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जानिए, कैसे विनायक दामोदर सावरकर को मिली 'वीर' की उपाधि

Fri, 28 Feb 2020 04:26 PM IST
Trainee Trainee एजुकेशन डेस्क,अमर उजाला,नई दिल्ली
एजुकेशन डेस्क,अमर उजाला,नई दिल्ली Published by: Trainee Trainee Updated Fri, 28 Feb 2020 04:26 PM IST
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वीर सावरकर (फाइल फोटो) - फोटो : Social Media

26 फरवरी को पूरे देश में हिंदू राष्ट्रवाद के जनक और अभिनव भारत के संस्थापक विनायक दामोदर सावरकर की पुण्यतिथि मनाई गई। उनका निधन 1966 में हुआ था। इसी उपलक्ष्य में दिल्ली में सावरकर दर्शन प्रतिष्ठान की ओर से 26 और 27 फरवरी को अंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर में दो दिवसीय कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में गृहमंत्री अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी ने भाग लिया था। इस कार्यक्रम को सावरकर साहित्य सम्मेलन नाम दिया गया था।



कार्यक्रम में वीर सावरकर के बारे में गहन अध्ययन रखने वाले कई विद्वानों को आमंत्रित किया गया, जो आजादी की लड़ाई में सावरकर के योगदान पर चर्चा करने के साथ उन तमाम सवालों पर चर्चा  की गई, जिसको लेकर विरोधी अक्सर सावरकर के योगदान पर प्रश्नचिह्न लगाने की कोशिश करते रहे हैं। क्या आप जानते है कि आखिर क्यों सावरकर को 'वीर' की उपाधि दी गई थी? आइए आपको बताते हैं इसके पीछे पूरी कहानी?

 

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वीर सावरकर - फोटो : SAVARKARSMARAK.COM

दरअसल, साल 1936 में कांग्रेस के साथ मतभेद की वजह से सावरकर का पार्टी के भीतर विरोध होने लगा था। पूरी पार्टी और कार्यकर्ता सावरकर के विरोध में आ गए थे। लेकिन कांग्रेस में ही एक ऐसे व्यक्ति भी थे जो सावरकर के साथ खड़े हुए थे। इस व्यक्ति का नाम पीके अत्रे था जो कि मशहूर पत्रकार, शिक्षाविद, कवि और नाटककार थे और वीर सावरकर से बेहद प्रभावित थे।

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वीर सावरकर - फोटो : SAVARKARSMARAK.COM

अत्रे ने पुणे में अपने बालमोहन थिएटर के कार्यक्रम में सावरकर स्वागत कार्यक्रम आयोजित किया था। इसके विरोध में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सावरकर को काले झंडे दिखाने की धमकी भी दी थी। इस विरोध के बावजूद हजारों की संख्या में लोग इस कार्यक्रम में आए और सावरकर का स्वागत कार्यक्रम संपन्न हुआ। इसी दौरान, अत्रे ने सावरकर को वीर की उपाधि से संबोधित करते हुए कहा- 'जो काला पानी से नहीं डरा, काले झंडों से क्या डरेगा?'

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वीर सावरकर - फोटो : SAVARKARSMARAK.COM

अत्रे के संबोधन के बाद पुणे का सभागार तालियों से गूंज उठा। उसके बाद सावरकर ने भी एक प्रभावशाली भाषण दिया कि जिसके बारे में अत्रे ने लिखा कि यह भाषण इतना प्रभावशाली था कि सावरकर ने पुणे की जनता का दिल जीत लिया था। इसमें उन्होंने कांग्रेस की कड़ी आलोचना की थी।

कैसे बने सावरकर 'स्वातंत्र्यवीर'?   
जब सावरकर जेल में बंद थे तब उन्होंने 1857 की क्रांति पर आधारित विस्तृत मराठी ग्रंथ '1857 चे स्वातंत्र्य समर' लिखा था। यह ग्रंथ बेहद चर्चित हुआ था और इसी  के नाम से अत्रे ने सावरकर को 'स्वातंत्र्यवीर' नाम दिया था। 
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