O Romeo Review: ‘उस्तरा’ को ‘रोमियो’ बनाने में थोड़ा चूके विशाल भारद्वाज; शाहिद पर भारी पड़े अविनाश और नाना
O Romeo Movie Review: विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर की मच अवेटेड फिल्म ‘ओ रोमियो’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। फिल्म देखने से पहले पढ़िये ये रिव्यू…
विस्तार
‘मोहब्बत एक बद्दुआ, जिसे लग जाती है उसे तबाह कर देती है।’ कुछ ऐसा ही होता है विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर की ‘ओ रोमियो’ के साथ। अपनी घोषणा के बाद से ही ‘ओ रोमियो’ चर्चा में बनी हुई थी। अंतत: आज यह सिनेमाघरों में पहुंच चुकी है। ये शाहिद कपूर की विशाल भारद्वाज के साथ चौथी फिल्म है। पिछली तीन फिल्मों ‘कमीने’, ‘रंगून’ और ‘हैदर’ को क्रिटिक्स से सराहना मिली थी। अब ‘ओ रोमियो’ में एक्शन, प्यार, धोखा और बदला सबकुछ देखने को मिलता है। जानते हैं कैसी है ‘ओ रोमियो’?
कहानी
‘ओ रोमियो’ एक बदले की कहानी है। फिल्म की कहानी 1995 के मुंबई पर आधारित है। जहां उस्तरा (शाहिद कपूर) आईबी ऑफिसर खान (नाना पाटेकर) के लिए काम करता है। खान उस्तरा को गैंगस्टर्स को मारने के लिए पैसे देता है। उस्तरा पूरी तरह से खान के कहे पर ही चलता है। क्योंकि कभी खान ने जलाल (अविनाश तिवारी) के चंगुल से उस्तरा को निकाला था और उसकी जान बचाई थी।
उस्तरा अपनी दादी (फरीदा जलाल) और अपने साथियों के साथ एक क्रूज पर रहता है। इनमें छोटू (हुसैन दलाल) उसका सबसे खास है। बार डांसर जूली (दिशा पाटनी) उस्तरा की गर्लफ्रेंड है। एक दिन अफ्शा (तृप्ति डिमरी) उस्तरा को जलाल, अंसारी, शंकर और इंस्पेक्टर पठारे की सुपारी देने आती है। ये सभी जलाल के ही खास आदमी हैं।
अफ्शा क्यों ऐसा करना चाहती है, इसके पीछे उसकी एक बैक स्टोरी है। जिसमें है उसका शौहर महबूब कुरैशी (विक्रांत मैसी)। ऐसा क्या होता है, जो अफ्शा इन लोगों की जान लेना चाहती है, इसके लिए तो आपको फिल्म देखनी पड़ेगी।
उस्तरा अफ्शा को ऐसा करने से मना कर देता है। लेकिन फिर कुछ ऐसा होता है कि उस्तरा अफ्शा की जान बचाता है और इन चारों को मारने में उसकी मदद करता है। यही नहीं वो अफ्शा को भी ट्रेंड करता है। इसी दौरान उस्तरा के अंदर अफ्शा के लिए फीलिंग्स भी जागने लगती हैं।
फिल्म के इंटरवल सीन में जलाल (अविनाश तिवारी) की दमदार एंट्री होती है। वो स्पेन में अपनी पत्नी राबिया (तमन्ना भाटिया) के साथ रहता है। वहीं से मुंबई में अपने ड्रग्स और अंडरवर्ल्ड के सभी धंधों को कंट्रोल करता है। जलाल इतना खूंखार और हैवान है कि उस तक पहुंचना आईबी के लिए भी काफी मुश्किल है। उसकी दहशत उसके पहले सीन में ही पता चल जाती है।
फर्स्ट हाफ तक जो कहानी गैंगस्टर वॉर और पुलिस के बीच का एक्शन-ड्रामा मालूम पड़ती है, सेकंड हाफ में वो एक लव स्टोरी और बदले की कहानी बन जाती है। अपने उस्तरा से लोगों को मिनटों में मौत के घाट उतारने वाला उस्तरा अचानक रोमियो बन जाता है और अपने प्यार (अफ्शा) के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हो जाता है।
