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UGC: क्या है यूजीसी का इक्विटी कानून, क्यों हो रहा इसका विरोध? जानें पूरा मामला

एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला Published by: शाहीन परवीन Updated Sat, 24 Jan 2026 05:01 PM IST
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सार

UGC Equity Rules 2026: यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने उच्च शिक्षा में समानता बढ़ाने के लिए नया इक्विटी कानून लागू किया है। इसके तुरंत बाद छात्रों ने इसका विरोध शुरू कर दिया है। क्या है यूजीसी का इक्विटी कानून और क्यों हो रहा इसका विरोध? जानिए पूरा मामला।

UGC Equity Rules 2026: What It Is and Why It’s Facing Backlash
UGC - फोटो : Amar Ujala Graphics
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विस्तार
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Equity Rules 2026: उच्च शिक्षा में समानता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) द्वारा लागू किए गए नए इक्विटी नियम अब देशभर में बहस और टकराव की वजह बनते जा रहे हैं। 13 जनवरी से लागू ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम 2026’ को जहां शैक्षणिक सुधार की दिशा में अहम कदम बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर जनरल कैटेगरी के छात्रों के बीच इसे लेकर गहरी नाराजगी उभरकर सामने आ रही है। छात्रों का एक वर्ग आशंका जता रहा है कि यह नियम कहीं योग्यता, अवसर और निष्पक्षता के सिद्धांतों को प्रभावित न कर दे।

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युवा अधिवक्ताओं ने बृहस्पतिवार को जिलाधिकारी प्रियंका निरंजन से मुलाकात कर राष्ट्रपति को संबोधित ज्ञापन सौंपा। अधिवक्ताओं ने इन नियमों को संविधान की समानता और समान अवसर की भावना के विरुद्ध बताया।
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अधिवक्ता आनंद शुक्ल की अगुवाई में सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया कि शिक्षा जैसे संवेदनशील क्षेत्र में जांच के नाम पर बनाए गए नियम किसी वर्ग विशेष को प्रभावित कर सकते हैं, जो न्यायसंगत नहीं है। अधिवक्ताओं ने कहा कि इस प्रकार के निर्णय बिना व्यापक संसदीय बहस और सामाजिक सहमति के लिए जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। 

क्या है नया कानून?

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने 15 जनवरी 2026 से ‘उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026’ लागू कर दिए हैं। इस नए नियम का मकसद उच्च शिक्षा में जातिगत भेदभाव रोकना और सभी छात्रों को बराबरी के अवसर देना है। खास बात यह है कि अब अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) के साथ-साथ अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) भी जातिगत भेदभाव की परिभाषा में शामिल किए गए हैं।


नए नियम के तहत हर विश्वविद्यालय और कॉलेज में समानता समिति बनाए जाने का प्रावधान है, जिसमें ओबीसी, महिला, एससी, एसटी और दिव्यांग वर्ग के प्रतिनिधि होंगे। समिति हर छह महीने में अपनी रिपोर्ट यूजीसी को भेजेगी। इसके अलावा, अब ओबीसी छात्र, शिक्षक और कर्मचारी भी किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव या उत्पीड़न की शिकायत सक्षम अधिकारी के पास दर्ज करा सकते हैं। हर संस्थान में एससी, एसटी और ओबीसी के लिए समान अवसर प्रकोष्ठ होना अनिवार्य है, ताकि सभी के अधिकार सुरक्षित रहे।

क्या है विरोध के पीछे की वजह?

UGC के नए रेगुलेशन लागू होने के बाद छात्रों के बीच असंतोष बढ़ गया है। विरोध करने वाले संगठनों का मानना है कि इस नियम का गलत इस्तेमाल किया जा सकता है और छात्रों या शिक्षकों को झूठे आरोपों में फंसाया जा सकता है। इसी चिंता के चलते जयपुर में करणी सेना, ब्राह्मण महासभा, कायस्थ महासभा और वैश्य संगठनों ने मिलकर ‘सवर्ण समाज समन्वय समिति (S-4)’ का गठन किया है, ताकि रेगुलेशन के खिलाफ संगठित विरोध किया जा सके।

पालन न करने पर सख्त कार्रवाई

यूजीसी ने नए ईक्विटी नियमों का पालन न करने वाले संस्थानों के खिलाफ सख्त चेतावनी दी है। आयोग ने कहा है कि जो भी कॉलेज या विश्वविद्यालय इन नियमों का पालन नहीं करेगा, उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इसमें संस्थान को UGC की योजनाओं से बाहर करना, कोर्स बंद करना, ऑनलाइन और डिस्टेंस एजुकेशन पर रोक लगाना और संस्थान की मान्यता रद्द करना शामिल है।

भेदभाव होने पर करेंगे शिकायत

यूजीसी के नए नियमों में जातिगत भेदभाव की शिकायत करने का तरीका भी बताया गया है। नियमों के अनुसार, कोई भी पीड़ित छात्र, शिक्षक या कर्मचारी हेल्पलाइन, ईमेल या ऑनलाइन पोर्टल के जरिए अपनी शिकायत दर्ज करा सकता है। वह अपनी कंप्लेंट लिखित रूप में भी दे सकता है। अगर मामला गंभीर और आपराधिक है, तो उसे सीधे पुलिस के पास भेजा जाएगा।

यूजीसी ने कहा है कि अगर शिकायतकर्ता इक्विटी कमेटी की रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं होता है, तो वह एक महीने के भीतर कॉलेज या विश्वविद्यालय में बनाए गए ऑम्बड्समैन के पास अपील कर सकता है। वहां तय समय में निर्णय लिया जाएगा। इसके अलावा, यूजीसी पूरी प्रक्रिया की निगरानी करेगा और कॉलेजों तथा विश्वविद्यालयों का रैंडम इंस्पेक्शन करके रिपोर्ट भी मांगेगा, ताकि नियम सही ढंग से लागू हो रहे हैं या नहीं, यह सुनिश्चित किया जा सके।

देखें आधिकारिक अधिसूचना 

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