Exclusive: ‘सफलता नहीं मौके खत्म होने का डर है’, अगली फिल्म पर बोले वेदांग- बंटवारे का दर्द समझने का मौका मिला
Vedang Raina Exclusive Interview: फिल्म 'द आर्चीज' रिलीज हुए ढाई साल बीत चुके हैं और इस दौरान वेदांग रैना की जिंदगी काफी बदल चुकी है। जल्द ही वह इम्तियाज अली के निर्देशन में बनी फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ में नजर आएंगे। अमर उजाला से हालिया बातचीत में वेदांग रैना ने अपनी आगामी फिल्म और करियर को लेकर विस्तार से बातचीत की है।
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विस्तार
कभी नौकरी ढूंढ रहे और एमबीए की तैयारी कर रहे वेदांग आज बॉलीवुड के चर्चित युवा चेहरों में गिने जाते हैं। हालांकि, दिलचस्प बात यह है कि स्टारडम, बॉक्स ऑफिस और सोशल मीडिया की दुनिया में कदम रखने के बाद भी उनकी सबसे बड़ी चिंता सफलता नहीं, बल्कि अवसर हैं।
‘कहीं मौके मिलने बंद न हो जाएं’
हाल ही में अमर उजाला से बातचीत के दौरान वेदांग ने कहा, ‘मेरे लिए सबसे बड़ा दबाव सफलता का नहीं, बल्कि अवसरों का है। मेरी बस यही दुआ रहती है कि मुझे लगातार काम मिलता रहे, फिल्में मिलती रहें और ऐसे मौके मिलते रहें, जिनसे मैं खुद को एक अभिनेता के तौर पर साबित कर सकूं। सफलता मिल जाए तो बहुत अच्छी बात है, लेकिन मुझे सबसे ज्यादा डर इस बात का है कि कहीं मौके मिलने बंद न हो जाएं।’
‘बॉक्स ऑफिस भी कोई चीज होती है’
आज जब फिल्मों की सफलता पहले दिन के कलेक्शन और वीकेंड नंबरों से तय होने लगी है, तो वेदांग स्वीकार करते हैं कि शुरुआत में उन्हें इस दुनिया की ज्यादा समझ नहीं थी। वह कहते हैं, ‘जब मैंने ‘द आर्चीज’ की थी और उसके बाद ‘जिगरा’ की, तब मेरे लिए सबसे बड़ी बात यही थी कि मैं फिल्मों का हिस्सा बन गया हूं। लोग मुझे बड़े पर्दे पर देख सकते हैं। मुझे सच में यह नहीं पता था कि बॉक्स ऑफिस, ओपनिंग कलेक्शन और नंबर जैसी चीजें कितनी बड़ी होती हैं। मैं सिर्फ फिल्मों और अभिनय को लेकर उत्साहित था।
हां, लेकिन पिछले कुछ साल में मेरी सोच बदली है। धीरे-धीरे मुझे समझ आया कि यहां सक्सेस और बॉक्स ऑफिस नंबर्स को कितना महत्व दिया जाता है। शायद यही मेरा सबसे बड़ा बबल बर्स्ट था। लेकिन मैं आज भी कोशिश करता हूं कि खुद को सिर्फ आंकड़ों तक सीमित न रखूं।’
‘एक वक्त था जब नौकरी ढूंढ रहा था’
‘द आर्चीज’ को लेकर भले ही सोशल मीडिया पर खूब बहस हुई हो, लेकिन वेदांग उस फिल्म को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा टर्निंग पॉइंट मानते हैं। वह कहते हैं, ‘अगर मुझे ‘द आर्चीज’ नहीं मिलती तो शायद मेरी जिंदगी बिल्कुल अलग होती। मैं नौकरी ढूंढ रहा था और एमबीए के लिए अप्लाई करने की तैयारी कर रहा था। मैं अपनी जिंदगी के ऐसे मोड़ पर था, जहां सब कुछ अलग हो सकता था।’
निगेटिव रिव्यू और ट्रोलिंग पर भी वेदांग का नजरिया अलग है। उन्होंने कहा, ‘इस फिल्म ने मेरी पूरी जिंदगी बदल दी। इसलिए मैंने कभी उसे ट्रोलिंग या निगेटिविटी के नजरिए से नहीं देखा। मेरे लिए वह हमेशा एक ऐसा मौका रहेगा, जिसने मुझे यहां तक पहुंचाया।’
‘इम्तियाज सर का नाम सुना और हां कर दी’
अपनी अगली फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ के बारे में बात करते हुए वेदांग बताते हैं कि इस बार फैसला लेना उनके लिए मुश्किल नहीं था। बकौल वेदांग, ‘जब मुझे पता चला कि इम्तियाज अली सर इस प्रोजेक्ट से जुड़े हैं और मुझे इस किरदार के लिए देखा जा रहा है, तो मैंने लगभग उसी समय हां कह दी थी। मुझे न स्क्रिप्ट की जरूरत थी और न किसी दूसरी जानकारी की। मेरे पास सिर्फ फिल्म का आइडिया था, लेकिन इम्तियाज सर के साथ काम करने का मौका अपने आप में बहुत बड़ी बात थी।’
