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Delhi NCR News: उन्नाव दुष्कर्म मामले में प्राथमिकी दर्ज न करने के तीनों आरोपी पुलिस कर्मी बरी
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नोट- उत्तर प्रदेश के संस्करणों के लिए उपयोगी
कोर्ट ने कहा, आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत एफआईआर की सूचना नहीं मानी जा सकती
- अदालत ने कहा कि सीएम पोर्टल पर शिकायत करना संज्ञेय अपराध की पुलिस को सूचना देना बराबर नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
राउज एवेन्यू की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्नाव दुष्कर्म केस में एक बड़ा फैसला सुनाया है। सीबीआई ने जो तीन यूपी पुलिसवालों पर प्राथमिकी दर्ज न करने का केस चलाया था, उन तीनों को कोर्ट ने बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि मुख्यमंत्री के आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत डालना सीआरपीसी की धारा 154 के तहत दी गई प्राथमिकी की सूचना नहीं मानी जा सकती। यानी ऑनलाइन सीएम पोर्टल पर कंप्लेंट करना पुलिस को सीधे संज्ञेय अपराध की जानकारी देने जैसा नहीं है, भले ही बाद में उससे जांच शुरू हो जाए। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मयंक गोयल ने फैसले में लिखा कि आईपीसी की धारा 166ए (जो लोक सेवक द्वारा दुष्कर्म जैसी गंभीर घटना की सूचना जानबूझकर न दर्ज करने पर लगती है) के लिए जरूरी तत्व अभियोजन पक्ष संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पीड़िता ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में मान लिया कि 17 अगस्त 2017 को आईजीआरएस पर शिकायत करने से पहले उसने या उसकी मां ने किसी थाने में कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ दुष्कर्म की कोई लिखित या मौखिक शिकायत नहीं दी थी। अदालत का मत था कि प्राथमिकी दर्ज करने की वैधानिक मजबूरी तभी बनती है, जब संज्ञेय अपराध की जानकारी सीधे पुलिस अधिकारी को सीआरपीसी 154 के तरीके से दी जाए। सीएम पोर्टल या कोई दूसरा एडमिनिस्ट्रेटिव प्लेटफॉर्म उसकी जगह नहीं ले सकता।
कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही बाद में इस मामले में एफआईआर हुई, जांच हुई और मुख्य आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी ठहराया गया, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उस वक्त इन तीन पुलिसवालों ने जानबूझकर कानूनी ड्यूटी तोड़ी थी। ये तीनों आरोपी तत्कालीन सफीपुर सर्किल ऑफिसर कुंवर बहादुर सिंह, माखी थाना प्रभारी धर्म प्रकाश शुक्ला और उसी थाने के सब-इंस्पेक्टर दिग्विजय सिंह। सीबीआई का आरोप था कि 4 जून 2017 की घटना की जानकारी मिलने के बावजूद इन्होंने प्राथमिकी नहीं लिखी।
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कोर्ट ने कहा, आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत एफआईआर की सूचना नहीं मानी जा सकती
- अदालत ने कहा कि सीएम पोर्टल पर शिकायत करना संज्ञेय अपराध की पुलिस को सूचना देना बराबर नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली।
राउज एवेन्यू की अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत ने उन्नाव दुष्कर्म केस में एक बड़ा फैसला सुनाया है। सीबीआई ने जो तीन यूपी पुलिसवालों पर प्राथमिकी दर्ज न करने का केस चलाया था, उन तीनों को कोर्ट ने बरी कर दिया। अदालत ने साफ कहा कि मुख्यमंत्री के आईजीआरएस पोर्टल पर शिकायत डालना सीआरपीसी की धारा 154 के तहत दी गई प्राथमिकी की सूचना नहीं मानी जा सकती। यानी ऑनलाइन सीएम पोर्टल पर कंप्लेंट करना पुलिस को सीधे संज्ञेय अपराध की जानकारी देने जैसा नहीं है, भले ही बाद में उससे जांच शुरू हो जाए। अतिरिक्त मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट मयंक गोयल ने फैसले में लिखा कि आईपीसी की धारा 166ए (जो लोक सेवक द्वारा दुष्कर्म जैसी गंभीर घटना की सूचना जानबूझकर न दर्ज करने पर लगती है) के लिए जरूरी तत्व अभियोजन पक्ष संदेह से परे साबित नहीं कर पाया। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि पीड़िता ने क्रॉस-एग्जामिनेशन में मान लिया कि 17 अगस्त 2017 को आईजीआरएस पर शिकायत करने से पहले उसने या उसकी मां ने किसी थाने में कुलदीप सिंह सेंगर के खिलाफ दुष्कर्म की कोई लिखित या मौखिक शिकायत नहीं दी थी। अदालत का मत था कि प्राथमिकी दर्ज करने की वैधानिक मजबूरी तभी बनती है, जब संज्ञेय अपराध की जानकारी सीधे पुलिस अधिकारी को सीआरपीसी 154 के तरीके से दी जाए। सीएम पोर्टल या कोई दूसरा एडमिनिस्ट्रेटिव प्लेटफॉर्म उसकी जगह नहीं ले सकता।
कोर्ट ने आगे कहा कि भले ही बाद में इस मामले में एफआईआर हुई, जांच हुई और मुख्य आरोपी कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी ठहराया गया, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि उस वक्त इन तीन पुलिसवालों ने जानबूझकर कानूनी ड्यूटी तोड़ी थी। ये तीनों आरोपी तत्कालीन सफीपुर सर्किल ऑफिसर कुंवर बहादुर सिंह, माखी थाना प्रभारी धर्म प्रकाश शुक्ला और उसी थाने के सब-इंस्पेक्टर दिग्विजय सिंह। सीबीआई का आरोप था कि 4 जून 2017 की घटना की जानकारी मिलने के बावजूद इन्होंने प्राथमिकी नहीं लिखी।
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