26 फरवरी को पूरे देश में हिंदू राष्ट्रवाद के जनक और अभिनव भारत के संस्थापक विनायक दामोदर सावरकर की पुण्यतिथि मनाई गई। उनका निधन 1966 में हुआ था। इसी उपलक्ष्य में दिल्ली में सावरकर दर्शन प्रतिष्ठान की ओर से 26 और 27 फरवरी को अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भाग लिया था। इस कार्यक्रम को सावरकर साहित्य सम्मेलन नाम दिया गया था।
जानिए, कैसे विनायक दामोदर सावरकर को मिली 'वीर' की उपाधि
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दरअसल, साल 1936 में कांग्रेस के साथ मतभेद की वजह से सावरकर का पार्टी के भीतर विरोध होने लगा था। पूरी पार्टी और कार्यकर्ता सावरकर के विरोध में आ गए थे। लेकिन कांग्रेस में ही एक ऐसे व्यक्ति भी थे जो सावरकर के साथ खड़े हुए थे। इस व्यक्ति का नाम पीके अत्रे था जो कि मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, कवि और नाटककार थे और वीर सावरकर से बेहद प्रभावित थे।
अत्रे ने पुणे में अपने बालमोहन थिएटर के कार्यक्रम में सावरकर स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया था। इसके विरोध में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सावरकर को काले झंडे दिखाने की धमकी भी दी थी। इस विरोध के बावजूद हजारों की संख्या में लोग इस कार्यक्रम में आए और सावरकर का स्वागत कार्यक्रम संपन्न हुआ। इसी दौरान, अत्रे ने सावरकर को वीर की उपाधि से संबोधित करते हुए कहा- 'जो काला पानी से नहीं डरा, काले झंडों से क्या डरेगा?'
अत्रे के संबोधन के बाद पुणे का सभागार तालियों से गूंज उठा। उसके बाद सावरकर ने भी एक प्रभावशाली भाषण दिया कि जिसके बारे में अत्रे ने लिखा कि यह भाषण इतना प्रभावशाली था कि सावरकर ने पुणे की जनता का दिल जीत लिया था। इसमें उन्होंने कांग्रेस की कड़ी आलोचना की थी।
कैसे बने सावरकर 'स्वातंत्र्यवीर'?
जब सावरकर जेल में बंद थे तब उन्होंने 1857 की क्रांति पर आधारित विस्तृत मराठी ग्रंथ '1857 चे स्वातंत्र्य समर' लिखा था। यह ग्रंथ बेहद चर्चित हुआ था और इसी के नाम से अत्रे ने सावरकर को 'स्वातंत्र्यवीर' नाम दिया था।
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