भारत के बारे में क्या सोचते थे दिलीप कुमार? गणतंत्र दिवस पर सायरा बानो ने याद किया दिलचस्प किस्सा
77th Republic Day: आज 26 जनवरी को गणतंत्र दिवस के अवसर पर सायरा बानो ने एक पोस्ट शेयर किया है। इसमें उन्होंने फैंस को शुभकामनाएं देने के साथ ही दिलीप कुमार से जुड़ा किस्सा याद किया है।
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कोई भी खास मौका हो सायरा बानो को दिलीप कुमार हमेशा याद आते हैं। वे साहब से जुड़े किस्से सोशल मीडिया पर साझा करती हैं। आज गणतंत्र दिवस के अवसर पर उन्होंने इंस्टाग्राम अकाउंट से एक पोस्ट शेयर कर शुभकामनाएं दी हैं। इसी के साथ उन्होंने बताया कि दिवंगत एक्टर दिलीप कुमार भारत को लेकर क्या सोचते थे?
'मैं जितनी दूर गई, मेरा देश उतना ही मेरे करीब आया'
सायरा बानो ने इंस्टाग्राम अकाउंट से पोस्ट शेयर किया है। उन्होंने दिलीप कुमार की फोटोज शेयर की हैं। इसके साथ लिखा है, 'गणतंत्र दिवस मेरे लिए कभी कैलेंडर पर अंकित सिर्फ एक तारीख नहीं रहा। यह हमेशा से एक एहसास रहा है। मैं बचपन में इंग्लैंड चली गई और अपने बड़े होने के साल लंदन में बिताए। लेकिन अजीब बात है। दूरी ने भारत के साथ मेरे कनेक्शन को कम नहीं किया, बल्कि उसे और गहरा कर दिया। मैं जितनी दूर गई, मेरा देश उतना ही मेरे करीब आया।
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'देशों को उनके बॉर्डर या इमारतों के लिए याद नहीं किया जाता'
एक्ट्रेस ने आगे लिखा है, 'दूर रहने से मुझे एक गहरी बात का एहसास हुआ कि देशों को उनके बॉर्डर या इमारतों के लिए याद नहीं किया जाता। उन्हें उनकी इंसानियत के लिए याद किया जाता है। शांति और इंसानियत अलग-अलग विचार लग सकते हैं, फिर भी एक के बिना दूसरा नहीं रह सकता। सच्ची शांति वहीं पैदा होती है, जहां इंसानियत सांस लेती है। इस देश के हर कोने में, भीड़ भरी सड़कों से लेकर खामोश गांवों तक, एक अनकहा सच रहता है। हम अलग दिख सकते हैं। अलग-अलग भाषाएं बोल सकते हैं, अलग-अलग रीति-रिवाज मान सकते हैं..., फिर भी हमारे दिल मदद करने, देखभाल करने और एक-दूसरे के साथ खड़े होने की एक ही चाहत से धड़कते हैं'।
कैसे भारत में यकीन रखते थे दिलीप साहब?
सायरा बानो आगे लिखती हैं, 'कभी-कभी यह किसी अजनबी की तरफ से तसल्ली देने वाली एक झलक होती है। कभी-कभी मुश्किल समय में मदद के लिए हाथ बढ़ाने वाला हाथ। कभी-कभी बिना किसी आम भाषा के हंसी बांटना। ये छोटे-छोटे पल हमें बड़े-बड़े भाषणों से कहीं ज्यादा पहचान दिलाते हैं। दिलीप साहब इसी भावना में बहुत विश्वास करते थे। वह अक्सर कहते थे कि भारत की आत्मा उसकी यादगारों या इतिहास की किताबों में नहीं है, वह उसके लोगों में है। उनकी दया में। उनकी हमदर्दी में है। उनके इस विश्वास में कि हम दूसरों को ऊपर उठाकर ही आगे बढ़ते हैं। उनके लिए, इंसानियत कोई आदर्श नहीं थी। यह एक जिम्मेदारी थी।
उनका मानना था कि जब दया हमें रास्ता दिखाती है, तो नामुमकिन भी मुमकिन हो जाता है। जाति, संस्कृति, भाषा या विश्वास की हमारी सभी अलग-अलग बातों के बावजूद जो चीज हमें असल में जोड़ती है, वह है हर इंसान की इज्जत। वह इसी भारत में विश्वास करते थे। और, यही वह भारत है जिसकी हमें रक्षा करनी चाहिए। 77वें गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएं'।