंटेनेंस का आदेश देते हुए पति के नियोक्ता (सेना) को उसके सकल वेतन का 30 प्रतिशत काटकर पत्नी को देने का निर्देश दिया था। 19 जुलाई 2025 को परिवार अदालत ने तलाक की याचिका स्वीकार कर ली। इसके बाद पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की और अपील लंबित रहने तक मेंटेनेंस जारी रखने की मांग की।
अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत दिया गया अंतरिम मेंटेनेंस अपील की अवधि के दौरान भी जारी रहेगा, क्योंकि अपील मूल मुकदमे की निरंतरता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और अन्य हाईकोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अपील को अलग मुकदमा नहीं माना जा सकता। अदालत ने पत्नी की योग्यता (एमबीए) के बावजूद मेंटेनेंस दिए जाने पर जोर दिया और कहा कि सक्षम होने का मतलब वास्तविक आय नहीं है। पत्नी के पिता और बहन को पैसे ट्रांसफर करने के मामले को भी अदालत ने आंतरिक परिवार व्यवस्था मानते हुए खारिज कर दिया।
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हाईकोर्ट ने पति के नियोक्ता को निर्देश दिया कि 25 अगस्त 2025 से अपील के अंतिम फैसले तक या आगे के आदेश तक पत्नी को 30 प्रतिशत वेतन (न्यूनतम वैधानिक कटौतियों के बाद) भेजा जाए। साथ ही स्पष्ट किया कि धारा 25 के तहत परिवार अदालत में लंबित याचिका इससे प्रभावित नहीं होगी।
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तलाक की याचिका लंबित रहने के दौरान भी अंतरिम मेंटेनेंस वैध
गौरव बाजपेई
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने सेना में कार्यरत एक युवक को तलाक की अपील लंबित रहने के बाद भी पत्नी को 30 प्रतिशत वेतन देने का निर्देश दिया है। पति ने आपत्ति जताई थी कि पत्नी एमबीए है और सक्षम है जिस पर अदालत ने कहा कि योग्यता का अर्थ वास्तविक आय से नहीं है। हाईकोर्ट ने 14 जुलाई 2026 को फैसले में कहा है कि तलाक की अपील लंबित रहने के दौरान भी पत्नी को अंतरिम मेंटेनेंस (अस्थायी भरण-पोषण) मिलता रहेगा। अदालत ने भारतीय सेना में तैनात पति के वेतन से 30 प्रतिशत राशि काटकर पत्नी को देने का निर्देश दिया है।
न्यायमूर्ति विवेक चौधरी और न्यायमूर्ति रेणु भटनागर की खंडपीठ ने फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता पत्नी ने पति के खिलाफ अपील दायर की थी। दोनों का विवाह 10 दिसंबर 2012 को दिल्ली कैंटोनमेंट में हुआ था। 22 मई 2015 से दोनों अलग-अलग रह रहे हैं। पति ने हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1)(ए) एवं (बी) के तहत तलाक की याचिका दायर की थी। परिवार अदालत ने 12 जनवरी 2024 को अंतरिम मेंटेनेंस का आदेश देते हुए पति के नियोक्ता (सेना) को उसके सकल वेतन का 30 प्रतिशत काटकर पत्नी को देने का निर्देश दिया था। 19 जुलाई 2025 को परिवार अदालत ने तलाक की याचिका स्वीकार कर ली। इसके बाद पत्नी ने हाईकोर्ट में अपील दायर की और अपील लंबित रहने तक मेंटेनेंस जारी रखने की मांग की।
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अदालत ने कहा कि हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 24 के तहत दिया गया अंतरिम मेंटेनेंस अपील की अवधि के दौरान भी जारी रहेगा, क्योंकि अपील मूल मुकदमे की निरंतरता है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों और अन्य हाईकोर्ट के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि अपील को अलग मुकदमा नहीं माना जा सकता। अदालत ने पत्नी की योग्यता (एमबीए) के बावजूद मेंटेनेंस दिए जाने पर जोर दिया और कहा कि सक्षम होने का मतलब वास्तविक आय नहीं है। पत्नी के पिता और बहन को पैसे ट्रांसफर करने के मामले को भी अदालत ने आंतरिक परिवार व्यवस्था मानते हुए खारिज कर दिया।
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हाईकोर्ट ने पति के नियोक्ता को निर्देश दिया कि 25 अगस्त 2025 से अपील के अंतिम फैसले तक या आगे के आदेश तक पत्नी को 30 प्रतिशत वेतन (न्यूनतम वैधानिक कटौतियों के बाद) भेजा जाए। साथ ही स्पष्ट किया कि धारा 25 के तहत परिवार अदालत में लंबित याचिका इससे प्रभावित नहीं होगी।