वेब सीरीज ‘कप्तान’ में अभिनेता साकिब सलीम एक बार फिर उसी देसी, रॉ और दबंग अंदाज में नजर आ रहे हैं, जिसे ऑडियंस पहले भी पसंद कर चुकी हैं। इस सीरीज में उनके साथ सिद्धार्थ निगम और अंजुम शर्मा भी हैं। हाल ही में अमर उजाला से बातचीत के दौरान साकिब ने अपने किरदार, शो के एक्शन, सिद्धार्थ निगम के साथ सेट पर हुई मस्ती, प्रोड्यूसर के तौर पर आने वाली मुश्किलों और अपने करियर की भूख पर खुलकर बात की। साथ ही उन्होंने बताया कि इंडस्ट्री में किस तरह की मुश्किलों का सामना करना पड़ता है?
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Saqib Saleem Interview: साकिब सलीम हाल ही में अपने नए शो ‘कप्तान’ में नजर आए हैं। अब साकिब ने अपने शो और इंडस्ट्री को लेकर बात की। जानिए उन्होंने क्या कुछ कहा…
‘कप्तान’ करते हुए लगा कि चलो फिर से अपने टाइप का रोल मिला?
हां, बिल्कुल… काफी लंबे समय बाद मुझे फिर ऐसा किरदार मिला। ‘रंगबाज' के बाद मुझे बहुत प्यार मिला था। उसके बाद लोगों के लगातार मैसेज आते थे कि सर, वैसा कुछ और करिए, कुछ हार्टलैंड वाला काम करिए। मैं भी जिससे मिलता था, पूछता था कि यार, कुछ है क्या ऐसा? इस शो में मुझे एकदम रॉ, करप्ट और हार्टलैंड की कहानी मिली। ऐसा किरदार मिला जिसमें भरपूर स्वैग था। मुझे इसमें बहुत मजा आया। धीरे धीरे चलने में, एक्शन करने में।
हम लड़कों को एक्शन करने में बहुत मजा आता है। इस शो में तो भर भरकर एक्शन है। एक पूरे एपिसोड में तो सिद्धार्थ बस बैकफ्लिप ही मार रहा था। मैं और अंजुम एक दिन सेट पर बैठे थे। उसका एक्शन सीन चल रहा था। वह बार बार बैकफ्लिप मार रहा था, दीवार पर चढ़ रहा था, कूद रहा था। मैं और अंजुम एक दूसरे की तरफ देखकर यही सोच रहे थे कि हमसे ये सब नहीं हो पाएगा, हम तो बस गोली चलाएंगे।
एक्शन दिखने में जितना मजेदार लगता है, क्या उतना ही मुश्किल भी होता है?
बिलकुल। देखने में तो बड़ा मजा आता है, लेकिन करने में पसीना छूट जाता है। चोट भी लगती है, ये तो तय है। मुझे भी लगी थी, सिद्धार्थ को भी। लेकिन बात ये है कि सिद्धार्थ को देखकर लगता था, अगर कोई शेर के पिंजरे में घुस जाएगा, तो लगेगी ही न।
एक होता है नॉर्मल एक्शन, जो हम लोग करते हैं। बंदूक चलाई, मुक्केबाजी की। लेकिन जो वह कर रहा था, वह अलग ही स्तर का था। यहां से कूदना, वहां से छलांग लगाना, ये सब हम नहीं करने वाले। हमारा एक्शन थोड़ा जमीन पर रहता है। गाड़ी से कूद जाओ, थोड़ा भाग लो, लड़ लो, वह ठीक है।
सेट पर सिद्धार्थ निगम की सबसे ज्यादा खिंचाई किस बात पर हुई?
