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इस फ्रेंच फिल्म ने दादा साहब फाल्के में भरा था सिनेमा का जुनून, प्रतिदिन पांच घंटे फिल्म देखने से चली गई थी आंखों की रोशनी
एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
Published by: अमरीन हुसैन
Updated Thu, 01 Apr 2021 11:56 AM IST
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दादा साहेब फाल्के, एलिस गुई ब्लाक
- फोटो : Social media
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साउथ सिनेमा के दिग्गज अभिनेता रजनीकांत को 51वां दादा साहब फाल्के पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। केंद्रीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर ने गुरुवार को एलान किया है। कोरोना वायरस की वजह से इस बार सभी पुरस्कारों की घोषणा देरी से हुई है। दादा साहब फाल्के को भारतीय सिनेमा का सबसे प्रतिष्ठित अवॉर्ड माना जाता है। दादा साहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जन्मदाता कहा जाता है। उनका जन्म 30 अप्रैल 1870 को हुआ था। 1913 में उन्होंने 'राजा हरिशचंद्र' नाम की पहली फुल लेंथ फीचर फिल्म बनाई थी। दादा साहेब सिर्फ एक निर्देशक ही नहीं बल्कि एक जाने माने निर्माता और स्क्रीन राइटर भी थे। उन्होंने 19 साल के फिल्मी करियर में 95 फिल्में और 27 शॉर्ट फिल्में बनाई थीं।
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दादा साहेब फाल्के, एलिस गुई ब्लाक
- फोटो : Social media
भारतीय सिनेमा में दादा साहब के ऐतिहासिक योगदान के चलते 1969 से भारत सरकार ने उनके सम्मान में 'दादा साहब फाल्के' अवार्ड की शुरुआत की गई थी। बता दें कि दादा साहब फाल्के पुरस्कार भारतीय सिनेमा का सर्वोच्च और प्रतिष्ठित पुरस्कार माना जाता है। गौरतलब है कि सबसे पहले देविका रानी चौधरी को यह पुरस्कार मिला था। बीते साल इसे अभिनेता अमिताभ बच्चन को दिया गया था।
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दादा साहब फाल्के
- फोटो : सोशल मीडिया
दादा साहेब फाल्के को भारतीय सिनेमा का जन्मदाता कहा जाता है। 1913 में उन्होंने 'राजा हरिशचंद्र' नाम की पहली फुल लेंथ फीचर फिल्म बनाई थी। दादा साहेब सिर्फ एक निर्देशक ही नहीं बल्कि एक जाने माने निर्माता और स्क्रीन राइटर भी थे। उन्होंने 19 साल के फिल्मी करियर में 95 फिल्में और 27 शॉर्ट फिल्में बनाईं।
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दादा साहेब फाल्के, एलिस गुई ब्लाक
- फोटो : Social media
दादा साहेब का असली नाम धुंडिराज गोविंद फाल्के था। उनके पिता गोविंद सदाशिव फाल्के संस्कृत के विद्धान थे और मंदिर में पुजारी थे। उनकी मां द्वारकाबाई घरेलू महिला थीं। उनके तीन बेटे और चार बेटियां थीं। दादासाहब फाल्के का जन्म महाराष्ट्र के नासिक में एक मराठी परिवार में हुआ था। दादा साहेब ने अपनी शिक्षा कला भवन, बड़ौदा में पूरी की थी। वहां उन्होंने मूर्तिकला, इंजीनियरिंग, चित्रकला, पेंटिंग और फोटॉग्राफी की शिक्षा ली। 1910 में तब के बंबई के अमरीका-इंडिया पिक्चर पैलेस में ‘द लाइफ ऑफ क्राइस्ट’ दिखाई गई थी। अंग्रेजी भाषा में महिला फ्रेंच डायरेक्टर एलिस गुई ब्लाक द्वारा बनाई गई इस फिल्म को थियेटर में बैठकर फिल्म देख रहे धुंदीराज गोविंद फाल्के ने तालियां पीटते हुए निश्चय किया कि वो भी भारतीय धार्मिक और मिथकीय चरित्रों को रूपहले पर्दे पर जीवंत करेंगे।
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दादा साहेब फाल्के अवॉर्ड
- फोटो : soci
धुंदीराज फाल्के ने सिनेमा की दुनिया में उस वक्त कदम रखा जब भारत में सिनेमा का कोई अस्तित्व ही नहीं था। दादा साहेब ने ही फिल्मों को जीवन दिया और नई पहचान भी। बता दें कि दादा साहेब का निधन 16 फरवरी 1944 को हुआ था। भारतीय सिनेमा उद्योग दुनिया में हर साल सबसे ज्यादा फिल्में बनाने के लिए जाना जाता है। भारत का लगभग हर दूसरा नौजवान फिल्मों में काम करने के बारे में सोचता है, लेकिन इसको शुरू करने में दादा साहेब ने कई मुश्किलें का सामना किया।
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