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Sudarsan Pattnaik: रेत पर गढ़े सपने, जुनून ने दिलाई दुनिया में अलग पहचान; क्यों खास है उपलब्धि?
Mon, 29 Jun 2026 08:06 AM IST
Pavan
अमर उजाला
अमर उजाला
Published by: Pavan
Updated Mon, 29 Jun 2026 08:06 AM IST
सार
भरपेट भोजन के लिए कभी पड़ोसियों के यहां काम करने वाले सुदर्शन पटनायक ने कठिन परिस्थितियों के आगे कभी हार नहीं मानी। अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने पद्मश्री सम्मान सहित कई वैश्विक पुरस्कार हासिल किए और आज लाखों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत बन गए हैं।
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सुदर्शन पटनायक, सैंड आर्टिस्ट
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
संध्या का समय था। ढलते सूरज की किरणें समुद्र तट पर अपना सुनहरा रंग बिखेर रही थीं। सुनहरी रेत, नीले पानी और शांत वातावरण का यह संगम पर्यटकों को एक अद्भुत और सुकून भरा अनुभव दे रहा था। लहरों की लगातार गूंज और ठंडी समुद्री हवा इस जगह को और भी जीवंत बना रही थी। पर्यटकों की भीड़ उमड़ी हुई थी, हर कोई अपने अंदाज में इस खूबसूरत शाम का आनंद ले रहा था। इसी सुनहरे मौसम के बीच एक नवयुवक अपनी उंगलियों से रेत पर कलाकृतियां बनाने में मशगूल था। बीच से गुजरते लोग उसे देखते और आगे बढ़ जाते, लेकिन कुछ लोग उसकी बनाई आकृतियों को देखकर ठहरने को मजबूर हो जाते। कई लोग उसकी कला की सराहना कर आगे बढ़ जाते। तभी एक पर्यटक ने उसकी बनाई मूर्ति को गौर से देखते हुए कहा कि इसकी नाक कुछ ज्यादा बड़ी लग रही है। यह बात सुनकर उस युवक ने इसे चुनौती की तरह लिया। वह बार-बार समुद्र तट पर गया और तब तक उस मूर्ति को बनाता रहा, जब तक उसकी नाक बिल्कुल परफेक्ट न हो गई। यह नवयुवक कोई और नहीं, बल्कि भारत में रेत कला को नई पहचान देने वाले सुदर्शन पटनायक थे, जिन्होंने ओडिशा के पुरी जैसे छोटे शहर से निकलकर अपनी कला के दम पर दुनिया के कई देशों में भारत का नाम
रोशन किया।
समुद्र तट से शुरू हुआ सफर
सुदर्शन पटनायक का जन्म 15 अप्रैल, 1977 को ओडिशा के तटीय शहर पुरी के एक गरीब परिवार में हुआ था। वह बचपन से ही काफी रचनात्मक थे। उनकी रुचि पेंटिंग में थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि रंग और कागज खरीदना भी संभव नहीं था। उनके दादा को पेंशन के रूप में मिलने वाले मात्र 200 रुपये से किसी तरह परिवार का भरण-पोषण हो पाता था। तीन भाइयों में सबसे बड़े होने के कारण सुदर्शन ने परिवार की आर्थिक मदद के लिए महज 10 वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ दिया और पड़ोसी के घर काम करने लगे। थकाऊ कामों के बीच जब भी उन्हें समय मिलता, वे समुद्र तट पर चले जाते और रेत को ही अपना कैनवास बना लेते। बचपन में दूसरे बच्चे जहां सामान्य खेलों में व्यस्त रहते थे, वहीं सुदर्शन घंटों समुद्र किनारे बैठकर रेत से आकृतियां बनाते रहते थे। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यही शौक एक दिन उनकी पहचान बन जाएगा।
बिना ट्रेनिंग के खुद सीखी कला
सुदर्शन ने कभी किसी बड़े आर्ट कॉलेज से शिक्षा नहीं ली। उन्होंने अपनी कला को खुद ही मेहनत के दम पर निखारा। अपने जुनून को आकार देने के लिए वह बहुत कम उम्र से सुबह चार बजे उठकर समुद्र तट पर पहुंच जाते थे और रेत से नई-नई कलाकृतियां बनाते थे। किसी के जागने से पहले ही वह वापस लौट आते थे। रोज समुद्र किनारे जाकर नई आकृतियां बनाना, गलतियों को सुधारना और हर दिन कुछ बेहतर करने की कोशिश करना उनकी दिनचर्या बन गई। कई लोगों ने उनके इस शौक को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। सीमित साधनों के बावजूद लगातार अभ्यास ने उनकी कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना शुरू कर दिया। यही आत्मविश्वास आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
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विश्व मंच पर भी दिखाई प्रतिभा
लगातार मेहनत के बाद उनकी कला लोगों के बीच चर्चा का विषय बनने लगी। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, विश्व शांति और सामाजिक मुद्दों आदि पर सैंड आर्ट बनाना शुरू किया। वर्ष 1995 में पहली बार उन्हें अमेरिका में कला का प्रदर्शन करने का अवसर मिला, लेकिन वीजा न मिलने के कारण वह वहां नहीं जा सके। यह उनके लिए बड़ी निराशा थी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी मंजिल का अंत नहीं बनने दिया। वह लगातार आगे बढ़ते रहे। फिर आया वर्ष 2014, जब अमेरिका में आयोजित विश्व सैंड आर्ट प्रतियोगिता जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की। इसके बाद उनका नाम दुनिया भर में तेजी से मशहूर होने लगा।
