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गैंग्स आफ वासेपुर
Updated Fri, 10 Aug 2012 04:05 PM IST
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यह फिल्म भी किसी पॉपुलर बॉलीवुड फिल्म की तरह प्रतिशोध की कहानी बयान करती है। मगर बदले की इस कहानी का विस्तार किसी उपन्यास की तरह फैलाव लिए है। ढेर सारी घटनाएं, चरित्र, उनके आपसी संबंध और बैकड्राप में चल रही राजनीतिक उथल-पुथल। ये घटनाएं आजादी के पहले से लेकर मौजूदा सदी के शुरुआती वर्षों तक फैली हुई हैं।
अनुराग ने बिहार के धनबाद जिले में कोयला खदान माफिया की आपसी रंजिश की इस कहानी को बयान करते वक्त परिवेश और चरित्र की छोटी से छोटी बारीकियों पर्दे पर उतारा है। यह अनुराग के निर्देशन का कमाल है कि उन्होंने डाक्यूमेंट्री जैसी शैली का इस्तेमाल करते हुए भी फिल्म में नाटकीयता बरकरार रखी है और कहानी को ऐसा ट्रीटमेंट दिया है कि स्क्रीन से नजर हटाना मुश्किल हो जाता है।
कहानी
यह कहानी है सरदार खान यानी मनोज वाजपेयी के प्रतिशोध की। इसकी शुरुआत उस वक्त होती है जब ब्रिटिश राज का खात्मा होने जा रहा था और लोगों के किस्सों में शामिल हो चुके सुल्ताना डाकू को सरदार खान के पिता शाहिद खान ने चुनौती दी थी। इसका खामियाजा उसे एक कोयला खदान का मामूली मजदूर बनकर उठाना पड़ा।
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पत्नी की मौत के बाद शाहिद तय करता है कि उसे भीड़ में नहीं खोना और सत्ता हासिल करनी है। वह खदान मालिक रामाधीर सिंह का खास बन जाता है मगर एक दिन रामाधीर सिंह समझ जाता है कि शाहिद आगे चलकर उसकी ही सत्ता को चुनौती देगा। एक साजिश के तहत वह शाहिद को खत्म कर देता है मगर उसका बेटा वहां से भाग निकलता है। एक उम्र के बाद वह प्रतिशोध की भावना से भरा वापस लौटता है- रामाधीर सिंह को मिटाने के संकल्प के साथ।
ठीक उसी तरह जैसे गैंग्स आफ न्यूयार्क में हम लियोनार्डो डि-कैप्रियो की न्यूयार्क में प्रतिशोध से भरी वापसी देखते हैं। कहानी एक दिलचस्प मोड़ पर आकर ठहर जाती है। आगे की कहानी के लिए गैंग्स आफ वासेपुर के दूसरे भाग की प्रतीक्षा करनी होगी।
निर्देशन
अनुराग कश्यप ने फिल्म का ओपनिंग एक्शन सीक्वेंस शानदार तरीके से फिल्माया है, जो ब्राजीलियन फिल्म सिटी आफ गॉड के क्लासिक ओपनेलिंग सीक्वेंस की याद दिलाता है। ठीक उसी तरह एक खास मोड़ पर पहुंचकर फिल्म अतीत में लौट जाती है। अनुराग हमेशा अपनी फिल्म के परिवेश और चरित्रों पर बहुत ध्यान देते हैं। उनका यह परफेक्शन यहां भी नजर आता है। इस फिल्म के लिए अनुराग कश्यप और पटकथा लेखक जिशान क़ुरैशी ने काफी रिसर्च की है।
एक बड़े बजट और कैनवस की फिल्म होने के बावजूद अनुराग फिल्म को बेवजह भव्य बनाने के लालच में नहीं पड़े। उन्होंने इंडिपेंडेंट सिनेमा की शैली में ही फिल्म को प्रस्तुत किया है। ज्यादातर घटनाएं वास्तविक लोकेशन में शूट की गई हैं। बीच के हिस्से में फिल्म थोड़ी सी उलझती हुई लगती है मगर जल्दी ही फिर से पटरी पर आ जाती है। फिल्म के संवाद में गालियों की भरमार है मगर अनुराग ने उसका इस्तेमाल बड़ी समझदारी से परिवेश और चरित्र को वास्तविक बनाने में किया है।