फिल्म में उस्तरा, अफ्शा, जलाल और खान सभी की एक बैक स्टोरी है। जो कहानी में परत दर परत सामने आती है।
अभिनय
‘ओ रोमियो’ को देखकर ऐसा लगता है कि शाहिद कपूर को चॉकलेटी हीरो की इमेज से बाहर निकालने का ठेका सिर्फ विशाल भारद्वाज ने ही ले रखा है। हर बार की तरह यहां भी उन्होंने शाहिद से वैसा ही काम कराया है, जैसा ‘कमीने’ और ‘हैदर’ में उन्होंने किया था।
यही कारण है कि कई बार जब वो एक सनकी, खूंखार रूप में नजर आते हैं, तो वो ‘हैदर’ और ‘कमीने’ की याद दिलाते हैं। लेकिन उनकी आंखों में वो गुस्सा और इंटेंस लुक उनके काम को बेहतरीन बनाता है। साथ ही बीच-बीच में उनकी और नाना पाटेकर की नोक-झोंक माहौल को नर्म बनाने का काम करती है।
तृप्ति डिमरी को देखकर फिल्म में अच्छा लगता है, क्योंकि यहां उन्होंने सिर्फ अपनी खूबसूरती ही नहीं दिखाई है, बल्कि कहानी का सबसे अहम किरदार अदा किया है। फिल्म में वो रोमांस से ज्यादा एक्शन करती नजर आती हैं। बेशक निर्देशक ने उनकी खूबसूरती का भी अच्छा इस्तेमाल किया है।
लेकिन उनके इमोशन और एग्रेशन पहली बार इस तरह खुलकर सामने आए हैं। कहीं न कहीं इसका श्रेय विशाल भारद्वाज को जाता है। उनको देखकर ऐसा लगता है कि ये किरदार उन्हीं के लिए था।
अविनाश तिवारी ने हैरान किया है। उनकी एंट्री जरूर इंटरवल से ठीक पहले होती है, लेकिन उन्हें देखकर लगता है कि देर आए पर दुरुस्त आए। जलाल के किरदार में वो पूरी तरह उतरे हैं। वो खौफनाक और हैवान लगे हैं। क्लोज-अप शॉट्स में उनकी आंखों में वो गुस्सा और वहशीपन देखकर एक बार दर्शक भी डर जाएंगे।
जबकि इमोशनल सीन में भी वो पूरी तरह उतर जाते हैं। उन्होंने ये दिखाया है कि वो वाकई एक वर्सटाइल एक्टर हैं और उनकी रेंज एक ‘मजनू’ से कहीं ज्यादा है। उम्मीद है कि इस फिल्म के बाद उनके खाते में और भी दमदार रोल आएंगे।
नाना पाटेकर अपने किरदार में पूरी तरह से उतर गए हैं। उन्होंने खान के किरदार में जो मसखरी की है, वो सिर्फ नाना ही कर सकते हैं। बेशक उनका किरदार थोड़ा और एक्सप्लोर किया जा सकता था, लेकिन जितना है कहानी के हिसाब से भी काफी अहम है और एक्टिंग के लिए तो नाना का कहना ही क्या।
इसके अलावा विक्रांत मैसी, तमन्ना भाटिया और दिशा पाटनी कहानी में थोड़ी देर के लिए ही हैं। लेकिन जितनी भी देर आए हैं अपने किरदार से इंसाफ करके गए हैं। तमन्ना बाकी किरदारों से अलग तरह के किरदार में हैं।
हालांकि, ‘आशिकों की कॉलोनी’ गाने में दिशा के हॉट फिगर और बोल्ड स्टेप्स पर शाहिद कपूर का शानदार डांस भारी पड़ा है। शायद बहुत कम ही ऐसा होता होगा कि दिशा पाटनी के स्क्रीन पर डांस करते समय भी लोगों की नजरें किसी और पर जाएं।
फरीदा जलाल 76 साल की उम्र में वो करती हैं, जो उन्होंने अपने पूरे करियर में नहीं किया। वो बेबाक तरीके से नजर आई हैं, जहां पहली बार पर्दे पर कठोर शब्दों का इस्तेमाल कर रही हैं। बेशक एक ऐसे गैंगस्टर की दादी होने पर इस तरह का होना स्वाभाविक है। हुसैन दलाल का काम भी अच्छा है।
संगीत
विशाल भारद्वाज की फिल्मों में संगीत की अहम भूमिका होती है। अब जब गुलजार के शब्द, अरिजीत सिंह की आवाज और विशाल भारद्वाज का संगीत एकसाथ आएगा, तो फिर फिल्म का संगीत बेसुरा तो नहीं हो सकता।
