Web Series Brown Review: करिश्मा कपूर के अभिनय ने जीता दिल, लेकिन क्या कहानी भी उतना असर छोड़ती है?
Web Series Brown Review: करिश्मा कपूर अभिनीत सीरीज ‘ब्राउन’ भी ओटीटी पर स्ट्रीम हो चुकी है। मर्डर मिस्ट्री, थ्रिलर से भरी ये सीरीज क्या गहरा असर छोड़ती है? पढ़िए, वेब सीरीज ‘ब्राउन’ का रिव्यू।
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विस्तार
ओटीटी पर हर दूसरे हफ्ते एक नया सीरियल किलर पैदा हो जाता है। उसे पकड़ने के लिए एक परेशान पुलिस अफसर भी मिल जाता है। वेब सीरीज 'ब्राउन' भी इसी दुनिया से आती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यहां पुलिस अफसर बनी हैं करिश्मा कपूर और लंबे समय बाद उन्हें ऐसा किरदार मिला है, जिसमें मुस्कुराने से ज्यादा सिगरेट पीने, गुस्सा करने और मुश्किल लोगों से निपटने का मौका है।
सीरीज में करिश्मा कपूर रीटा ब्राउन के किरदार में हैं। रीटा शराब पीती है, खुद सिगरेट रोल करके पीती है और अपनी पर्सनल परेशानियों से भी जूझ रही है। इसी बीच कोलकता शहर में महिलाओं की हत्या का सिलसिला शुरू हो जाता है और जांच की जिम्मेदारी उसके पास आती है।
मर्डर केस शुरू से दिलचस्प है लेकिन यह सीरीज सिर्फ कातिल को खोजने की कहानी नहीं बनना चाहती। वह अपने किरदारों के साथ भी काफी समय बिताती है। कई बार इतना कि जांच थोड़ी पीछे छूटती हुई लगती है।
कहानी
सीरीज की शुरुआत दुर्गा पूजा के दौरान हुई एक हत्या से होती है। अहाना जायसवाल नाम की एक युवती की हत्या के बाद पुलिस हरकत में आती है। मामला एक बड़े और प्रभावशाली परिवार से जुड़ा है, इसलिए पुलिस पर दबाव भी है और मीडिया की नजर भी।
केस की जिम्मेदारी रीटा ब्राउन को मिलती है। डिपार्टमेंट में उसकी पहचान एक अच्छी अफसर की है, लेकिन उसके अपने विवाद भी हैं। जांच में उसका साथ अर्जुन सिन्हा (सूर्या शर्मा) देता है।
अहाना के परिवार से पूछताछ शुरू होती है तो कई नई बातें सामने आती हैं। परिवार के रिलेशनशिप में तनाव है ..कुछ बातें छिपाई जा रही हैं और शक कई लोगों पर जाता है। मामला तब और उलझ जाता है जब उसी तरह की एक और हत्या हो जाती है। इसके बाद पुलिस को शक होता है कि वह किसी सीरियल किलर का पीछा कर रही है।
केस के साथ-साथ रीटा की पर्सनल लाइफ भी कहानी का बड़ा हिस्सा बनी रहती है। डिपार्टमेंट की पॉलिटिक्स, मीडिया का दबाव और उसकी अपनी परेशानियां जांच को और मुश्किल बना देती हैं। कहानी आखिर तक यह सवाल बनाए रखती है कि इन हत्याओं के पीछे कौन है।
अभिनय
इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत करिश्मा हैं। रीटा ब्राउन के किरदार में वह पूरी तरह फिट बैठती हैं। यह ऐसा किरदार है जो हर समय मजबूत नहीं दिखता। वह गुस्सा भी करती हैं...टूटती भी हैं और कई बार गलत फैसले भी लेती हैं ऑडियंस ने करिश्मा को लंबे समय तक ग्लैमरस और हल्के-फुल्के किरदारों में देखा है। ऐसे में रीटा ब्राउन उनके लिए बिल्कुल अलग तरह का रोल है। यहां न ग्लैमर है ... न ही स्टार वाली चमक दिखाने की कोशिश। चेहरे की थकान, चिड़चिड़ापन और अकेलापन उनके एक्टिंग में साफ दिखाई देता है। लंबे समय बाद उन्हें ऐसा किरदार मिला है जिसमें एक्टिंग दिखाने की पूरी जगह मिलती है।
सूर्या शर्मा ने भी अच्छा काम किया हैं। अर्जुन सिन्हा के किरदार में उनकी अपनी पर्सनल कहानी है, वह उसे अच्छे तरीके से निभाते हैं। करिश्मा और सूर्या की जोड़ी साथ में अच्छी लगती है।
