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Delhi: वादे, योजनाएं और अब जहां है जैसा है का फैसला, अनधिकृत कॉलोनीवासियों ने नियमित होने को किया लंबा इंतजार

विनोद डबास, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Vijay Singh Pundir Updated Wed, 08 Apr 2026 09:42 AM IST
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सार

अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की शुरुआत 1961 में हुई, जब पहली बार 101 कॉलोनियों को नियमित करने की नीति बनी। इसके बाद 1993 तक 567 कॉलोनियों को नियमित गया लेकिन असली किया विस्तार 1980 के दशक में हुआ। 1993 के विधानसभा चुनाव के बाद यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक विषय बन गया।

Residents of unauthorized colonies have waited a long time for regularization
दिल्ली के शास्त्री पार्क इलाके की अनधिकृत कॉलोनी - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

राजधानी की अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने का मुद्दा नया नहीं है, बल्कि पिछले कई दशकों से राजनीति, नीतियों और जमीनी हकीकत के बीच उलझा हुआ बड़ा सवाल है। हर कुछ साल में नई घोषणा, नई योजना और नए वादे सामने आते रहे, लेकिन आज तक यह प्रक्रिया पूरी तरह जमीन पर नहीं उत्तर पाई। अब जहां है जैसा है के फैसले से ऐसी कॉलोनियों में रहने वालों के मन में फिर उम्मीद जगी है। 

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अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की शुरुआत 1961 में हुई, जब पहली बार 101 कॉलोनियों को नियमित करने की नीति बनी। इसके बाद 1993 तक 567 कॉलोनियों को नियमित गया लेकिन असली किया विस्तार 1980 के दशक में हुआ। एशियन गेम्स के दौरान जब बड़ी संख्या में लोग दिल्ली आए और उन्होंने अनधिकृत रूप से बसना शुरू किया। धीरे-धीरे यह कॉलोनियां पूरे शहर में फैल गई अनुमान है कि दिल्ली की करीब 40 प्रतिशत आबादी इन्हीं में रहती है।
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1993 के विधानसभा चुनाव के बाद यह मुद्दा बड़ा राजनीतिक विषय बन गया। क्योंकि यहां रहने वाली बड़ी आबादी वोट बैंक बन चुकी थी। भाजपा सरकार के तत्कालीन मुख्यमंत्री मदनलाल खुराना ने 1071 अनधिकृत कॉलोनियों को नियमित करने की घोषणा की। सरकार ने खूब वाहवाही लूटी। हवाई सर्वे कराकर विधानसभा में प्रस्ताव पास करके केंद्र  सरकार के पास भेजा लेकिन यह लागू नहीं हो सका। 2008 में विधानसभा चुनाव से पहले केंद्र की कांग्रेस सरकार ने शीला दीक्षित सरकार की पहल पर 1218 कॉलोनियों को प्रोविजनल सर्टिफिकेट जारी किए जिससे लोगों को उम्मीद जगी, लेकिन स्थायी समाधान नहीं निकला।

अरविंद केजरीवाल ने भी इन कॉलोनियों के निवासियों को मालिकाना हक देने की घोषणा की थी। निवासियों के लिए सबसे अहम मोड़ तब आया जब 2019 में नरेंद्र मोदी सरकार ने पीएम-उदय योजना शुरू की। इसका उद्देश्य था कि अनधिकृत कॉलोनियों में रहने वालों को मालिकाना हक दिया जाए। तकनीकी जटिलताओं, दस्तावेजों की कमी और प्रक्रियाओं की पेचीदगियों के कारण यह योजना अपेक्षित गति नहीं पकड़ सकी। 2020 से 2023 के बीच 10 लाख मकानों में से सिर्फ 40 हजार को ही कन्वेयंस डीड मिल सकी।

अब अप्रैल में केंद्र सरकार ने जहां है जैसा है नीति लागू करने की घोषणा की है, जिसके तहत 1731 कॉलोनियों में से 1511 को 45 दिनों के भीतर नियमित करने का लक्ष्य है। हालांकि, चुनौतियां कम नहीं हैं। कई कॉलोनियां रिज एरिया, डीडीए या ग्राम सभा की जमीन पर बसी हैं, जिन पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती है।

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