स्लो और रोमांटिक सॉन्ग से लेकर ‘आशिकों की कॉलोनी’ और ‘पान की दुकान’ जैसे डांस व पार्टी सॉन्ग भी सुनने में अच्छे लगते हैं।
सबसे खास बात गाने गलत टाइम पर नहीं आते और कहानी में कहीं भी अखरते नहीं हैं। बल्कि कहानी के साथ बह जाते हैं। टाइटल ट्रैक में अरिजीत की आवाज में ‘ओ रोमियो.. जां के लिए जां दीजियो’ सुनते ही अलग एहसास होता है।
तो वहीं ‘हम तो तेरे ही लिए थे’ और ‘इश्क हुआ है या होने वाला है’ में गुलजार का एक-एक शब्द अंदर तक उतरता है।
इसके अलावा विशाल भारद्वाज क बैकग्राउंड म्यूजिक भी कहानी को मजेदार बनाता है। जिस तरह से फिल्म में 90 के दशक के गानों का इस्तेमाल हुआ है, खासकर फाइट सीक्वेंस में, वो फिल्म को मजबूती ही प्रदान करता है।
निर्देशन
विशाल भारद्वाज का निर्देशन कभी भी टोंकने वाला नहीं लगता है। लेकिन इस बार वो ‘मकबूल’, ‘कमीने’ और ‘हैदर’ जैसा जादू यहां नहीं चला पाते हैं। शायद गैंगस्टर-एक्शन ड्रामा और लव स्टोरी पिरोने के चक्कर में कुछ जगह वो भटक जाते हैं। जिससे कई मौकों पर कहानी भी भटकी लगती है।
कुछ एक एक्शन सीन और सीक्वेंस पूरी तरह से हीरोइक लगते हैं, जिससे अब तक विशाल भारद्वाज बचते रहते थे। जैसे कि क्लाइमैक्स अखरता है, क्योंकि अगर कोई इतना पावरफुल है तो एक आदमी उस तक इतनी आसानी से कैसे पहुंच जाता है? ये सवाल हर किसी को परेशान करता है।
बाकी सिनेमैटोग्राफी कई मौकों पर अच्छी है। फाइट सीक्वेंस को काफी बेहतरी से फिल्माया गया है और क्लाईमैक्स में अविनाश तिवारी और शाहिद कपूर के क्लोज-अप शॉट्स वाकई शानदार हैं। फिल्म में 90 के दशक के गानों का काफी अच्छा इस्तेमाल है, जो फाइट सीक्वेंस को और भी बेहतर बनाते हैं।
कमियां
बेशक फिल्म की कहानी हुसैन जैदी की ‘माफिया क्वींस ऑफ मुंबई’ पर आधारित है, लेकिन जैसा कि विशाल भारद्वाज खुद ही बोल चुके हैं कि उन्होंने क्रिएटिव लिबर्टी ली है। इसलिए कुछ मौकों पर ऐसा लगता है कि कहानी और कसी हो सकती थी। दूसरे हाफ में लव स्टोरी बनने पर विशाल भारद्वाज और उनके साथी लेखक थोड़ा चूक जाते हैं।
फिल्म की 2 घंटा 59 मिनट की लंबाई इसकी सबसे बड़ी कमजोरी है। क्योंकि एक वक्त के बाद आपकी निगाहें स्क्रीन से इतर इधर-उधर देखने लगती हैं और बाकियों की बगलें तलाशने लगती हैं। जो ये दिखाता है कि कहानी में कहीं चूक है और वो बोर हो रहे हैं। बेशक बॉलीवुड में 3 घंटे की फिल्मों का ट्रेंड लौटा है, लेकिन उसके लिए कहानी ऐसी होनी चाहिए जो पूरे तीन घंटे कुर्सी से बांधे रहे।

देखें या नहीं
विशाल भारद्वाज और शाहिद कपूर अभी तक जब भी कोई कहानी लाए हैं, तो वो ऐसी नहीं हुई जिसे देखा न जा सके। बेशक ‘रंगून’ एक अपवाद कही जा सकती है। लेकिन ‘ओ रोमियो’ ऐसी बिल्कुल नहीं है, जिसे एक मौका न दिया जाए। कहानी असल किरदारों से प्रेरित है, इसलिए बहुत ज्यादा भटकी नहीं है।
अगर आप एक अच्छी स्टारकास्ट का अच्छा काम देखना चाहते हैं तो बेशक ये फिल्म आपके लिए है। हां, इतना है कि फिल्म कहीं पर भी उबाऊ नहीं लगेगी। हां, थोड़ा वक्त जरूर ज्यादा लेती है। कहानी थोड़ी बेहतर हो सकती थी।