Chand Mera Dil Review: अभिनय का नूर भी, इश्क का गुरूर भी और कहानी से दूर भी; कैसी है अनन्या-लक्ष्य की फिल्म?
Chand Mera Dil Film Review: फिल्म ‘चांद मेरा दिल’ 22 मई को सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। अनन्या पांडे और लक्ष्य के अभिनय से सजी यह फिल्म कैसी है? यहां जानिए...
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
‘चांद मेरा दिल’ एक ऐसी फिल्म है जिसका ट्रेलर देखकर आप अंदाजा नहीं लग सकते कि यह फिल्म कैसी होगी? अगर आपने ट्रेलर देखकर इसकी कहानी का अंदाजा लगाया है तो आप सिनेमाघर में खुद को गलत पाएंगे।
फिल्म की रिलीज से पहले ही इसके गाने दर्शकों को पसंद आए जिसके चलते फिल्म से भी काफी उम्मीदें बंध गई थीं। मगर सिर्फ अभिनय अच्छा होने से पूरी फिल्म नहीं चलती। इस रिव्यू में जानिए कहां अच्छी शुरुआत के बाद भी फीकी पड़ी फिल्म की चांदनी ?
कहानी एक यंग कपल की है। इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ने वाले आरव (लक्ष्य) और चांदनी (अनन्या) को एक-दूसरे से प्यार हो जाता है। फिर दोनों से एक गलती होती है और दोनों परिवार के खिलाफ जाकर शादी कर लेते हैं। मगर कम उम्र में ज्यादा जिम्मेदारियों का बोझ जल्द ही दोनों के बीच दूरिया पैदा कर देता है। इसके बाद शुरू होती है असली कहानी। इश्क में इंतजार, दर्द और इम्तिहान का सफर। अब इस सफर में क्या-क्या मोड़ आते हैं यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।
कैसा है अभिनय?
फिल्म में आपको अनन्या पांडे का 2.0 वर्जन देखने को मिलेगा। वो यहां 'तू मेरी मैं तेरा मैं तेरा तू मेरी' की तरह ओवरएक्टिंग नहीं करतीं। उनकी एक्टिंग देखकर आप वाकई यकीन नहीं कर पाएंगे कि यह अनन्या ही हैं। पूरी फिल्म में कोई ऐसा सीन नहीं है जहां वो कमजोर नजर आई हों। फिल्म देखकर आप उन्हें ट्रोल करना बंद कर देंगे।
लक्ष्य सुपरस्टार मटेरियल हैं। उनके अभिनय में आपको कई जगह रणबीर कपूर की झलक मिलती है। उन्होंने अपने किरदार में प्यार, दर्द और गुस्से हर इमोशन को बखूबी हैंडल किया है। पूरी फिल्म लक्ष्य और अनन्या के इर्द-गिर्द ही बुनी गई है। बाकी कलाकारों का फिल्म में नाम का ही रोल है।
कैसा है निर्देशन?
फिल्म को विवेक सोनी ने निर्देशित किया है, जो इससे पहले 'मीनाक्षी सुंदरेश्वर' और 'आप जैसा कोई' जैसी लीक से हटकर रोमांटिक फिल्में बना चुके हैं। इस बार भी विवेक कुछ नया लेकर आए थे। फिल्म की शुरुआत भी अच्छी थी पर इंटरवल के बाद फिल्म का स्क्रीनप्ले एकदम बोझिल हो जाता है। सेकंड हाफ में फिल्म को इतना इधर से उधर घुमाया गया है कि एक वक्त बाद दर्शक इसके खत्म होने का इंतजार करने लगते हैं।
अनन्या और लक्ष्य ने इस फिल्म को अपने कंधों पर अच्छी तरह संभाला था। अगर विवेक इसे थोड़ा बेहतर निर्देशन देते तो फिल्म बेहतर हो सकती थी। कुछ सीन थे जिन्हें बेहतर तरीके से दिखाया जा सकता था। कुछ किरदार थे जिनको फिल्म में और डेवलप किया जा सकता था।
कहां रह गई कमी?
फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी इसकी भटकती कहानी है। जिस तरह कहानी में किरदार नहीं जानते कि उन्हें क्या करना है, वैसे ही फिल्म के लिखने वाले राइटर्स का भी हाल था। कहानी पर विवेक सोनी के साथ तुषार परांजपे और अक्षत घिल्डियाल ने काम किया है पर तीन लोग मिलकर भी इसे एक सही दिशा नहीं दे पाए।
फिल्म की शुरुआत जितनी अच्छी थी, अंत उतना ही खराब। फिल्म के कई सीन से आप कनेक्ट करते हैं। रिश्तों के टूटने की वजह, पार्टनर से एक्सपेक्टेशन और तलाक के बाद का माहौल सब आपको असल सा लगता है पर क्लाइमैक्स तक आते-आते सब गड़बड़ हो जाती है।
बॉलीवुड की रोमांटिक फिल्मों में कई बार राइटर्स अलग क्लाइमैक्स लिखने का रिस्क तो लेते हैं पर अंत तक आते-आते वो हैप्पी एंडिंग दिखाने के फेर में फंस जाते हैं और इन सबके बीच पिसता है दर्शक। जो उम्मीद करता है कुछ नए की, पर मिलता है वही पुराना फॉर्मूला।
देखें या नहीं?
अनन्या पांडे और लक्ष्य का बेहतरीन अभिनय देखना चाहते हैं तो इसे देख सकते हैं। किसी टूटे हुए रिश्ते से गुजरे हैं तो यह आपको अपनी कहानी सी लग सकती है पर इसके अलावा इसे देखने की कोई बड़ी वजह नहीं।