Bandar Movie Review: बॉबी देओल ने फिर चौंकाया, अनुराग ने किए कई सवाल, कहां कमजोर पड़ी ‘बंदर’; पढ़ें रिव्यू
Bandar Movie Review in hindi: बॉबी देओल अभिनीत फिल्म ‘बंदर’ सिनेमाघरों में रिलीज हो चुकी है। इसे अनुराग कश्यप ने निर्देशित किया है। यहां जानिए कैसी है यह फिल्म?
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कानूनी मामले में उलझा हुआ एक शख्स और उसकी कहानी पर बनी फिल्म ‘बंदर’। सबसे पहले तो मन में यह सवाल आता है कि फिल्म का नाम ‘बंदर’ क्यों है? इसलिए कि कानून इस शख्स को बंदर की तरह नचाता है? या इसलिए कि यह शख्स अपने ही सर्कस का बंदर हैं? क्या है यह कहानी? कैसा है अभिनय और कैसी यह फिल्म? आइए जान लेते हैं।
कहानी
कभी किसी जमाने में टीवी पर सुपरस्टार रहा समीर मेहरा (बॉबी देओल) आज अपना करियर और जिंदगी वापस ठीक करने की कोशिश कर रहा है। उसकी एक पार्टनर भी है खुशी (सबा आजाद) जिसके साथ उनका रिश्ता ठीक ठाक चल रहा है। कहानी में मोड़ तब आता है जब समर की एक्स गर्लफ्रेंड गायत्री (सपना पब्बी) उसकी लाइफ में वापस लौटती है और समीर पर रेप का आरोप लगाती है। इसके बाद शुरू होता है बंदर नाच। फिल्म सिर्फ एक लीगल ड्रामा ही नहीं बल्कि समाज की क्रूर सच्चाई भी पेश करती है। अब आगे समीर क्या करेगा? खुद को कैसे बचाएगा? और क्या वाे वाकई बेगुनाह है? यह जानने के लिए आपको फिल्म देखनी होगी।
अभिनय
यह कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म का पूरा भार बॉबी देआल के कंधों पर है। बॉबी अपने 2.0 वर्जन में बेहतर निकलकर भी आए हैं। रोमांस, इमोशंस, लाचारी समेत सभी भावों को वो सादगी से पेश करते हैं। यह उनके करियर की सबसे इंटेंस और पावरफुल परफॉर्मेंस है। सपना पब्बी को भी क्रेडिट दिया जाना चाहिए। उन्होंने बॉबी का बढ़िया साथ दिया और जैसी किरदार की मांग थी वैसा रोल किया। उनका किरदार अंत तक आपको परेशान रखता है। सबा आजाद का काम ठीक है। सान्या मल्होत्रा ने भी अपना काम बखूबी किया है। बाकी स्टारकास्ट दमदार है।
निर्देशन
अनुराग कश्यप हमेशा इसी तरह की डार्क फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं। वो इस फिल्म के जरिए सिस्टम की कई कमियों पर भी बात करते हैं। कई सवाल भी उठाते हैं। हालांकि, बीच में वो थोड़ा भटकते हैं और अंत में थोड़ा निराश भी करते हैं पर कुल मिलाकर फिल्म में कुछ नया देखने काे मिलता है। ‘पेद्दी’ और ‘है जवानी तो इश्क होना है’ जैसी बे सिर-पैर की फिल्मों के बीच अनुराग कम से कम लॉजिक की बात तो करते हैं। अनुराग का काम ज्यादातर बिना फिल्टर वाला होता है यहां भी वही काम इस फिल्म को रियलिस्टिक और मजेदार बनाता है।
बॉबी की एक्टिंग और फिल्म का रियलिस्टिक होना की इसकी बड़ी ताकत है।
कमियां
फर्स्ट हाफ थोड़ा स्लो है। फिल्म बिल्कुल आराम नहीं करने देती। क्लाइमैक्स, पूरी फिल्म के मुकाबले थोड़ा निराश करता है।
गाने औसत हैं। एक ही गाना जुबाना पर चढ़ता है। बैकग्राउंड म्यूजिक ठीक ठाक है।
देखें या नहीं?
बॉबी का नया रूप और कानून व्यवस्था पर तंज देखना चाहते हैं तो यह फिल्म देख सकते हैं।