संगीत
आम तौर पर गीत-संगीत गैंग्स आफ वासेपुर जैसी फिल्मों के मिजाज से मेल नहीं खाता मगर अनुराग की दूसरी बड़ी खूबी है एक यथार्थवादी कहानी को लिरिकल तरीके से फिल्माना। देव-डी और गुलाल की तरह यहां भी उन्होंने संगीत का बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया है। स्नेहा खानवलकर ने फिल्म में कैरीबियन चटनी म्यूजिक की शैली का इस्तेमाल किया है। इस संगीत में एक किस्म की ताजगी है। आइ एम हंटर’, ‘वुमानिया’, ‘जिया तू हजार साला..’ जैसे गीतों के बोल और संगीत दोनों जबरदस्त हैं। मनोज तिवारी की आवाज का इस्तेमाल अनुराग ने ऐसी ड्रामेटिक सिचुएशन में किया है कि दर्शक भी चकित रह जाते हैं।
क्यों देखें
अगर आप अनुराग कश्यप स्टाइल की फिल्मों के फैन है तो यह फिल्म आप मिस नहीं कर सकते। यह फिल्म इसलिए भी देखनी चाहिए क्योंकि यह मेनस्ट्रीम सिनेमा में कहानी कहने का एक नया स्टाइल डेवलप कर रही है। यह एक विचारोत्तेजक फिल्म है जो राजनीति, पुलिस और माफिया के गठजोड़ की न जाने कितनी बार कही गई कहानी को एक नए नजरिए से प्रस्तुत करती है और आपको उन कारणों की तह में ले जाती है।
क्यों न देखें
फिल्म में हिंसा की अति आपको विचलित कर सकती है। कई दृश्य वीभत्स हैं और सामान्य रुचि के दर्शकों को शायद नहीं पसंद आएंगे। फिल्म में गालियों की भरमार भी इसे परिवार के साथ न देखे जाने लायक फिल्म का दर्जा देती है।
एक्सट्रा शॉट्स
चटनी संगीत आखिर क्या है? दरअसल बिहार-झारखंड से पलायन कर चुके कलाकारों ने ही इसका अस्तित्व बचाकर रखा है। यह संगीत कैरेबियन जीवनशैली का अभिन्न अंग है। चटनी म्यूजिक दरअसल ढोलक, धानताल और हारमोनियम के साथ तैयार किया जाता है। चटनी म्यूजिक के गीत के बोल प्राय: हिंदी, भोजपुरी और अंग्रेजी के मिश्रण का इस्तेमाल करते हैं। कई भाषाओं के मिश्रण के कारण ही इसे चटनी म्यूजिक कहा जाता है। यह संगीत वेस्ट इंडीज में बसे बिहार के लोगों में आज भी बेहद लोकप्रिय है।
इस फिल्म की शुरुआत तब हुई जब अनुराग कश्यप ने जिशान कादरी की आठ पन्नों में लिखी कहानी को पढ़ा। जिशान खुद वासेपुर के रहने वाले हैं। अनुराग ने कहानी सुनी और हैरत में पड़ गए। उन्होंने जिशान से कहा कि वे इस विषय पर और शोध करें। जिशान ने करीब एक महीने तक शोध किया और दोबारा अनुराग से मिले और उन्होंने अपनी अब तक की सबसे महंगी फिल्म बनाने का फैसला कर लिया। अभी कुछ ही दिनों पहले यह खबरें आई थीं कि जिशान को वासेपुर से धमकियां मिली हैं।
अपनी समीक्षा में हमने एक जगह 'सिटी आफ गॉड' का जिक्र किया है। जिन्होंने यह फिल्म नहीं देखी है उन्हें बताना चाहेंगे कि इस फिल्म का ओपेनिंग सिक्वेंस विश्व सिनेमा के कुछ चुनिंदा ओपेनिंग सिक्वेंस में गिना जाता है। यह रियो डि जेनेरियो के पास के एक कसबे में आर्गेनाइज्ड क्राइम के डेवलप होने की कहानी है।
बैनर: वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स
निर्माता: अनुराग कश्यप, सुनील बोहरा, गुनीत मोंगा
निर्देशक: अनुराग कश्यप