जीशु सेनगुप्ता का रोल छोटा है लेकिन वह ध्यान खींचते हैं। अनुभवी एक्टर्स सोनी राजदान और हेलेन खान कम समय के लिए नजर आती हैं। उन्हें थोड़ा और स्क्रीन टाइम मिलता तो अच्छा होता। शान का ओटीटी डेब्यू ठीक है और वह अपने किरदार में सहज लगते हैं।
निर्देशन
निर्देशक अभिनय देव ने पहले 'दिल्ली बेली', 'ब्लैकमेल' और '24' जैसे प्रोजेक्ट्स में अलग-अलग तरह की कहानियां संभाली हैं। 'ब्राउन' में भी उनका फोकस माहौल बनाने पर ज्यादा नजर आता है। अभिक बरुआ के उपन्यास 'सिटी ऑफ डेथ' को वेब सीरीज का रूप दिया है, उन्होंने कोलकाता के माहौल का अच्छा इस्तेमाल किया है। बारिश, शहर की गलियां और अंधेरा माहौल कहानी के साथ अच्छी तरह फिट बैठता है।
हालांकि कई जगह कहानी जानी-पहचानी राह पर चलती है। सीरियल किलर, पुलिस जांच और पर्सनल इश्यूज से जूझते किरदारों वाली ऐसी कहानियां ओटीटी पर पहले भी कई बार देखने को मिल चुकी हैं। मानो, जैसे पहले भी कई क्राइम थ्रिलर में देखी जा चुकी हैं। एक्टिंग माहौल बनाने में मेहनत करते हैं और यह स्क्रीन पर दिखता भी है। दिक्कत बस यह है कि कई बार कहानी उसी माहौल में ज्यादा देर तक रुक जाती है।
क्या अच्छा है?
'ब्राउन' की सबसे बड़ी खूबी इसका माहौल है। सिनेमैटोग्राफर अमोघ देशपांडे ने कोलकाता को खूबसूरती से कैमरे में कैद किया है। बारिश, खाली सड़कें और शहर का रंग-ढंग कहानी के साथ मेल खाता है। करिश्मा की एक्टिंग सीरीज को मजबूती देता है। कई जगह जब कहानी धीमी पड़ती है, तब भी वह ऑडियंस का ध्यान बनाए रखती हैं। सूर्या शर्मा भी अच्छा साथ देते हैं।
क्या खटकता है?
'ब्राउन' को कहीं पहुंचने की कोई जल्दी नहीं है। कई बार तो ऑडियंस को कहानी से ज्यादा जल्दी होने लगती है। कुछ एपिसोड ऐसे लगते हैं जिन्हें थोड़ा छोटा रखा जाता तो असर ज्यादा होता। शुरुआत में लगता है कि सीरियल किलर वाला मामला कहानी को रफ्तार देगा लेकिन कुछ एपिसोड बाद समझ आ जाता है कि सीरीज को धीरे-धीरे चलना ज्यादा पसंद है। इसी वजह से कुछ बड़े खुलासे भी उतना असर नहीं छोड़ पाते। सीरीज शुरुआत से ही एक भारी और उदास माहौल बनाने में लगी रहती है। दिक्कत यह है कि कुछ समय बाद यही इसकी कमजोरी बन जाती है। यहां लगभग हर किरदार किसी न किसी परेशानी में फंसा है। शुरुआत में यह बात दिलचस्प लगती है .. लेकिन बाद में दोहराव महसूस होने लगता है। कई बार हत्या की जांच से ज्यादा ध्यान किरदारों के दुखों पर चला जाता है।
सोनी राजदान, हेलेन खान जैसे कलाकारों को ज्यादा मौका नहीं मिला है। वहीं आखिरी एपिसोड तक पहुंचते-पहुंचते कहानी थोड़ी रफ्तार पकड़ती है, लेकिन क्लाइमेक्स वैसा नहीं बन पाता जिसकी उम्मीद बनने लगती है।
'ब्राउन' में मर्डर मिस्ट्री है, सीरियल किलर है और ऐसे कई मोड़ हैं जो आपको कहानी के साथ बनाए रखते हैं। लेकिन यह उन क्राइम थ्रिलर में से नहीं है जो हर एपिसोड में बड़ा ट्विस्ट देने की कोशिश करती हैं। करिश्मा कपूर इस सीरीज की सबसे बड़ी ताकत हैं। अगर वह इस सीरीज में नहीं होतीं, तो इसकी कमियां शायद और ज्यादा नजर आती हैं।
कुल मिलाकर, 'ब्राउन' ऐसी सीरीज है जिसमें करिश्मा कपूर कई बार कहानी से आगे निकल जाती हैं। सात एपिसोड खत्म होने के बाद कातिल कौन था, यह शायद हर किसी को याद न रहे, लेकिन रीटा ब्राउन जरूर याद रह जाती है। शायद यही इस सीरीज की सबसे बड़ी कामयाबी भी है और सबसे बड़ी कमी भी।