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Delhi NCR News: यूएपीए आरोपी को 90 नहीं, 180 दिनों के बाद ही डिफॉल्ट बेल का अधिकार
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दिल्ली हाईकोर्ट ने जसीर बिलाल वानी की याचिका खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी, कहा- बीएनएसएस लागू होने से यूएपीए का प्रावधान प्रभावित नहीं होगा
अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) लागू होने के बाद भी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के मामलों में डिफॉल्ट बेल की अवधि 90 दिन नहीं, बल्कि 180 दिन ही रहेगी। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की खंडपीठ ने नवंबर 2025 के लाल किला विस्फोट मामले के आरोपी जसीर बिलाल वानी उर्फ दानिश की डिफॉल्ट बेल याचिका खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि यूएपीए की धारा 43डी(2) में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 167 का उल्लेख है, जिसे अब निरस्त किया जा चुका है। संसद ने संबंधित प्रावधान में बीएनएसएस की धारा 187 का संदर्भ नहीं जोड़ा है। ऐसे में आरोपी ने 90 दिन बाद डिफॉल्ट बेल का अधिकार होने का दावा किया।
अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जनरल क्लॉजेज एक्ट, 1897 की धारा 8(1) और ‘लेजिस्लेशन बाई रेफरेंस’ के सिद्धांत के तहत यूएपीए की धारा 43डी(2) में सीआरपीसी की धारा 167 का संदर्भ अब बीएनएसएस की धारा 187 के रूप में पढ़ा जाएगा। इसलिए यूएपीए मामलों में जांच पूरी करने के लिए हिरासत की अवधि 180 दिन तक बढ़ाई जा सकती है। अदालत ने कहा कि यूएपीए में लंबी हिरासत का प्रावधान आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों की जांच के लिए विधायिका के स्पष्ट उद्देश्य को दर्शाता है। केवल बीएनएसएस लागू होने से इस उद्देश्य को समाप्त नहीं किया जा सकता।
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अमर उजाला ब्यूरो
नई दिल्ली। दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) लागू होने के बाद भी गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के मामलों में डिफॉल्ट बेल की अवधि 90 दिन नहीं, बल्कि 180 दिन ही रहेगी। न्यायमूर्ति प्रतिभा एम. सिंह और न्यायमूर्ति विकास महाजन की खंडपीठ ने नवंबर 2025 के लाल किला विस्फोट मामले के आरोपी जसीर बिलाल वानी उर्फ दानिश की डिफॉल्ट बेल याचिका खारिज करते हुए यह व्यवस्था दी।
आरोपी की ओर से दलील दी गई कि यूएपीए की धारा 43डी(2) में दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 167 का उल्लेख है, जिसे अब निरस्त किया जा चुका है। संसद ने संबंधित प्रावधान में बीएनएसएस की धारा 187 का संदर्भ नहीं जोड़ा है। ऐसे में आरोपी ने 90 दिन बाद डिफॉल्ट बेल का अधिकार होने का दावा किया।
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अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि जनरल क्लॉजेज एक्ट, 1897 की धारा 8(1) और ‘लेजिस्लेशन बाई रेफरेंस’ के सिद्धांत के तहत यूएपीए की धारा 43डी(2) में सीआरपीसी की धारा 167 का संदर्भ अब बीएनएसएस की धारा 187 के रूप में पढ़ा जाएगा। इसलिए यूएपीए मामलों में जांच पूरी करने के लिए हिरासत की अवधि 180 दिन तक बढ़ाई जा सकती है। अदालत ने कहा कि यूएपीए में लंबी हिरासत का प्रावधान आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों की जांच के लिए विधायिका के स्पष्ट उद्देश्य को दर्शाता है। केवल बीएनएसएस लागू होने से इस उद्देश्य को समाप्त नहीं किया जा सकता।
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