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विद्या बालन बनीं सेंसर बोर्ड की मेंबर, तो क्या अब फिल्मों के आएंगे अच्छे दिन?
amarujala.com- Written by: आकांक्षा सिंह
Updated Sat, 12 Aug 2017 01:35 PM IST
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विद्या बालन
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सेंसर बोर्ड में पिछले एक दिन में कई फेरबदल हो गए हैं। बोर्ड के अध्यक्ष रहे पहलाज निहलानी को अड़ियल रवैये के कारण अपनी कुर्सी गंवानी पड़ी। अब उनकी जगह गीतकार प्रसून जोशी ने कमान संभाल ली है। इस उठा-पटक के बीच एक्ट्रेस विद्या बालन का बोर्ड मेंबर बनना भी एक बड़ी खबर है।
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पा चुकीं विद्या बालन भी इस बोर्ड में शामिल हुई हैं। इस मौके पर खुशी व्यक्त करते हुए विद्या ने कहा, 'मैं उम्मीद करती हूं कि अपनी सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाउंगी। मैं इस फेज को लेकर काफी उत्साहित हूं।'
पढ़ें: सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पद से हटाए बोले निहलानी, 'अपने काम पर कोई पछतावा नहीं है'
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तो क्या अब ये माना जाए कि सेंसर बोर्ड के अच्छे दिन आने वाले हैं। पहलाज निहलानी के कार्यकाल को अधिकतर लोग सबसे खराब दौर मानते हैं। निहलानी की गाज बॉलीवुड से लेकर रीजनल फिल्मों पर भी गिरी। चाहे एक्शन फिल्म हो या वुमेन सेंट्रिक, हर फिल्म को बोर्ड की कैंची से गुजरना पड़ा। बोल्ड विषयों पर बनी फिल्मों को तो अपनी रिलीज के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।
इसलिए विद्या बालन का बोर्ड मेंबर बनना एक बोल्ड स्टेप माना जा रहा है। या यूं कहें कि सरकार ने एक ही दिन में बोर्ड की छवि बदल डाली। पहलाज निहलानी, अशोक पंडित रवाना हुए और उनकी जगह जोशी और बालन की एंट्री हुई। बालन बॉलीवुड की उन अभिनेत्रियों में शुमार हैं जो अपनी बोल्ड फिल्मों और बातों के लिए जानी जाती हैं। विद्या 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' में यकीन रखती हैं, वहीं सेंसर बोर्ड की खासतौर पर पहलाज के आने के बाद जो छवि बनी वो समाज के ऐसे ठेकेदारों से मैच करती है जो महिलाओं को 6 गज की साड़ी में लपेट देना चाहते हैं। संस्कारी सेंसर बोर्ड का तमगा तक सोशल मीडिया में दिया गया। 'लेस्बियन' और 'इंटरकोर्स' जैसे शब्दों से परहेज किया गया तो दो लोगों के बीच सेक्स तो उनके संस्कारी नियमों के खिलाफ है।
पढ़ें: इन फिल्मों पर पहलाज के एतराज हमेशा रहेंगे याद
वहीं विद्या 'द डर्टी पिक्चर' जैसी फिल्में कर राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं। सिल्क स्मिता साउथ में सेक्स सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं। उनके किरदार को बड़े पर्दे पर विद्या ने जीवंत कर दिया था। 'द डर्टी पिक्चर' बॉलीवुड में बनी सबसे बोल्ड फिल्मों में शुमार हैं। विद्या सिर्फ अलग फिल्में नहीं करतीं, बल्कि ऐसी फिल्में करतीं हैं जो समाज के मानकों को चैलेंज करती है। हाल ही में आई 'बेगम जान' भी काफी बोल्ड फिल्म थी और इसके कई सींस पर सेंसर की कैंची चली थी।
