Delhi: आबकारी घोटाला मामले में CBI की याचिका पर सुनवाई आज, अरविंद केजरीवाल समेत सभी आरोपियों को नोटिस जारी
आबकारी घोटाला मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका पर सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट सुनवाई करेगा। ट्रायल कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत 23 लोगों को आरोपमुक्त कर दिया था।
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आबकारी घोटाला मामले में ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती देने वाली सीबीआई की याचिका पर सोमवार को दिल्ली हाईकोर्ट सुनवाई करेगा। ट्रायल कोर्ट ने पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया समेत 23 लोगों को आरोपमुक्त कर दिया था।
इससे पहले मामले की सुनवाई कर रहीं न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा के खिलाफ केजरीवाल और उनके सहयोगियों ने रिक्यूजल याचिका दायर कर उनसे सुनवाई से अलग होने की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इसे खारिज कर दिया। इसके बाद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और दुर्गेश पाठक ने सुनवाई में शामिल नहीं होने का फैसला किया था। बाद में आपराधिक अवमानना की कार्रवाई शुरू होने के कारण न्यायमूर्ति स्वर्णकांता शर्मा तकनीकी वजहों से मामले से अलग हो गईं। अब इस मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति मनोज जैन की पीठ कर रही है। अदालत ने सोमवार को अरविंद केजरीवाल और अन्य आरोपियों को पेश होने के लिए नोटिस जारी किया है।
धर्म जाति में बंटे भारतीय समाज में प्रेमियों के लिए स्थान नहीं : हाईकोर्ट
हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में 2004 के अंतरधार्मिक प्रेम विवाह मामले में मोहम्मद कासिम को अपहरण और दुष्कर्म के आरोपों से बरी कर दिया है। न्यायमूर्ति यादव ने कहा, भारतीय समाज धर्म, जाति आदि आधारों पर गहराई से विभाजित, खंडित और स्तरीकृत है। अंतरधार्मिक संबंधों में युवा प्रेमियों के लिए व्यावहारिक रूप से कोई जगह नहीं है। ऐसे संबंध गंभीर परिणाम लेकर आ सकते हैं।
मामला 2004 का है, जब हिंदू युवती और मुस्लिम युवक ने प्रेम विवाह किया था। 2008 में निचली अदालत ने कासिम को अपहरण और दुष्कर्म का दोषी ठहराते हुए सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट में अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायालय ने पाया कि युवती उस समय 18 वर्ष की थी और विवाह सहमति से हुआ था। न्यायमूर्ति विमल कुमार यादव की एकल पीठ ने माना कि पीड़िता ने स्वेच्छा से युवक के साथ यात्रा की, विशेष विवाह अधिनियम के तहत विवाह किया और परिवार के दबाव में बयान बदला।
अदालत ने कहा कि 2004 में लागू दंड प्रक्रिया संहिता के प्रावधानों के अनुसार, पत्नी के मामले में (15 वर्ष से कम आयु को छोड़कर) दुष्कर्म की धारा लागू नहीं होती थी। अदालत ने पीड़िता के बयान को परिवार के सामाजिक दबाव का परिणाम बताया और उसे असंगत पाया।