सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Delhi ›   76 percent workers at Okhla landfill suffered from health problems In study published in EPJ

ओखला लैंडफिल का काला सच: राजधानी के जहरीले पहाड़ पर रोजगार की कीमत बनी बीमारी, मजदूरों पर चौंकाने वाला शोध

अमर उजाला नेटवर्क, दिल्ली Published by: Rahul Kumar Tiwari Updated Thu, 09 Apr 2026 07:36 AM IST
विज्ञापन
सार

दिल्ली के ओखला लैंडफिल पर काम कर रहे मजदूर गंभीर स्वास्थ्य जोखिम में हैं। अध्ययन में सामने आया कि ज्यादातर मजदूर बीमारियों से जूझ रहे हैं, जबकि सुरक्षा, साफ-सफाई और कचरा प्रबंधन की व्यवस्थाएं बेहद खराब हैं।
 

76 percent workers at Okhla landfill suffered from health problems In study published in EPJ
जहरीले पहाड़ पर रोजगार की कीमत बनी बीमारी - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार

दिल्ली के दक्षिणी हिस्से में स्थित ओखला लैंडफिल साइट पर काम करने वाले मजदूरों की हालत बेहद चिंताजनक है। यूनिवर्सिटी ऑफ लद्दाख की शोधकर्ता सोनम एंगमो और इग्नू की प्रोफेसर शाची शाह के विस्तृत अध्ययन में यह बात साफ हुई है। पर्यावरण संरक्षण जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में खुलासा हुआ है कि यहां 55 से 60 लाख टन पुराना कचरा (लेगेसी वेस्ट) अभी पड़ा है। 
Trending Videos


यह साइट 1996 से चालू है और 2010 में भर चुकी थी, फिर भी कचरा डालना जारी रहा। ऐसे में यहां काम करने वाले मजदूरों के लिए यह जहरीला पहाड़ बन गया है। करीब 36 मजदूरों को स्किन एलर्जी, 32 को सांस की बीमारी, 23 को आंखों में लालिमा या बाल झड़ने की समस्या और 8.5% को दिल से जुड़ी दिक्कतें है। अध्ययन के अनुसार, इनमें से 76 प्रतिशत मजदूर अक्सर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करते हैं। शोध में 107 मजदूरों से सीधे सवाल-जवाब किए गए, जिनमें ज्यादातर पुरुष थे और उनकी उम्र 30 से 40 साल के बीच थी। नतीजे देखकर हैरानी होती है। 
विज्ञापन
विज्ञापन


95 प्रतिशत मजदूरों को पता है कि रोजाना कितना कचरा (लगभग 2000 टन) यहां आता है लेकिन क्या करें रोजी-रोटी के लिए काम करते हैं। मजदूर लैंडफिल की असली स्थिति से अनजान हैं। शोधकर्ताओं ने पाया कि लैंडफिल पर आरामघरों की हालत बेहद खराब है। 51 प्रतिशत मजदूरों ने बताया कि टॉयलेट और आराम की जगह गंदी, बिना पानी और अस्वच्छ है। लीचेट यानी कचरे से निकलने वाला जहरीला पानी का कोई प्रबंधन नहीं है।

साउथ दिल्ली  के चार जोन से आता है कचरा
शोधकर्ता सोनम एंगमो के अनुसार, 2018 में लैंडफिल में आग लगी थी, जिससे पर्यावरण और स्वास्थ्य को भारी नुकसान हुआ। 2019 में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने पुराने कचरे को हटाने का आदेश दिया। एसडीएमसी ने बायो-माइनिंग शुरू की और छह ट्रॉमेल मशीनें लगाईं। 2024 तक साइट साफ करने का टारगेट था। कचरे में 52 प्रतिशत मिट्टी जैसा पदार्थ, 42 प्रतिशत ईंट-पत्थर-कंक्रीट और 5 प्रतिशत प्लास्टिक है। ऑर्गेनिक कंटेंट सिर्फ 6.3 प्रतिशत है। उन्होंने बताया कि एसडीएमसी ने वेस्ट-टू-एनर्जी प्लांट शुरू किया, जिससे लैंडफिल पर बोझ कम हुआ, लेकिन मजदूरों की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं आया। शोध में बताया गया है कि कचरा मुख्य रूप से साउथ दिल्ली के चार जोन से आता है। 46 प्रतिशत कचरा एनर्जी प्लांट में जाता है, 3 प्रतिशत कंपोस्टिंग के लिए और बाकी सीधे लैंडफिल में। घरों में सेग्रिगेशन नहीं होने से समस्या बढ़ती है। रैग-पिकर्स अनौपचारिक रूप से कचरा अलग करते हैं, लेकिन उन्हें स्वास्थ्य कार्ड या सुविधाएं नहीं मिलतीं।

शोधकर्ताओं की सिफारिश
शोधकर्ताओं ने सिफारिशें की हैं। इसमें एसडीएमसी को हर वॉर्ड में सेग्रिगेशन सेंटर बनाना चाहिए। रैग-पिकर्स को स्वास्थ्य कार्ड और सुविधाएं देनी चाहिए। मजदूरों को सालाना स्वास्थ्य जांच, अच्छी क्वालिटी का पीपीई और ट्रेनिंग देनी चाहिए। आरामघर साफ-सुथरे बनाने चाहिए। लीचेट का प्रोपर ट्रीटमेंट प्लांट लगाना चाहिए। कचरा स्रोत पर अलग करने से लैंडफिल का बोझ कम होगा और ग्रीनहाउस गैसें भी घटेंगी। ओखला लैंडफिल ओखला बर्ड सैंक्चुअरी और अन्य इको-सेंसिटिव जोनों के पास है, इसलिए इसे जल्द साफ करना जरूरी है। कोरोना महामारी के दौरान भी मजदूरों ने बिना रुके काम किया। लॉकडाउन में कचरा कम हुआ, लेकिन 73 प्रतिशत मजदूर रोजाना आते रहे।

मास्क और दस्ताने फट जाते हैं जल्दी
इग्नू की अंतर्विषयक एवं पार-विषयक अध्ययन पीठ की प्रो. शाची शाह ने बताया कि बारिश के मौसम में यह पानी खुली नालियों से बहकर आसपास के इलाकों में फैल जाता है। मजदूरों को पता है कि लीचेट ज्यादातर मानसून में बनता है लेकिन निगरानी या ट्रीटमेंट की सुविधा नहीं है। साउथ दिल्ली म्यूनिसिपल कॉर्पोरेशन (एसडीएमसी) पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट देता है लेकिन क्वालिटी बेहद खराब है। 86 प्रतिशत मजदूरों को पूरा सेट मिलता है लेकिन वे कहते हैं कि मास्क और दस्ताने जल्दी फट जाते हैं और पहनने में तकलीफ होती है। कई मजदूर सिर्फ मास्क या जूते पहनकर काम चलाते हैं। आज तक कोई डॉक्टर या हेल्थ इंस्पेक्टर साइट पर स्वास्थ्य जांच करने नहीं आया। 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed