Satrangi Review: बदला-रंजिश और जातिवाद, पुराने पैकेज में बासी कहानी है ‘सतरंगी’; कैसा रहा आरजे महवश का काम?
Satrangi Badle Ka Khel Review In Hindi: आरजे महवश की एक्टिंग डेब्यू सीरीज ‘सतरंगी: बदले का खेल’ रिलीज हो चुकी है। देखने से पहले जानिए कैसी है छह एपिसोड वाली यह सीरीज…
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बदला, गरीब और जाति विशेष के लोगों के साथ भेदभाव, बाहुबलियों का गैंगवार और अमीर लड़की का गरीब व अपने ही नौकर से प्रेम प्रसंग… साथ ही एक सामाजिक मुद्दे पर बात करने का प्रयास, बस ही ये ही है आरजे महवश की एक्टिंग डेब्यू सीरीज ‘सतरंगी: बदले का खेल’ की कहानी।
इस कहानी को हम 80-90 के दशक से देख रहे हैं, जहां गरीब हीरो के परिवार के साथ कुछ अमीर और बाहुबली गलत करते हैं, इसके चलते वो बड़ा आदमी नहीं बन पाता है। फिर वो उनसे बदला लेने की ठानता है, इस दौरान उसे अपने बाहुबली दुश्मनों की बेटी से ही प्यार हो जाता है।
लेकिन बदले की आग उसे प्यार से ऊपर ले जाती है और वो एक-एक करके अपना बदला लेता है और अपने समाज के लिए मिसाल खड़ी करता है। ‘सतरंगी’ ने भी इसी कहानी को एक बार फिर से दिखाया, जहां उसे इसे दिखाने में छह एपिसोड और हजारों गालियां लग गईं।
कहानी
सीरीज की शुरुआत एक व्यक्ति की दिल दहला देने वाली मौत से होती है। सीरीज की कहानी बबलू महतो (अंशुमन पुष्कर) के इर्द-गिर्द घूमती है। जो बिहार के बाहुबली से अपना बदला लेना चाहता है। बबलू एक जाति विशेष से आता है, जिसके साथ ऊंची जाति के लोगों ने काफी गलत किया है।
कभी आईएएस का प्रीलिम्स पास करके अफसर बनने का सपना देखने वाले बबलू के साथ कुछ ऐसा होता है कि वो अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए लौंडा नाच करने लगता है, जिससे उसे बचपन में सख्त नफरत थी और खिलाफ था। हालांकि, इसके पीछे उसका मकसद कुछ और है। फिर शुरू होता है बदले का खेल।
कहानी में वो ही ठाकुर-पंडितों की टसल, दो बाहुबलियों की दुश्मनी, एक लुका-छिपी वाली प्रेम कहानी और लौंडा नाच को भी प्रमुखता से दिखाया गया है। लौंडा नाच आज भी बिहार में होता है।
कहीं न कहीं मेकर्स का प्रमुख मुद्दा लौंडा नाच करने वालों के दर्द और एक जाति विशेष के साथ ऊंची जाति के लोगों द्वारा किए जाने वाले भेदभाव को दिखाना है। लेकिन इसको दिखाने के लिए जो कहानी बुनी गई है, वो काफी प्रेडिक्टेबल और देखी हुई है।
पहले एपिसोड से ही आप कहानी को समझ जाते हैं और फिर जैसा-जैसा आप सोचते जाते हैं, वैसा-वैसा ही होता जाता है। कैसे दो बाहुबलियों की टसल का फायदा उठाकर बबलू अपना बदला लेता है और क्या वो अपने बदले में सफल हो पाता है? ये जानने के लिए आपको छह एपिसोड वाली ‘सतरंगी’ देखनी पड़ेगी। हालांकि, कहानी एक ऐसे मोड़ पर खत्म होती है, जो अगले सीजन का भी हिंट देती है।
कैसी है सतरंगी?
