‘इस जिंदगी के दिन कितने कम हैं, कितनी है खुशियां और कितने गम हैं, लग जा गले से रुत है सुहानी, या है मोहब्बत या है जवानी’। मखमली आवाज में जब आशा भोसले का यह गीत रेडियो, टीवी पर सुनाई पड़ता है तो कानों में मिश्री सी घुल जाती है, दिल पर इश्क का खुमार छाने लगता है। ऐसे कई और गीत हैं, जो आशा भोसले की सुरीली आवाज से सजे हैं, कभी ये सुनने वालों की रूह को सुकून देते हैं तो कभी थिरकने पर मजबूर कर देते हैं। आज यह आवाज हमारे बीच नहीं है। आशा भोसले ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। उनके चले जाने के बाद हिंदी पार्श्व गायन का चौथा स्तंभ भी ढह गया।
नहीं रहा हिंदी पार्श्व गायन का चौथा स्तंभ, रफी-किशोर और लता के बाद आशा भोसले के साथ सुनहरे दौर का अंत
Remembering Asha Bhosle: दिग्गज गायिका आशा भोसले के निधन से भारतीय संगीत जगत वीरान हो गया। वह हिंदी पार्श्व गायन का चौथा स्तंभ थीं। लता मंगेशकर, मोहम्मद रफी और किशोर कुमार के जाने के बाद आशा ताई ने ही हिंदी पार्श्व गायन की विरासत को संजोकर रखा था। इस खबर में पढ़ें हिंदी पार्श्व गायन के इन चार दिग्गज कलाकारों से जुड़ी खास बातें...
आशा भोसले ने अपनी आवाज से कभी बनाया ‘दीवाना’ तो कभी किया ‘हंगामा’
पंडित दीनानाथ मंगेशकर के घर 8 सितंबर 1933 को आशा भोसले का जन्म हुआ। पिता के निधन के बाद बड़ी बहन लता मंगेशकर के पद्चिन्हों पर चलते हुए वह भी संगीत की दुनिया में आईं। आशा भोसले ने जब फिल्मी गाने गाना शुरू किया तो श्रोताओं को अपनी आवाज का दीवाना बना दिया। कई बार उनके गीतों ने खूब हंगामा भी मचाया। बॉलीवुड में हर तरह के गीतों को आशा भोसले ने अपनी आवाज दी।
50 के दशक में शुरू किया था करियर: आशा भोसले ने अपना पहला गाना मराठी फिल्म 'माझा बाल' (1943) में गाया था, इसके बोल थे ‘चला चला नवबाला…’। जबकि बॉलीवुड में उनका पहला गाना ‘चुनरिया (1948)’ फिल्म में ‘सावन आया’ था। इसे गाने के बाद उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। 50 के दशक के शुरू हुआ उनका करियर आज तक जारी था।
कई गीतों ने मचाया हंगामा: अपने संगीत करियर में कभी आशा भोसले ने ‘डॉन(1978)’ फिल्म में ‘ये मेरा दिल प्यार का दीवाना’ जैसा जोशीला गीत गाया। वहीं 1973 में रिलीज हुई फिल्म ‘अनहोनी’ में भी ‘मैंने होठों से लगाई तो हंगामा हो गया…’जैसे गीत से दर्शकों को थिरकने पर मजबूर कर दिया। 1971 की देव आनंद अभिनीत ‘हरे रामा हरे कृष्णा’ में गाया उनका गाना ‘दम मारो दम’ तो बैन तक हुआ। फिर इसी गाने के लिए उन्हें बेस्ट प्लेबैक सिंगर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला।
हर दौर के दिग्गज संगीतकारों संग किया काम: अपने संगीत करियर के दौरान आशा भोसल ने अलग-अलग दौर के कई दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया और कईयों के साथ उनकी जोड़ी काफी हिट रही। इस लिस्ट में शंकर-जयकिशन, खैय्याम, रवि, सचिन देव बर्मन, आरडी बर्मन, ओपी नैय्यर, इलैयाराजा, बप्पी लहरी और ए.आर रहमान जैसे दिग्गजों के नाम शामिल हैं। उन्होंने फिल्मों के अलावा म्यूजिक अल्बम में गाने गाए और कई सिंगल सॉन्ग भी गाए।
12 हजार गाने का रिकॉर्ड बनाया: आशा भोसले ने हिंदी के अलावा कुल 20 भारतीय और विदेशी भाषाओं में गाने गाए थे। साल 2006 में खुद आशा भोसले ने बताया था कि उन्होंने 12 हजार गाने गाए हैं। यही नहीं आशा भोसले ग्रैमी अवॉर्ड के लिए नामित होने वाली पहली भारतीय सिंगर भी हैं।