बनाया रेत का महल
सुदर्शन पटनायक ने दर्जनों अंतरराष्ट्रीय उत्सवों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और दो दर्जन से अधिक वैश्विक पुरस्कार अपने नाम किए हैं। वर्ष 2014 में भारत सरकार ने उन्हें कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया। वर्ष 2017 में उन्होंने पुरी समुद्र तट पर दुनिया का सबसे ऊंचा सैंड कैसल (रेत का महल) बनाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया। हाल ही में उन्होंने रूस में आयोजित ग्रैंड सैंड मास्टर कप-2026 जीतकर, यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले भारतीय बनने का गौरव प्राप्त किया। आज पुरी में उनका अपना सैंड आर्ट संस्थान भी है, जहां नए कलाकारों को यह अनोखी कला सिखाई जाती है।
युवाओं को सीख
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रोशन किया।
समुद्र तट से शुरू हुआ सफर
सुदर्शन पटनायक का जन्म 15 अप्रैल, 1977 को ओडिशा के तटीय शहर पुरी के एक गरीब परिवार में हुआ था। वह बचपन से ही काफी रचनात्मक थे। उनकी रुचि पेंटिंग में थी, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि रंग और कागज खरीदना भी संभव नहीं था। उनके दादा को पेंशन के रूप में मिलने वाले मात्र 200 रुपये से किसी तरह परिवार का भरण-पोषण हो पाता था। तीन भाइयों में सबसे बड़े होने के कारण सुदर्शन ने परिवार की आर्थिक मदद के लिए महज 10 वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ दिया और पड़ोसी के घर काम करने लगे। थकाऊ कामों के बीच जब भी उन्हें समय मिलता, वे समुद्र तट पर चले जाते और रेत को ही अपना कैनवास बना लेते। बचपन में दूसरे बच्चे जहां सामान्य खेलों में व्यस्त रहते थे, वहीं सुदर्शन घंटों समुद्र किनारे बैठकर रेत से आकृतियां बनाते रहते थे। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यही शौक एक दिन उनकी पहचान बन जाएगा।
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बिना ट्रेनिंग के खुद सीखी कला
सुदर्शन ने कभी किसी बड़े आर्ट कॉलेज से शिक्षा नहीं ली। उन्होंने अपनी कला को खुद ही मेहनत के दम पर निखारा। अपने जुनून को आकार देने के लिए वह बहुत कम उम्र से सुबह चार बजे उठकर समुद्र तट पर पहुंच जाते थे और रेत से नई-नई कलाकृतियां बनाते थे। किसी के जागने से पहले ही वह वापस लौट आते थे। रोज समुद्र किनारे जाकर नई आकृतियां बनाना, गलतियों को सुधारना और हर दिन कुछ बेहतर करने की कोशिश करना उनकी दिनचर्या बन गई। कई लोगों ने उनके इस शौक को गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। सीमित साधनों के बावजूद लगातार अभ्यास ने उनकी कला को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना शुरू कर दिया। यही आत्मविश्वास आगे चलकर उनकी सबसे बड़ी ताकत बना।
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विश्व मंच पर भी दिखाई प्रतिभा
लगातार मेहनत के बाद उनकी कला लोगों के बीच चर्चा का विषय बनने लगी। उन्होंने पर्यावरण संरक्षण, विश्व शांति और सामाजिक मुद्दों आदि पर सैंड आर्ट बनाना शुरू किया। वर्ष 1995 में पहली बार उन्हें अमेरिका में कला का प्रदर्शन करने का अवसर मिला, लेकिन वीजा न मिलने के कारण वह वहां नहीं जा सके। यह उनके लिए बड़ी निराशा थी, लेकिन उन्होंने इसे अपनी मंजिल का अंत नहीं बनने दिया। वह लगातार आगे बढ़ते रहे। फिर आया वर्ष 2014, जब अमेरिका में आयोजित विश्व सैंड आर्ट प्रतियोगिता जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बड़ी उपलब्धि हासिल की। इसके बाद उनका नाम दुनिया भर में तेजी से मशहूर होने लगा।
बनाया रेत का महल
सुदर्शन पटनायक ने दर्जनों अंतरराष्ट्रीय उत्सवों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और दो दर्जन से अधिक वैश्विक पुरस्कार अपने नाम किए हैं। वर्ष 2014 में भारत सरकार ने उन्हें कला के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए पद्मश्री से सम्मानित किया। वर्ष 2017 में उन्होंने पुरी समुद्र तट पर दुनिया का सबसे ऊंचा सैंड कैसल (रेत का महल) बनाकर गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड में अपना नाम दर्ज कराया। हाल ही में उन्होंने रूस में आयोजित ग्रैंड सैंड मास्टर कप-2026 जीतकर, यह उपलब्धि हासिल करने वाले पहले भारतीय बनने का गौरव प्राप्त किया। आज पुरी में उनका अपना सैंड आर्ट संस्थान भी है, जहां नए कलाकारों को यह अनोखी कला सिखाई जाती है।
युवाओं को सीख
- सफलता के लिए महंगे साधनों की नहीं, बल्कि बड़े सपनों और उन्हें पूरा करने की लगन की जरूरत होती है।
- परिस्थितियां चाहे जैसी हों, अगर मेहनत ईमानदारी से की जाए, तो एक दिन पूरी दुनिया आपके काम को पहचानती है।