Lantrani Review: जॉनी लीवर और जिशु सेनगुप्ता के कंधे पर टिकी ‘लंतरानी’, जी5 की इस फिल्मावली में जान नहीं है
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किसी वेब सीरीज, फिल्म या टेलीविजन शो का इन दिनों ‘कूल’ सा नाम रखने का शौक बहुत फिल्मकारों को चर्राया हुआ है। कुछ नया कहानी में न खोज पाओ तो नाम ही चौंकाने वाला सा ले आओ! ऐसा ही नाम है ओटीटी जी5 की नई फिल्मावली का, ‘लंतरानी’। पत्रकार से लेखक बने दुर्गेश सिंह हिंदी सिनेमा में बोलियों, मुहावरों और देशज शब्दों की मिठास अपनी लिखावट के जरिये घोलने की कोशिश कर रहे हैं। जी5 की फिल्मावली ‘लंतरानी’ में भी वह इस पर अपना हाथ साफ करते दिखे हैं। सीधे सपाट समझना हो तो लंतरानी का मतलब है शेखी बघारना। या ऐंवई कुछ भी बक बक करते रहना जिसका कोई ठोस अर्थ जीवन में होता नहीं है। यहां ‘लंतरानी’ तीन कहानियों की फिल्मावली है। तीनों कहानियों का ऐसा कोई गुणसूत्र तो नहीं है जो इन्हें आपस में जोड़ सके, सिवाय इसके कि तीनों कहानियां छत्तीसगढ़ में फिल्माई गई हैं और उस दौर में फिल्माई गई दिखती हैं जब दुनिया कोरोना के डर के मारे घरों में दुबकी हुई है। छत्तीसगढ़ की छवि नक्सल प्रभावित राज्य की रही है, लेकिन इस राज्य में तमाम जगहें ऐसी हैं जो देश के पर्यटन मानचित्र पर नगीने की तरह चमक सकती हैं, बशर्ते राज्य सरकार इनके बारे में कोई ठोस प्रयास करे। ऐसी ही एक जगह है छत्तीसगढ़ की, अंबिकापुर। सूबे का हिल स्टेशन।
हुड़ हुड़ दबंग में चमके जॉनी और जिशु
अंबिकापुर इलाके में शूट की गई फिल्मावली ‘लंतरानी’ की पहली कहानी ही तीनों कहानियों की सबसे दमदार कहानी है। और, इसकी ताकत बने हैं जॉनी लीवर और जिशु सेनगुप्ता। दोनों अदाकारी के धुरंधर हैं। जॉनी लीवर पुलिस के हवलदार बने हैं और जिशु सेनगुप्ता हवालात में बंद वह मुलजिम, जिन्हें पेशी पर ले जाया जाना है। सूबे में माधुरी दीक्षित आई हुई हैं। सारी पुलिस फोर्स उनकी सुरक्षा में लगी है, सो इस मुलजिम को पेशी पर ले जाने की जिम्मेदारी हवलदार की है। मालखाने से उसे एक गोली के साथ एक पिस्तौल मिलती है। बुलेट मोटरसाइकिल मिलती है जिसे वह खुद चलाने की बजाय रस्सी से बंधे मुलजिम से चलवाने में ज्यादा अक्लमंदी महसूस करता है। कहानी उस रिश्ते की है जिसे लंबे समय तक गैरकानूनी माना गया। और, कानून रद्द हो जाने के बाद भी समाज इन रिश्तों को स्वीकार तो करता ही नहीं है, इनकी खिल्ली और उड़ाता है। बीच में गौमाता है। वकीलों की दबंगई है। पुलिस की लाचारी है और है, इकलौती गोली से फायर हो जाना। जॉनी लीवर यहां गंभीर किरदार में हैं। जिशु सेनगुप्ता कहानी की ‘लंतरानी’ के अलमबरदार हैं।
सचिवजी बने प्रधान पति