श्रोताओं के दिलों में अमर रहेंगी आशा भोसले: 12 अप्रैल 2026 को आशा भोसले की आवाज हमेशा के लिए चुप हो गई, मल्टी ऑर्गन फेल्योर से उनका निधन हो गया। इस दिग्गज गायिका ने दुनिया को अलविदा कह दिया लेकिन उनके गीत श्रोताओं के दिल में हमेशा जिंदा रहेंगे।
लता मंगेशकर ने अपने गीतों से जीता वतन के लोगों का दिल
मशहूर और दिग्गज गायिका आशा भोसले की बड़ी बहन और बॉलीवुड की स्वर कोकिला लता मंगेशकर के बिना हिंदी हिंदी पार्श्व गायन की दुनिया पूरी नहीं होती है। 28 सितंबर 1929 को लता मंगेशकर का जन्म मध्य प्रदेश के इंदौर शहर में पंडित दीनानाथ मंगेशकर के मध्यवर्गीय परिवार में हुआ। पिता से रंगमंच और गायिकी की शिक्षा मिली।
13 साल की उम्र में उठाई घर की जिम्मेदारी: लता मंगेशकर जब महज तेरह वर्ष की थीं, तब उनके सिर से पिता का साया उठ गया। पिता की असामयिक मृत्यु की कारण, पैसों के लिए उन्हें हिन्दी और मराठी फिल्मों में काम करना पड़ा।
अभिनय से शुरू किया था करियर: अभिनेत्री के रूप में उनकी पहली फिल्म ‘पाहिली मंगलागौर’ (1942) रही, जिसमें उन्होंने स्नेहप्रभा प्रधान की छोटी बहन की भूमिका निभाई। बाद में उन्होंने कई फिल्मों में अभिनय किया जिसमें, ‘माझा बाल’, ‘चिमुकला संसार’ (1943), ‘गजभाऊ’ (1944), ‘बड़ी मां’ (1945), ‘जीवन यात्रा’ (1946), ‘मांद’ (1948), ‘छत्रपति शिवाजी’ (1952) शामिल थी। ‘बड़ी मां’ में लता मंगेशकर ने नूरजहां के साथ अभिनय किया और उनकी छोटी बहन की भूमिका आशा भोंसले ने निभाई थी।
ऐसे मिला था गायिकी का मौका: साल 1949 में लता मंगेशकर ने फिल्म ‘महल’ के ‘आएगा आनेवाला’ गीत गाया। इस गीत को अभिनेत्री मधुबाला पर फिल्माया गया था। मधुबाला, लता जी के लिए लकी चार्म साबित हुईं। इस फिल्म और गाने को काफी पसंद किया गया। इसके बाद लता मंगेशकर सफलता की सीढ़ियां चढ़ती गईं और उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। लता मंगेशकर ने 14 अलग-अलग भाषाओं में 50,000 गाने रिकॉर्ड किए थे।
जब लता मंगेशकर को जहर दिया गया: लता मंगेशकर की सफलता कुछ लोगों से बर्दाश्त नहीं हुई। जलन के चलते उन्हें जहर दे दिया गया। कहा जाता है कि जहर के कारण लता मंगेशकर तीन महीने बिस्तर पर पड़ी रहीं।
गीत सुनकर भावुक हो गए थे तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू: चीन के हमले के बाद 26 जनवरी 1963 के दिन लता मंगेशकर ने ‘ऐ मेरे वतन के लोगों’ गीत गाया। इस गाने को सुनकर तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू भर आए थे।
5 साल पहले दुनिया को कहा अलविदा: लता मंगेशकर का निधन 6 फरवरी 2022 को 92 वर्ष की आयु में मल्टीपल ऑर्गन डिस्फंक्शन सिंड्रोम के कारण हुआ। निमोनिया और कोविड 19 का कारण उनका लगातार 28 दिनों तक इलाज चला था। आखिर में स्वर कोकिला का देहांत हो गया और संगीत जगत में एक खालीपन आ गया।
अपनी धुन में चलते गए किशोर कुमार और गाते गए सुनहरे तराने
किशोर कुमार हिंदी पार्श्व गायन का एक चमकता सितारा थे, उनके गीत आज भी श्रोताओं की पहली पसंद हैं। किशोर के गीतों के बिना तो हिंदी सिनेमा की कहानी और सफर अधूरा रह जाएगा। उन्होंने हिंदी फिल्मों में अपने गीतों से जान डाल दी, दर्शकों को भी खुशी से सराबोर होने का मौका दिया।
