Silence 2 Review: सस्पेंस सीक्वल के नाम पर जी5 का धोखा, ब्रांड मनोज बाजपेयी पर खरी नहीं उतरी ‘साइलेंस 2’
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कोरोना संक्रमण काल के दौरान लॉकडाउन के समय जी5 पर रिलीज हुई फिल्म ‘साइलेंस – कैन यू हियर इट?’ ठीक ठाक सस्पेंस थ्रिलर फिल्म रही। फिल्म में ऐसा भी कुछ कमाल नहीं दिखा कि इसकी सीक्वल बनाई जाए या कि इसके कलाकारों को लेकर इसकी फ्रेंचाइजी विकसित करने की कोशिश की जाए। मनोज बाजपेयी का दावा है कि ‘साइलेंस 2’ दर्शकों की भारी मांग पर जी5 को बनानी पड़ी। हो सकता है ऐसा ही हो, लेकिन अगर ऐसा है तो ये मांग करने वाले दर्शकों को भारी निराशा भी ये फिल्म देखकर हो सकती है। हुआ तो ये फिल्म ‘साइलेंस’ में भी था लेकिन इस बार कुछ ज्यादा ही है और ये दिक्कत है, फिल्म में बहुत ज्यादा संवाद होने की। कलाकार सारे अपराध की तफ्तीश करके नहीं दिखा रहे, वे एक दूसरे को बताने के बहाने दर्शकों को तफ्तीश समझा रहे हैं। कुछ कुछ वेद प्रकाश पाठक और ओम प्रकाश शर्मा के उपन्यासों की तरह। मसाले भी सारे फिल्म में कुछ इन लेखकों के जासूसी उपन्यासों की तरह ही हैं।
कहानी एसीपी अविनाश वर्मा की है। पुलिस विभाग में एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) है। उसको तीन पुलिस इंस्पेक्टर और एक हवलदार मिला हुआ है 24 घंटे चलने वाली स्पेशल यूनिट के लिए। काम वह अपने तरीके से करता है। फोरेंसिक विभाग में काम करने वाले न्यू मिलेनियल्स से प्रभावित भी होता है। फोन पर अपनी बेटी से लंबी लंबी बातें करता है। शेरो शायरी का शौकीन है। राह चलते बेटियों को बचाने भी आता है। और, अगर कत्ल किसी बेटी का हुआ है तो कुछ ज्यादा ही ‘इमोशनल’ हो जाता है। कहानी एक बार में हुई हत्याओं से शुरू होती है। सेटअप शुरू से कहानी का ऐसा है कि निर्देशक दिखाएगा आपको कुछ और, कहानी को ले जाएगा कहीं और। अबान का ये फॉर्मूला उनकी पिछली फिल्म ‘साइलेंस’ में भी दिखा था। इस बार अपराध की तफ्तीश एक सियासी कत्ल से शुरू होती है। हीरो चूंकि एसीपी है तो उसे इस घटना का दूसरा एंगल नजर आता है। टेबल पर बिखरे खून के शरीर से निकलते वक्त बने कोण और जमीन पर गिरी लाश से वह मामले का असली एंगल टीम को समझाता है। राजस्थान पुलिस की एक इंस्पेक्टर को भी एक लाश मिलती है। वह एसीपी की मदद मांगती है। और, फिर तार जुड़ते जाते हैं।