दूसरी कहानी के हीरो हैं जितेंद्र कुमार। वही अपने ‘पंचायत’ के सचिव जी। इस बार एक ऐसे गांव की सरपंच के पति बने हैं, जिनको गांव के लिए आने वाला सरकारी अनुदान इसलिए नहीं मिल पा रहा क्योंकि गांव के बाकी चार पंच खाता खोलने के फॉर्म पर दस्तखत नहीं कर रहे। हो सकता है कि पंचायती राज का छत्तीसगढ़ में कोई अलग कानून हो क्योंकि उत्तर प्रदेश में तो ऐसे खातों के संचलन का अधिकार प्रधान और ग्राम विकास अधिकारी के पास ही होता है। प्रधान दंपती खाता खुलवाने के लिए जिला विकास अधिकारी के दफ्तर के बाहर धरना देता है। मुश्किलें आती हैं। सरकारी अमला आता है। बस, हल नहीं आता। पूरा कार्यकाल महिला प्रधान का इसी मशक्कत में गुजर जाता है। धरना स्थल छोटे मोटे घर में तब्दील हो जाता है और अगला पंचायत चुनाव आ जाता है। दोनों फिर पर्चा भरने पहुंच जाते है। यहां पूरी ‘लंतरानी’ है। प्रधान दंपती का मौन प्रदर्शन है और सरकारी अमले की पूरी कोशिश इन दोनों को हाशिये पर डाले रखने की है।
कोविनाश बेचिए, काम पर चलिए
फिल्मावली ‘लंतरानी’ के नमक का आयोडीन दूसरी कहानी तक आते आते उड़ चुका है। तीसरी कहानी ‘सैनिटाइज्ड समाचार’ एक बंद होने की कगार पर पड़े चैनल की है। इसकी स्टार एंकर कोविड संक्रमण के चलते अपने किराए के घर में कैद है। चैनल के सारे लोग नमकीन की पैकिंग से बिजली का बिल भरने के जुगाड़ में हैं। एक प्रायोजक इस बीच चैनल के भाग मे अपना राशि परिवर्तन करता है। इस नए संक्रमण काल में सबको अपने वेतन की उम्मीद दिखती है। बोलोराम दास इस कहानी को व्हीलचेयर पर खिसकाने की पूरी कोशिश करते हैं, लेकिन आधी कहानी तक पहुंचते पहुंचते उबासी आने लगती है और देखने वाला इसी बीच में सो भी जाए तो हैरानी नहीं है।
फिर फेल रही जी5 की प्रयोगशाला
जी5 की चर्चा इन दिनों इसकी वेब सीरीज ‘सनफ्लॉवर’ के अगले सीजन में अदा शर्मा के बार डांसर का रोल करने के लिए हो रही है। ‘द केरल स्टोरी’ के ओटीटी अधिकार खरीदकर भी इसने हिम्मत दिखाई है। लेकिन थोड़ी हिम्मत इस ओटीटी को चलाने वालों को ‘लंतरानी’ जैसी कहानियों के लिए न करने में भी दिखानी चाहिए। आखिर, दर्शक उनको पैसे देकर ये सब देख रहा है। तीन कहानियों के इस कॉकटेल का स्वाद पहली कहानी के खत्म होते ही बिगड़ जाता है। जॉनी लीवर और जिशु सेनगुप्ता को देखने का लालच दर्शक को कहानी के कोर्टरूम ड्रामा तक ले तो आता है लेकिन निर्देशक कौशिक गांगुली की ये शॉर्ट फिल्म बस एक औसत फिल्म बनकर रह जाती है। अप्पू प्रभाकर के बनाए फ्रेम जरूर याद रह जाते हैं। दूसरी और तीसरी कहानी बहुत बोरिंग हैं। जितेंद्र कुमार ने कब ये शॉर्ट फिल्म करने को हामी भरी होगी, वही जानें लेकिन इस तरह के किरदार उनकी साख पर बट्टा ही लगाते हैं। वैसे दुर्गेश सिंह के नाम से पहले, जिक्र इस बात का भी है कि तीनों कहानियां लिखने के साथ साथ उन्होंने इन्हें इकट्ठा भी किया है!