संगीत: स्नेहा खानवलकर
कलाकार: मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दकी, पियूष मिश्रा, रीमा सेन, जयदीप अहलावत, रिचा चड्ढा, हुमा कुरैशी, राजकुमार यादव, तिग्मांशु धुलिया
रेटिंग: ***1/2
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अनुराग ने बिहार के धनबाद जिले में कोयला खदान माफिया की आपसी रंजिश की इस कहानी को बयान करते वक्त परिवेश और चरित्र की छोटी से छोटी बारीकियों पर्दे पर उतारा है। यह अनुराग के निर्देशन का कमाल है कि उन्होंने डाक्यूमेंट्री जैसी शैली का इस्तेमाल करते हुए भी फिल्म में नाटकीयता बरकरार रखी है और कहानी को ऐसा ट्रीटमेंट दिया है कि स्क्रीन से नजर हटाना मुश्किल हो जाता है।
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कहानी
यह कहानी है सरदार खान यानी मनोज वाजपेयी के प्रतिशोध की। इसकी शुरुआत उस वक्त होती है जब ब्रिटिश राज का खात्मा होने जा रहा था और लोगों के किस्सों में शामिल हो चुके सुल्ताना डाकू को सरदार खान के पिता शाहिद खान ने चुनौती दी थी। इसका खामियाजा उसे एक कोयला खदान का मामूली मजदूर बनकर उठाना पड़ा।
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पत्नी की मौत के बाद शाहिद तय करता है कि उसे भीड़ में नहीं खोना और सत्ता हासिल करनी है। वह खदान मालिक रामाधीर सिंह का खास बन जाता है मगर एक दिन रामाधीर सिंह समझ जाता है कि शाहिद आगे चलकर उसकी ही सत्ता को चुनौती देगा। एक साजिश के तहत वह शाहिद को खत्म कर देता है मगर उसका बेटा वहां से भाग निकलता है। एक उम्र के बाद वह प्रतिशोध की भावना से भरा वापस लौटता है- रामाधीर सिंह को मिटाने के संकल्प के साथ।
ठीक उसी तरह जैसे गैंग्स आफ न्यूयार्क में हम लियोनार्डो डि-कैप्रियो की न्यूयार्क में प्रतिशोध से भरी वापसी देखते हैं। कहानी एक दिलचस्प मोड़ पर आकर ठहर जाती है। आगे की कहानी के लिए गैंग्स आफ वासेपुर के दूसरे भाग की प्रतीक्षा करनी होगी।
निर्देशन
अनुराग कश्यप ने फिल्म का ओपनिंग एक्शन सीक्वेंस शानदार तरीके से फिल्माया है, जो ब्राजीलियन फिल्म सिटी आफ गॉड के क्लासिक ओपनेलिंग सीक्वेंस की याद दिलाता है। ठीक उसी तरह एक खास मोड़ पर पहुंचकर फिल्म अतीत में लौट जाती है। अनुराग हमेशा अपनी फिल्म के परिवेश और चरित्रों पर बहुत ध्यान देते हैं। उनका यह परफेक्शन यहां भी नजर आता है। इस फिल्म के लिए अनुराग कश्यप और पटकथा लेखक जिशान क़ुरैशी ने काफी रिसर्च की है।
एक बड़े बजट और कैनवस की फिल्म होने के बावजूद अनुराग फिल्म को बेवजह भव्य बनाने के लालच में नहीं पड़े। उन्होंने इंडिपेंडेंट सिनेमा की शैली में ही फिल्म को प्रस्तुत किया है। ज्यादातर घटनाएं वास्तविक लोकेशन में शूट की गई हैं। बीच के हिस्से में फिल्म थोड़ी सी उलझती हुई लगती है मगर जल्दी ही फिर से पटरी पर आ जाती है। फिल्म के संवाद में गालियों की भरमार है मगर अनुराग ने उसका इस्तेमाल बड़ी समझदारी से परिवेश और चरित्र को वास्तविक बनाने में किया है।
संगीत