‘पगड़ी पहनी तो लगा कि बड़ी जिम्मेदारी है’
इस फिल्म में वेदांग पहली बार एक सिख किरदार निभा रहे हैं। यही वजह है कि यह फिल्म उनके लिए कई स्तरों पर खास बन गई। वह कहते हैं, ‘मेरे लिए यह सिर्फ एक नया लुक नहीं था, बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी भी थी। पगड़ी पहनना और इस किरदार को निभाना बहुत खूबसूरत एहसास था। फिल्म 1940 के दशक के उस भारत की कहानी है, जब देश का बंटवारा नहीं हुआ था। मैं उस दौर के बारे में ज्यादा नहीं जानता था। लोग कैसे रहते थे? कैसे बात करते थे? उनका रहन-सहन कैसा था? ये सब जानना और समझना मेरे लिए काफी दिलचस्प रहा। एक एक्टर के तौर पर मुझे उस दुनिया को करीब से जानने और उसे जीने का मौका मिला, जिसमें मुझे बहुत मजा आया।’
‘बंटवारे का खौफ और लोगों का दर्द समझा’
बंटवारे पर बनी फिल्म की तैयारी के दौरान वेदांग ने उस दौर और उससे जुड़ी कहानियों को करीब से समझा। वो कहते हैं, ‘इस फिल्म की शूटिंग के दौरन मैंने पार्टिशन के बारे में बहुत कुछ सीखा। इससे पहले मैंने सिर्फ अपने माता-पिता, नाना-नानी और परिवार के लोगों से कहानियां सुनी थीं। लेकिन फिल्म की रिसर्च के दौरान मुझे बंटवारे का खाैफ, लोगों का दर्द और उस दौर की तकलीफ को समझने का मौका मिला। एक अभिनेता के तौर पर भी यह मेरे लिए बहुत जरूरी था।’
‘बंटवारे की हिंसा नहीं, गुड़िया याद थी’
अमृतसर के पार्टिशन म्यूजियम का एक अनुभव साझा करते हुए वेदांग बताते हैं, ‘मैं और शरवरी रिसर्च के लिए अमृतसर गए थे। हमने पार्टिशन म्यूजियम में चार-पांच घंटे बिताए। वहां उन लोगों की रिकॉर्डेड कहानियां सुनीं, जिन्होंने बंटवारे को अपनी आंखों से देखा था। एक बुजुर्ग महिला की कहानी मेरे साथ रह गई। वह 90 साल से ज्यादा उम्र की थीं, लेकिन उन्हें बंटवारे की हिंसा से ज्यादा अपनी एक गुड़िया याद थी, जो पीछे छूट गई थी। मुझे यह बहुत खूबसूरत और भावुक बात लगी कि जिंदगी में सब कुछ खो देने के बाद भी इंसान को सबसे छोटी और मासूम चीजें याद रह जाती हैं।’
‘मैं पार्टी नहीं करता, घर पर फिल्में देखता हूं’
सोशल मीडिया पर अक्सर नजर आने वाले वेदांग खुद को काफी शर्मीला और इंट्रोवर्ट इंसान बताते हैं। वह हंसते हुए कहते हैं, ‘मुझे नहीं पता लोगों को यह पता है या नहीं, लेकिन मैं बिल्कुल भी एक्स्ट्रोवर्ट नहीं हूं। लोग सोचते होंगे कि मैं बहुत बाहर जाता हूं, पार्टी करता हूं, लेकिन मैं वैसा बिल्कुल नहीं हूं। मैं घर पर बैठकर फिल्में देख सकता हूं, किताबें पढ़ सकता हूं या म्यूजिक सुन सकता हूं। अपने साथ समय बिताने में मुझे सबसे ज्यादा खुशी मिलती है।’
‘कभी किसी का बेटा तो कभी रिश्तेदार बना देते हैं’
इंटरनेट की दुनिया में अफवाहों से बचना मुश्किल है। हालांकि वेदांग इन्हें बहुत गंभीरता से नहीं लेते। वह कहते हैं, ‘मैं अपने बारे में फैली ज्यादातर अफवाहों पर ज्यादा ध्यान नहीं देता, लेकिन कभी-कभी कुछ बातें बहुत फनी होती हैं। सबसे मजेदार तब लगता है जब लोग मुझे अलग-अलग फिल्मी परिवारों से जोड़ देते हैं। कोई कहता है मैं किसी का बेटा हूं, कोई किसी और से मेरा रिश्ता निकाल देता है। इनमें से ज्यादातर बातें पूरी तरह गलत होती हैं, लेकिन उन्हें पढ़कर कभी-कभी हंसी जरूर आ जाती है।’