सतरंगी शुरू से ही इंटेंस माहौल बनने की कोशिश करती है। लेकिन अधिकांश मौके पर ये सिर्फ एक कोशिश ही रह जाती है। क्योंकि कहानी में दुश्मनी, प्रेम कहानी और बदला कुछ भी नया नहीं है। सब कुछ हम कई बॉलीवुड फिल्मों व सीरीज में पहले ही देख चुके हैं।
कहानी अपने प्रमुख मुद्दे और सामाजिक संदेश देने की उथल-पुथल में भटककर रह जाती है। कई बार तो आपको लगता है कि ये कुछ भी चल रहा है। बेशक मेकर्स का आइडिया अच्छा था, लेकिन कागज पर ये कहानी इस कदर कमजोर है कि कुछ अच्छी परफॉर्मेंस भी इसे ऊपर नहीं उठा पाते।
यही कारण है कि कई मौकों पर सीरीज खिंची हुई लगती है, जो शायद पांच एपिसोड में भी खत्म हो सकती थी। कुछ सीन में दोहराव और गालियों की तो भरमार है। सीरीज में एक एंगल एलजीबीटीक्यू का भी जोड़ा गया है, जो जबरन ठूंसा हुआ लगता है।
मेकर्स ने सोचा कि जब जातिवाद, सामाजिक परिवेश और लौंडा नाच जैसे मुद्दों को उठा ही रहे हैं, तो एक ये मुद्दा भी क्यों अछूता रहे, इसे भी घुसेड़ ही दो। हालांकि, सिर्फ इसे दिखाते हैं, इस पर बात नहीं करते। सीरीज कई अच्छे मुद्दों और विषयों को उठाती है, लेकिन उन्हें उस गंभीरता से बता नहीं पाती।
एक्टिंग
‘सतरंगी’ आरजे महवश का पहला एक्टिंग प्रोजेक्ट है। हालांकि, उनका किरदार उतना मजबूत नहीं है। लेकिन हां, कहानी का एक अहम अंग जरूर है। एक्टिंग की बात करें तो महवश जितनी बार आती हैं, अपने किरदार से इंसाफ करती हैं।
हां, डायलॉग डिलीवरी पर अभी काम करने की जरूरत है, जो शायद समय के साथ निखर जाएगा। कई मौकों पर उनके एक्सप्रेशन भी गुस्से, प्यार और इमोशन में एक जैसे ही रहते हैं।
बबलू महतो बने अंशुमान पुष्कर एक बार फिर अपने अभिनय से प्रभावित करते हैं। हालांकि, उन्हें ऐसे किरदारों में पहले भी देखा जा चुका है, इसलिए कुछ नयापन तो नहीं लगता। लेकिन हर बार की तरह उनकी मेहनत इस बार भी साफ दिखती है। लौंडा नाच करते समय लाली के रूप में वो वाकई कमाल करते हैं।
कुमुद मिश्रा बाहुबली सोना सिंह के किरदार में वो ही काम करते हैं, जो वो इससे पहले भी कई फिल्मों-सीरीज में कर चुके हैं। हालांकि, वो उसमें जचते हैं और अच्छा काम करते हैं। उनकी डायलॉग डिलीवरी से लेकर एक्सप्रेशन तक सबकुछ बढ़िया लगता है। कुछ-कुछ सीन में उनके किरदार का खौफ भी साफ झलकता है।
इसके अलावा सीरीज के बाकी कलाकारों उपेंद्र चौहान, अतुल सिंह, सद्दाम हुसैन और आमीर खान ने भी अपने-अपने किरदार से इंसाफ किया है। हां, कई मौकों पर कुछ किरदारों का अभिनय ओवरएक्टिंग लगता है।
निर्देशन
जय बसंतु सिंह का निर्देशन कई मौकों पर कमजोर लगता है। बेशक उन्होंने ग्रामीण माहौल को अच्छे से दिखाया है। हालांकि, कई मौकों पर सीरीज को देखकर ऐसा लगता है, जैसे कोई दोयम दर्जे की फिल्म या सीरीज देख रहे हों। कैमरा वर्क और लाइटिंग ऐसी है कि सतरंगी ए क्लास सीरीज ही नहीं लगती, जो हैरान भी करता है।
स्क्रीनप्ले में कई जगहों पर दोहराव दिखता है, जो सिर्फ कहानी को खींचता है। आरजे महवश से लेकर कई किरदार और विषय ऐसे हैं, जिन्हें कहानी में छुआ गया है, लेकिन उन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया। कुछ सीन जबरन ठूंसे हुए से लगते हैं।
देखें या न देखें
सीरीज का इंटेशन सही है, आइडिया और मुद्दे सही उठाये गए हैं, लेकिन कहानी लिखी कमजोर है। इसलिए सही आइडिया को भी अच्छे से उतारा नहीं जा पाता। एक्टिंग ने सीरीज को उठाने की पूरी कोशिश की है। लेकिन निर्देशन, कैमरा वर्क और लाइटिंग व कलर मैनेजमेंट इसको एक दोयम दर्जे की सीरीज बना देता है। लेकिन फिर भी अगर आप एक्शन, गालियों और मारधाड़ वाले कंटेंट को पसंद करते हैं, तो ये छह एपिसोड भी आप झेल ही लोगे।