आम तौर पर गीत-संगीत गैंग्स आफ वासेपुर जैसी फिल्मों के मिजाज से मेल नहीं खाता मगर अनुराग की दूसरी बड़ी खूबी है एक यथार्थवादी कहानी को लिरिकल तरीके से फिल्माना। देव-डी और गुलाल की तरह यहां भी उन्होंने संगीत का बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल किया है। स्नेहा खानवलकर ने फिल्म में कैरीबियन चटनी म्यूजिक की शैली का इस्तेमाल किया है। इस संगीत में एक किस्म की ताजगी है। आइ एम हंटर’, ‘वुमानिया’, ‘जिया तू हजार साला..’ जैसे गीतों के बोल और संगीत दोनों जबरदस्त हैं। मनोज तिवारी की आवाज का इस्तेमाल अनुराग ने ऐसी ड्रामेटिक सिचुएशन में किया है कि दर्शक भी चकित रह जाते हैं।
क्यों देखें
अगर आप अनुराग कश्यप स्टाइल की फिल्मों के फैन है तो यह फिल्म आप मिस नहीं कर सकते। यह फिल्म इसलिए भी देखनी चाहिए क्योंकि यह मेनस्ट्रीम सिनेमा में कहानी कहने का एक नया स्टाइल डेवलप कर रही है। यह एक विचारोत्तेजक फिल्म है जो राजनीति, पुलिस और माफिया के गठजोड़ की न जाने कितनी बार कही गई कहानी को एक नए नजरिए से प्रस्तुत करती है और आपको उन कारणों की तह में ले जाती है।
क्यों न देखें
फिल्म में हिंसा की अति आपको विचलित कर सकती है। कई दृश्य वीभत्स हैं और सामान्य रुचि के दर्शकों को शायद नहीं पसंद आएंगे। फिल्म में गालियों की भरमार भी इसे परिवार के साथ न देखे जाने लायक फिल्म का दर्जा देती है।
एक्सट्रा शॉट्स
चटनी संगीत आखिर क्या है? दरअसल बिहार-झारखंड से पलायन कर चुके कलाकारों ने ही इसका अस्तित्व बचाकर रखा है। यह संगीत कैरेबियन जीवनशैली का अभिन्न अंग है। चटनी म्यूजिक दरअसल ढोलक, धानताल और हारमोनियम के साथ तैयार किया जाता है। चटनी म्यूजिक के गीत के बोल प्राय: हिंदी, भोजपुरी और अंग्रेजी के मिश्रण का इस्तेमाल करते हैं। कई भाषाओं के मिश्रण के कारण ही इसे चटनी म्यूजिक कहा जाता है। यह संगीत वेस्ट इंडीज में बसे बिहार के लोगों में आज भी बेहद लोकप्रिय है।
इस फिल्म की शुरुआत तब हुई जब अनुराग कश्यप ने जिशान कादरी की आठ पन्नों में लिखी कहानी को पढ़ा। जिशान खुद वासेपुर के रहने वाले हैं। अनुराग ने कहानी सुनी और हैरत में पड़ गए। उन्होंने जिशान से कहा कि वे इस विषय पर और शोध करें। जिशान ने करीब एक महीने तक शोध किया और दोबारा अनुराग से मिले और उन्होंने अपनी अब तक की सबसे महंगी फिल्म बनाने का फैसला कर लिया। अभी कुछ ही दिनों पहले यह खबरें आई थीं कि जिशान को वासेपुर से धमकियां मिली हैं।
अपनी समीक्षा में हमने एक जगह 'सिटी आफ गॉड' का जिक्र किया है। जिन्होंने यह फिल्म नहीं देखी है उन्हें बताना चाहेंगे कि इस फिल्म का ओपेनिंग सिक्वेंस विश्व सिनेमा के कुछ चुनिंदा ओपेनिंग सिक्वेंस में गिना जाता है। यह रियो डि जेनेरियो के पास के एक कसबे में आर्गेनाइज्ड क्राइम के डेवलप होने की कहानी है।
बैनर: वायकॉम 18 मोशन पिक्चर्स
निर्माता: अनुराग कश्यप, सुनील बोहरा, गुनीत मोंगा
निर्देशक: अनुराग कश्यप
संगीत: स्नेहा खानवलकर
कलाकार: मनोज बाजपेयी, नवाजुद्दीन सिद्दकी, पियूष मिश्रा, रीमा सेन, जयदीप अहलावत, रिचा चड्ढा, हुमा कुरैशी, राजकुमार यादव, तिग्मांशु धुलिया
रेटिंग: ***1/2