'गंभीर फिल्म में बच्चे काे डायरेक्ट करना एक बड़ी चुनौती थी', अनुभव सिन्हा ने बताया कैसे जन्मी ‘अस्सी’ की कहानी
Movie Assi Director Anubhav Sinha Exclusive Interview: अपनी नई फिल्म ‘अस्सी’ के साथ निर्देशक अनुभव सिन्हा एक बार फिर समाज के उस हिस्से की ओर कैमरा मोड़ रहे हैं, जिस पर हम अक्सर नजर डालकर आगे बढ़ जाते हैं।
विस्तार
तापसी पन्नू अभिनीत फिल्म ‘अस्सी’ एक गंभीर मुद्दे पर आधारित है। इस बारे में बात करते हुए अनुभव कहते हैं कि सिनेमा उनके लिए भाषण नहीं, संवाद है। अमर उजाला से हुई खास बातचीत में उन्होंने फिल्म से जुड़े अनुभव साझा किए…
इस फिल्म की शुरुआत कहां से हुई?
मैं कभी यह तय करके नहीं चला कि मुझे सिर्फ सामाजिक फिल्में बनानी हैं। मेरे साथ ऐसा होता है कि कोई बात दिल को छू जाती है और फिर लंबे समय तक मेरे साथ रहती है। धीरे-धीरे वही एक कहानी का रूप ले लेती है। ‘अस्सी’ भी उसी तरह बनी।
आजकल लगभग रोज अखबारों में महिलाओं के साथ होने वाली घटनाओं के बारे में पढ़ते हैं। पर अब ये खबरें हमें पहले जैसा चौंकाती नहीं। अंदर के पन्नों में कहीं दबी सी रह जाती हैं। हम भी इसे पढ़कर आगे बढ़ जाते हैं। 'उनकी बदकिस्मती' कहकर पन्ना पलट देते हैं। यही बात मुझे अंदर तक लगी और यहीं से ‘अस्सी’ की शुरुआत हुई।
ऐसी फिल्में बनाते वक्त सबसे बड़ी चुनौती क्या होती है?
चुनौती सच दिखाने की नहीं, उसे दिलचस्प बनाने की है। फिल्म कोई लेक्चर नहीं है। लोग टिकट लेकर आते हैं और दो-ढाई घंटे के लिए खुद को आपके हवाले कर देते हैं। इसलिए उन्हें बांधे रखना हमारी जिम्मेदारी है।
तापसी पन्नू के साथ लगातार काम कर रहे हैं। भरोसा ज्यादा होता है या चुनौती?
मेरा और तापसी का रिश्ता भले ही दोस्ताना हो लेकिन मैं कभी यह नहीं कहता कि 'चलो, ये फिल्म कर लो।' मैं हर बार अपनी फिल्म उन्हें वैसे ही सुनाता हूं, जैसे किसी नए अभिनेता को सुनाता हूं। मैं कहानी बेचने की कोशिश करता हूं। इस फिल्म के लिए भी तापसी मेरी पहली पसंद थीं। हां, इससे पहले हम साथ में वकील का किरदार कर चुके हैं, तो सवाल था कि इसे अलग कैसे बनाएं? तो इस बात को हमने चुनौती की तरह लिया।
इस गंभीर फिल्म में सबसे मुश्किल था एक आठ साल के बच्चे से अभिनय करवाना। असल कहानी न बताकर मैं लगातार उसके लिए एक अलग कहानी गढ़ता रहता था। उसे भी असली कहानी में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वो तो बस सेट पर मजे कर रहा था।
हां, वो अभिनेता बड़ा कमाल का है। जब मुझे कोई खास एक्सप्रेशन या परफॉर्मेंस चाहिए होती थी, तो मैं उसे उसी 'दूसरी कहानी' के जरिए समझाता था। उसके लिए फिल्म कुछ और थी, हमारे लिए कुछ और। जब वह बड़ा होकर यह फिल्म देखेगा तो शायद समझेगा कि मैंने उसे थोड़ा-सा बेवकूफ बनाया था।
जब फिल्म चलती है, तो हिम्मत बढ़ती है। ऐसी फिल्में आसान नहीं होती हैं। किसी भी सामाजिक मुद्दे पर खुलकर बात करना हमेशा मुश्किल होता है। लेकिन जब ऑडियंस उसे स्वीकार करती है, तो मेरा आत्मविश्वास बढ़ता है। साथ ही जो प्रोड्यूसर और पार्टनर मेरी फिल्मों पर पैसा लगाते हैं, उनका भरोसा भी मजबूत होता है।
सुना है कि गंभीर विषय वाली फिल्मों को फाइनेंस मिलना आसान नहीं होता है?
मेरे साथ अब तक ऐसा नहीं हुआ। जिन लोगों ने मेरे साथ काम किया है, उन्हें भरोसा रहता है कि मेरी फिल्म नुकसान का सौदा नहीं है। स्टूडियो और प्रोड्यूसर्स को यकीन है कि मैं ईमानदारी से काम करता हूं और मेरी फिल्म अपनी ऑडियंस तक पहुंचती है। अब तक मेरी किसी फिल्म को नुकसान नहीं हुआ।
फिल्म इंडस्ट्री कोई अलग दुनिया नहीं है, समाज का ही हिस्सा है। जो कुछ बाहर है, वही यहां भी है। फर्क बस इतना है कि इस इंडस्ट्री के बारे में बातें ज्यादा होती हैं। कई बार जरूरत से ज्यादा बातें की जाती हैं। गॉसिप और अंदाजे भी खूब लगाए जाते हैं। मेरे एक्सपीरियंस में यहां काम करने वाली महिलाएं एक प्रोफेशनल माहौल में होती हैं। वे सार्वजनिक जगहों से ज्यादा सुरक्षित यहां महसूस करती हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यहां कोई समस्या नहीं है। सुधार की गुंजाइश हर जगह है। लेकिन सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री को निशाना बनाना भी सही नहीं है।
कमेंट
कमेंट X