विद्या खुद बोल्ड फिल्मों में सेंसरशिप का दुख झेल चुकी हैं। इसलिए फिल्ममेकर्स की उनसे उम्मीदें बढ़ जाती हैं कि उनके आने से फिल्मों की राह आसान हो जाएगी। अब फिल्मों में 46 या 89 कट नहीं लगेंगे जैसे 'बाबुमोशाय बंदूकबाज' और 'उड़ता पंजाब' में लगाए गए थे। सेंसरशिप के जिस बुरे दौर से हमारी फिल्म इंडस्ट्री गुजर रही है वो शायद अब खत्म हो जाएगा और फिल्ममेकर्स बिना इसकी चिंता किए फिल्मों का विषय चुन पाएंगे।
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राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पा चुकीं विद्या बालन भी इस बोर्ड में शामिल हुई हैं। इस मौके पर खुशी व्यक्त करते हुए विद्या ने कहा, 'मैं उम्मीद करती हूं कि अपनी सभी जिम्मेदारियों को बखूबी निभाउंगी। मैं इस फेज को लेकर काफी उत्साहित हूं।'
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तो क्या अब ये माना जाए कि सेंसर बोर्ड के अच्छे दिन आने वाले हैं। पहलाज निहलानी के कार्यकाल को अधिकतर लोग सबसे खराब दौर मानते हैं। निहलानी की गाज बॉलीवुड से लेकर रीजनल फिल्मों पर भी गिरी। चाहे एक्शन फिल्म हो या वुमेन सेंट्रिक, हर फिल्म को बोर्ड की कैंची से गुजरना पड़ा। बोल्ड विषयों पर बनी फिल्मों को तो अपनी रिलीज के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी।
इसलिए विद्या बालन का बोर्ड मेंबर बनना एक बोल्ड स्टेप माना जा रहा है। या यूं कहें कि सरकार ने एक ही दिन में बोर्ड की छवि बदल डाली। पहलाज निहलानी, अशोक पंडित रवाना हुए और उनकी जगह जोशी और बालन की एंट्री हुई। बालन बॉलीवुड की उन अभिनेत्रियों में शुमार हैं जो अपनी बोल्ड फिल्मों और बातों के लिए जानी जाती हैं। विद्या 'फ्रीडम ऑफ स्पीच' में यकीन रखती हैं, वहीं सेंसर बोर्ड की खासतौर पर पहलाज के आने के बाद जो छवि बनी वो समाज के ऐसे ठेकेदारों से मैच करती है जो महिलाओं को 6 गज की साड़ी में लपेट देना चाहते हैं। संस्कारी सेंसर बोर्ड का तमगा तक सोशल मीडिया में दिया गया। 'लेस्बियन' और 'इंटरकोर्स' जैसे शब्दों से परहेज किया गया तो दो लोगों के बीच सेक्स तो उनके संस्कारी नियमों के खिलाफ है।
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वहीं विद्या 'द डर्टी पिक्चर' जैसी फिल्में कर राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुकी हैं। सिल्क स्मिता साउथ में सेक्स सिंबल के तौर पर जानी जाती थीं। उनके किरदार को बड़े पर्दे पर विद्या ने जीवंत कर दिया था। 'द डर्टी पिक्चर' बॉलीवुड में बनी सबसे बोल्ड फिल्मों में शुमार हैं। विद्या सिर्फ अलग फिल्में नहीं करतीं, बल्कि ऐसी फिल्में करतीं हैं जो समाज के मानकों को चैलेंज करती है। हाल ही में आई 'बेगम जान' भी काफी बोल्ड फिल्म थी और इसके कई सींस पर सेंसर की कैंची चली थी।
विद्या खुद बोल्ड फिल्मों में सेंसरशिप का दुख झेल चुकी हैं। इसलिए फिल्ममेकर्स की उनसे उम्मीदें बढ़ जाती हैं कि उनके आने से फिल्मों की राह आसान हो जाएगी। अब फिल्मों में 46 या 89 कट नहीं लगेंगे जैसे 'बाबुमोशाय बंदूकबाज' और 'उड़ता पंजाब' में लगाए गए थे। सेंसरशिप के जिस बुरे दौर से हमारी फिल्म इंडस्ट्री गुजर रही है वो शायद अब खत्म हो जाएगा और फिल्ममेकर्स बिना इसकी चिंता किए फिल्मों का विषय चुन पाएंगे।