फिल्म ‘साइलेंस 2’ का पूरा ताना बाना तो किरन देवहंस ने अच्छे से बुना है लेकिन कहानी लीक न हो जाए इस डर से सारा काम उन्होंने घर में ही करने की कोशिश की है। नामी सिनेमैटोग्राफर किरन देवहंस उनके पति हैं। वही इस फिल्म के निर्माता है। साथ में तानिया देवहंस क्रिएटिव हेड हैं। देव देवहंस स्क्रिप्ट सुपरवाइजर हैं। सस्पेंस थ्रिलर में एक अंतर्धारा बचपन में उपेक्षित बच्चों के नजरिये से भी रची गई है। हॉस्टल में भेज दिए गए बच्चों का शारीरिक उत्पीड़न और घर में ही दुत्कार दिए गए बच्चों का मानसिक उद्वेलन, फिल्म ‘साइलेंस 2’ का अच्छा आधार है, लेकिन इसका विस्तार करने से फिल्म की लेखन-निर्देशन टीम पूरी तरह चूक गई है। फिल्म का एक और बिंदु है फिल्मों में काम दिलाने के बहाने ‘कुआंरी’ किशोरियों के सौदागरों की। ये एंगल भी इस सस्पेंस थ्रिलर का तंबू तान सकता था लेकिन कहानी यहां भी रफ्तार में नहीं आ पाती। फिल्म की निर्देशक अबान ने कोशिश अच्छी की है लेकिन एक चुस्त पटकथा के अभाव में ये फिल्म बस एक औसत सस्पेंस थ्रिलर से आगे नहीं जा पाती।
मनोज बाजपेयी ओटीटी जी5 के प्रिय कलाकार हैं। ‘सिर्फ एक बंदा काफी है’ ने जी5 की ब्रांडिंग बेहतर करने में बहुत बड़ी मदद भी की, लेकिन जी5 को ध्यान ये रखना चाहिए कि मनोज बाजपेयी के प्रशंसकों का दर्शक वर्ग बहुत ज्यादा अपेक्षाएं रखने वाला दर्शक वर्ग है। और, मनोज को भी अपनी तारीफ दिल पर नहीं लेनी चाहिए। अगर एसीपी अविनाश पहली फिल्म में बिटिया की भेजी अतरंगी वाक्यों वाली टी शर्ट पहनता है तो दूसरी फिल्म में वह ऐसा क्यों नहीं करता? न निर्देशक बताती हैं और न एसीपी अविनाश। मनोज बाजपेयी की जो उम्र हो चली है और जो उनकी कद काठी है, उसके मुताबिक एक्शन रचने को अब हिंदी सिनेमा के एक्शन निर्देशकों को कुछ नया सोचना चाहिए। लियाम नीसन की फिल्में इस बारे में संदर्भ सुझा सकती हैं। पिछवाड़े पर लात मारकर या फिर गाली देकर 54 साल के शख्स को एंग्री ओल्ड मैन बनाना ठीक नहीं है। मनोज की अदाकारी से संगत बिठाने वाले ऐसे किरदारों का रूप रंग कुछ तो अलग सजाना चाहिए।
पिछली बार चूंकि मामला नया नया था, इसलिए साहिल वैद और वकार शेख के किरदारों पर दर्शकों ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। लेकिन, इस बार ध्यान देकर भी देखें तो दोनों फिल्म की कहानी में अपराध की तफ्तीश में ज्यादा कुछ योगदान करते दिखते नहीं है। इन दोनों से बेहतर किरदार इस बार फोरेंसिक लैब में काम करने वाले युवक का है या फिर राजीव सिंह का किरदार करने वाले कलाकार का। राजीव की बीवी बनी पारुल गुलाटी के किरदार के रंग जिस तरह बदलते हैं, वे भी गौर करने लायक हैं। फिल्म में प्राची देसाई की मौजूदगी भी इस बार ‘जस्टीफाई’ नहीं होती। उनके संवाद भी बहुत किताबी तरीके से लिखे गए हैं। कोई बात समझाने से पहले अंग्रेजी में एक लाइन जोड़ना बहुत ही नाटकीय लगता है। फिल्म में एक गाने की दो लाइनें भी हैं। सिनेमैटोग्राफी में पूजा गुप्ते ने कितनी मेहनत की और कितनी मेहनत पोस्ट प्रोडक्शन में की गई है, सब बारिश में बहते पानी जैसा हो गया है। इतना भी क्या फोटोशॉप करना!
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