एक दिन शूट के दौरान बड़ा मजेदार किस्सा हुआ। सिद्धार्थ की शर्ट में ऐसे बटन लगे थे जो हल्के से खिंचने पर खुल जाते थे। उसने दीवार से बैकफ्लिप मारी। और जैसे ही नीचे उतरा, उसकी शर्ट खुल गई। बस फिर क्या था, हमने वहीं मजाक शुरू कर दिया। मैंने कहा, ये बटन ऐसे थे ही क्यों? नॉर्मल बटन नहीं लगा सकते थे क्या? फिर उसे छेड़ने लगे कि तुमने पहले से सोच रखा था क्या कि एक बैकफ्लिप मारूंगा, बटन खुलेंगे और बॉडी दिखाऊंगा। काम जितना होता था, मजाक भी उतना ही चलता था।
सिद्धार्थ में ऐसी क्या बात है जो आपको पसंद भी है और खिंचाई करने का मन भी करता है?
अरे, सिद्धार्थ की बातें तो बहुत हैं। हम लोग शूट करके आते थे और एक दिन मैंने देखा कि साहब रात को सूट बूट पहनकर कहीं जा रहे हैं। मैंने पूछा, भाई, ये क्या है? तो उसने कहा, एक इवेंट है, वहां जा रहा हूं। मैंने तो अपने मैनेजर को फोन करके पूछ लिया कि ये इवेंट हम क्यों नहीं कर रहे हैं। बरेली में सिद्धार्थ रोज सूट पहनकर निकल रहा था।
लेकिन उसकी सबसे अच्छी बात ये है कि वह बहुत सच्चा लड़का है। एक बार हम लोग बरेली में साथ खाना खा रहे थे। उसने मुझे अपनी पूरी जर्नी सुनाई। कैसे उसे ‘धूम’ मिली, क्या क्या हुआ, उसकी जिंदगी कैसी रही। मैं उसे सुनकर यही सोच रहा था कि यार, क्या खूबसूरत सफर है। छोटे शहर से आया हुआ लड़का, अपनी मेहनत से यहां तक पहुंचा है और आज इतना अच्छा कर रहा है। अगर कोई इतना अच्छा हो, तो उसकी टांग थोड़ी तो खींचनी ही चाहिए। सच्चाई ये है कि हम उसके भाई जैसे हैं।
अब आप अभिनेता के साथ-साथ प्रोड्यूसर भी हैं। आज के समय में प्रोड्यूसर होना कितना मुश्किल है?
बहुत मुश्किल है। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका में एक यूट्यूबर ने फिल्म बनाई। उसने अपनी पूरी कम्युनिटी बनाई। लोगों को फिल्म बनने का पूरा सफर दिखाया। फिर उनसे कहा कि अगर आप ये फिल्म देखना चाहते हैं, तो डिस्ट्रीब्यूटर्स को लिखिए। लाखों लोगों ने ऐसा किया। फिल्म ने बहुत अच्छा कारोबार किया। ये उदाहरण मुझे प्रेरित करता है। अगर कोई इंसान इस तरह कर सकता है, तो चीजें हो सकती हैं। लेकिन उसके लिए लगातार लगे रहना पड़ता है।
आज इंडस्ट्री में सबसे बड़ी उलझन क्या लगती है?
बहुत सारी चुनौतियां हैं। प्लेटफॉर्म की अपनी चुनौतियां हैं। अब थिएटर और ओटीटी के बीच बड़ी लड़ाई चल रही है। जब मैं आया था, तब मुझे सिर्फ थिएटर वाली फिल्में करनी थीं। अब बहुत कुछ बदल गया है। पहले एक ही रास्ता था। फिल्म बनाओ और थिएटर में रिलीज करो। अब इतने विकल्प आ गए हैं कि स्पष्टता थोड़ी कम हो गई है। कई बार लगता है कि आप प्रोड्यूसर कम और लाइन प्रोड्यूसर ज्यादा बन जाते हैं। क्योंकि कई बार चीजें इस तरह बनने लगती हैं कि चलो, ये बन रहा है तो बना लेते हैं। जबकि फिल्म इसलिए बननी चाहिए क्योंकि आप उसे बनाना चाहते हैं। मेरे हिसाब से वही असली बात है।