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Aravali Analysis: अरावली में मिट्टी का नुकसान बढ़ा, हर साल औसतन 13.8 फीसदी अधिक हो रहा कटाव; शोध में खुलासा
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Thu, 12 Mar 2026 07:08 AM IST
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सार
हालिया शोध के अनुसार, 2017 से 2024 के बीच हर साल औसतन 13.8 प्रतिशत मिट्टी का कटाव हुआ है। यह डेटा तब सामने आया जब शोधकर्ताओं ने लैंड यूज और लैंड कवर पैटर्न का विश्लेषण किया।
अरावली पर्वत शृंखला...
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
अरावली पर्वत शृंखला में पिछले कुछ साल में मिट्टी का नुकसान लगातार बढ़ रहा है। हालिया शोध के अनुसार, 2017 से 2024 के बीच हर साल औसतन 13.8 प्रतिशत मिट्टी का कटाव हुआ है। यह डेटा तब सामने आया जब शोधकर्ताओं ने लैंड यूज और लैंड कवर पैटर्न का विश्लेषण किया। अध्ययन में पाया गया कि हालांकि जंगलों का क्षेत्र बढ़ा है, लेकिन इंसानी गतिविधियों और बने हुए क्षेत्रों की वृद्धि के कारण मिट्टी का नुकसान तेज हुआ है।
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ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी और इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने 2001 से 2021 तक के डेटा का विश्लेषण करते हुए यह निष्कर्ष निकाला। शोध में पाया गया कि खड़ी ढलान वाली जमीन, संवेदनशील मिट्टी वाले इलाके और माइनिंग क्षेत्र मिट्टी कटाव के मुख्य हॉटस्पॉट हैं। इसके अनुसार, अरावली के पुराने पहाड़ों की मिट्टी गहरी और जटिल इकोसिस्टम वाली है, जो प्राकृतिक रूप से संतुलित है।
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जियोग्राफीज जर्नल में प्रकाशित इस शोध में बताया गया कि पेड़ लगाने और जंगल के क्षेत्र में वृद्धि के बावजूद मिट्टी का इरोजन तेजी से बढ़ रहा है। इससे साफ होता है कि स्थानीय संरक्षण प्रयास जैसे पेड़ लगाना, बड़े पैमाने पर हुए लैंड कन्वर्जन और इंसानी गतिविधियों की भरपाई नहीं कर सकते। विशेषज्ञों के अनुसार, अरावली पर्वत प्रणाली देश के सबसे महत्वपूर्ण मिनरल बेस में से एक है। यहां कई तरह के मेटैलिक और नॉन-मेटैलिक मिनरल पाए जाते हैं, और यह देश के खनिज संसाधनों की नींव भी है। इस वजह से मिट्टी का कटाव केवल पर्यावरणीय खतरा नहीं है, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी चिंता का विषय है।
हाई-रिजॉल्यूशन डेटा का उपयोग
शोध टीम ने 2017 और 2024 के हाई-रिजॉल्यूशन डेटा का उपयोग करते हुए मिट्टी कटाव की औसत दर मापी। उनके अनुसार, 2017 से 2024 के बीच इंसानी गतिविधियों और जलवायु परिवर्तन दोनों ने मिलकर मिट्टी कटाव में वृद्धि की है। पेड़-पौधों और सेमी-नेचुरल सतहों को बनावट वाले, इम्परवियस क्षेत्रों में बदलने से जमीन की प्राकृतिक रक्षा प्रणाली कमजोर हुई है।
शोध में यह भी बताया गया कि कुल जंगल कवर बढ़ा है, लेकिन बड़ी संख्या में बने हुए क्षेत्रों, फसलों की भूमि और चरागाहों की कमी ने मिट्टी कटाव की दर को बढ़ा दिया। 2017-2024 के बीच मिट्टी के इरोजन की औसत दर 1.59 से 1.81 टन प्रति हेक्टेयर प्रति साल बढ़ गई है।
इंसानी गतिविधियों और क्लाइमेट चेंज का असर एक-दूसरे पर निर्भर
शोधकर्ताओं ने कहा कि इंसानी गतिविधियों और क्लाइमेट चेंज का असर एक-दूसरे पर निर्भर करता है। मानव गतिविधियों से मिट्टी कमजोर होती है, वहीं बदलते मौसम और जलवायु परिवर्तन की वजह से कटाव और तेजी से बढ़ जाता है। उन्होंने कहा कि इस वजह से मिट्टी कटाव की दर में 13.83 प्रतिशत की वृद्धि एक सीधा और पहले से अनुमानित असर बन गई है।
शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि अगर बड़े पैमाने पर लैंड कन्वर्ज़न और निर्माण की गतिविधियां जारी रहीं, तो अरावली में मिट्टी के कटाव का खतरा और बढ़ सकता है। इससे बचने के लिए स्थानीय संरक्षण के साथ बड़े पैमाने पर टिकाऊ लैंड मैनेजमेंट और विकास नीति पर ध्यान देने की जरूरत है। उन्होंने सुझाव दिया कि अरावली में फसल और चरागाह भूमि की सतत उपयोग योजना बनाई जाए। माइनिंग जैसी गतिविधियों पर कड़ी निगरानी रखी जाए।