गजब रात: फिल्म की स्टारकास्ट ने बताए जिंदगी की गजब रातों के किस्से, मनोज बाजपेयी से साकिब सलीम तक ने क्या कहा?
- फिल्म 'गजब रात' ओटीटी प्लेटफॉर्म पर रिलीज हो चुकी है। यह एक क्राइम-सस्पेंस थ्रिलर फिल्म है।
- अमर उजाला डिजिटल से हालिया बातचीत में फिल्म के सितारों ने कई दिलचस्प किस्से साझा किए।
- मनोज बाजपेयी ने रात में शूटिंग करने वाले कलाकारों की हालत बताई और कुछ पुरानी यादें ताजा कीं।
विस्तार
कभी दोस्तों के साथ रातभर पार्टी, कभी सुबह सात बजे उन्हीं कपड़ों में कॉलेज में प्रेजेंटेशन और कभी रात के एक बजे शूटिंग करते-करते ऐसी हालत कि आत्मा ही शरीर छोड़कर घूमने लगे। फिल्म 'गजब रात' की स्टारकास्ट के पास रातों से जुड़े ऐसे ही मजेदार किस्से हैं। अमर उजाला डिजिटल से बातचीत में मनोज बाजपेयी, दिव्या दत्ता, श्रद्धा दास और साकिब सलीम ने अपनी जिंदगी की गजब रातों के बारे में बताया। किसी को जवानी के दिनों की मस्ती याद आई, तो किसी को मुंबई में बनीं वे दोस्तियां, जो आज भी कायम हैं।
मनोज बाजपेयी: 20-22 साल की उम्र में लगता था, बस हम ही हैं!
मनोज बाजपेयी ने जवानी के दिनों को याद करते हुए कहा, 'जब हम अर्ली ट्वेंटीज में थे, 20-22 साल की उम्र में, तब रातें गजब ही होती थीं। पार्टी करते थे, रातें बिताते थे। उस उम्र में लगता था कि बस हम ही हैं और कोई नहीं है। अगले दिन पता चलता था कि बहुत लोग थे। हालांकि, अब रातों का मतलब बदल गया है। खासकर शूटिंग के दौरान रात का अनुभव बिल्कुल अलग होता है। नाइट शूट बड़ी गजब होती है। एक समय आता है, जब आप देखेंगे कि अचानक कोई किसी से बात नहीं कर रहा होता। सब एक-दूसरे से नफरत कर रहे होते हैं।'
इसके बाद मनोज ने रात में शूटिंग करने वाले कलाकारों की हालत बताई। उनका कहना था, 'शूटिंग की रातें बड़ी कमाल की होती हैं। ठीक एक बजे आपकी आत्मा शरीर छोड़कर ट्रैवल कर रही होती है और आपकी बॉडी एक्टिंग कर रही होती है। ऐसे में अगर रितेश भाई (फिल्म के निर्देशक) कहते हैं कि मनोज भाई, एक और टेक करते हैं, तो एक्सेल करने का जो पूरा जज्बा है, वह जा चुका होता है। लगता है कि यार, अब जो करना है कर लो। हमारी पिक्चर की कहानी एक रात की है, लेकिन इसे बनाते-बनाते हमें 30 रातें लगीं। तो हमारे साथ ऐसा 30 बार हुआ है। देखिए, हमारी रातें कितनी गजब रही होंगी।'
दिव्या दत्ता: लगता था बहुत मजा आएगा, लेकिन प्लान डिजास्टर हो जाता था
दिव्या दत्ता को मुंबई आने के बाद की रातें याद हैं। नए शहर में नए दोस्त बनाना, उनके साथ घूमने जाना और फिर किसी प्लान का बिगड़ जाना। लेकिन इन्हीं रातों से कुछ रिश्ते भी बने। दिव्या ने कहा, 'जब मैं मुंबई आई थी, तब बहुत सारी ऐसी रातें होती थीं, जब आप नए दोस्त बनते हैं, नए लोगों को जानते हैं। फिर आप एक साथ कहीं जाते हैं। आपको लगता है कि बहुत मजा होगा, लेकिन वह डिजास्टर हो जाता है।'
उन्होंने आगे कहा, 'लेकिन मुझे लगता है कि उन्हीं शामों और रातों से कुछ दोस्तियां जिंदगीभर के लिए बन जाती हैं। आप एक-दूसरे की गलतियां भी जानते हैं कि कहां क्या डिजास्टर कर दिया। अपनी कमजोरियां भी बताते हैं। वे दोस्तियां अब तक चल रही हैं। ऐसी बहुत सारी रातें हैं, जिन्हें मैं बता नहीं सकती। लेकिन मुझे यकीन है कि हम सबकी जिंदगी में ऐसी रातें होती हैं।'
श्रद्धा दास: रात को पार्टी, सुबह सात बजे प्रेजेंटेशन
श्रद्धा दास के कॉलेज के दिनों की रातों का हिसाब भी दिलचस्प था। उन्होंने बताया, 'रात को पार्टी करने के बाद सुबह कॉलेज में प्रेजेंटेशन देने पहुंचना होता था। नींद पूरी हुई या नहीं, इसकी चिंता बाद में होती थी। उस वक्त हम जिस कोर्ट और जिन कपड़ों में पार्टी करते थे, सीधे उठकर सुबह सात बजे उन्हीं कपड़ों में प्रेजेंटेशन देने चले जाते थे। सिर्फ शर्ट बदलते थे। मेरे लिए ये रातें गजब हुआ करती थी।'
साकिब सलीम: दिल्ली में बाइक और पराठे, मुंबई में साइकिल वाले की चाय
दिल्ली की रातों में दोस्तों के साथ बाइक पर घूमना और पराठे खाना, तो मुंबई में साइकिल वाले के पास चाय पीना। साकिब सलीम ने अपनी जिंदगी की गजब रातों को याद करते हुए कहा, 'गजब रातों की डेफिनेशन बदलती रहती है। जब आप कॉलेज में होते हैं, तो दोस्तों के साथ दिल्ली यूनिवर्सिटी की रातें अलग होती हैं। रात को बाइक पर घूमना, पराठे खाने जाना, ये सब करना। फिर आप बॉम्बे आते हो, तो बॉम्बे का अलग कल्चर है। यहां साइकिल वाले के पास चाय पीने जाते हो।'