फिल्मी परिवार से नाता: किशोर कुमार का जन्म 4 अगस्त 1929 को मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में हुआ था। किशोर कुमार का असली नाम था आभास कुमार गांगुली। उनके पिताजी कुंजालाल गांगुली एक प्रसिद्ध वकील और मां गौरी देवी गृहिणी थीं। नौ भाई-बहनों में सबसे छोटे किशोर बचपन से संगीत में रुचि रखते थे। उन्हें गाने का बहुत शौक था। उनके बड़े भाई अशोक कुमार बॉलीवुड के जाने-माने अभिनेता था। हिंदी सिनेमा में किशोर कुमार ने भी एक अभिनेता और गायक के तौर पर पहचान बनाई। उनकी कॉमिक टाइमिंग, स्वभाव और स्वर में अनूठेपन ने सबको चौंका दिया।
70 के दशक में बुलंदियों को छुआ: किशोर कुमार ने कई दिग्गज अभिनेताओं को अपनी आवाज दी। लेकिन 70 के दशक में जब राजेश खन्ना के लिए उन्होंने ‘सपनों की रानी…’ और धर्मेंद्र के लिए ‘पल पल दिल के पास…’ जैसे गाने गाए तो श्रोता उनके दीवाने हो गए। बॉलीवुड में भी किशोर दा का डंका बजने लगा।
लता, रफी और आशा संग की गायिकी: किशोर कुमार ने सबसे ज्यादा गाने आशा भाेसले के साथ गाए थे। साथ ही मोहम्मद रफी और लता मंगेशकर के साथ भी उन्होंने कई हिट गाने गए। आज भी ये गाने दर्शकों की टॉप लिस्ट में शामिल हैं।
गिरती सेहत बनी निधन का कारण: 13 अक्टूबर 1987 को 58 साल की उम्र में किशोर कुमार ने दुनिया को अलविदा कहा। उनका निधन एक लंबी बीमारी और हृदय रोग की समस्या की वजह से हुआ।
प्यार का राग सुनाते रहे रफी साहब और इशारों-इशारों में चुराया सबका दिल
मोहम्मद रफी सिर्फ गायक नहीं थे, वह एहिंदी पार्श्व गायन के पारस थे। जिस भी गीत को उन्होंने अपनी मधुर और जादुई आवाज दी, वह अमर हो गया। आज भी मोहम्मद रफी के कई गीत, भजन श्रोताओं की आंखें नम करते हैं, तो कुछ रूहानी दुनिया में लेकर चले जाते हैं। रफी का संगीत सफर भी बड़ा दिलचस्प था, गायिकी के लिए उन्होंने अपना सबकुछ न्यौछावर कर दिया था।
सूफी फकीर से सीखा संगीत: रफी साहब का जन्म 24 दिसंबर 1924 को पंजाब के कोटला सुल्तान सिंह गांव में हुआ था। बचपन से ही उनका मन संगीत में लगता था जबकि घर में ऐसा कोई माहौल नहीं था। बावजूद इसके गांव में आने वाले एक सूफी फकीर को देखकर उन्होंने रियाज करना शुरू किया। फकीर की नकल उतारते हुए अपनी संगीत की यात्रा को शुरू किया।
किस्मत ने अचानक दिया बड़ा मौका: साल 1937 में लाहौर में एक प्रदर्शनी में जब मंच पर बिजली चली गई तो मशहूर गायक के.एल. सहगल ने गाने से मना कर दिया। ऐसे में आयोजकों ने 13 वर्षीय रफी को गाने के लिए कहा। जैसे ही उन्होंने सुर छेड़े, लोग मंत्रमुग्ध हो गए। यहां तक कि सहगल साहब भी उनके प्रशंसक बन गए, उन्होंने कहा था कि रफी एक दिन महान गायक बनेंगे।
कहा जाता है कि जब रफी साहब नाई की दुकान में काम करते थे तो एक ग्राहक ने उनका हुनर पहचाना और गाने का मौका दिया।
7 हजार गीत गाए: मोहम्मद रफी ने भजन, गजल, कव्वाली, देशभक्ति, प्यार और करुण रंग में रंगे गीत गाए। नौशाद, एसडी बर्मन, ओपी नैय्यर, शंकर-जयकिशन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे दिग्गज संगीतकारों के साथ काम किया। मोहम्मद रफी ने अपने करियर में करीब 7000 से अधिक गाने रिकॉर्ड किए थे।
अंतिम दर्शन में आए थे हजारों लोग: 31 जुलाई 1980 दिल का दौरा पड़ने से 55 साल की उम्र में मोहम्मद रफी का निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार एक बड़ी घटना बन गया। 10,000 से ज्यादा लोग उन्हें अंतिम विदाई देने पहुंचे।
आज आशा भोसले, लता मंगेशकर, किशोर कुमार और मोहम्मद रफी जैसे दिग्गज कलाकार और हिंदी पार्श्व गायन के चार स्तंभ हमारे बीच नहीं हैं लेकिन उनकी यादें, गीत सदा अमर रहेंगे। श्रोताओं की तारीफ उनके गीतों को हमेशा मिलती रहती है।