Union Budget: बजट से पहले फिल्म इंडस्ट्री का फूटा गुस्सा, विशेषज्ञ बोले- ‘सरकार इस बार हमें अनसुना मत करना’
Union Budget 2026: 1 फरवरी को देश का केंद्रीय बजट आना है। इस बजट पर अलग-अलग सेक्टर से आने वाले हर व्यक्ति की निगाहें लगी हैं। अब मनोरंजन इंडस्ट्री के लोगों ने भी सरकार से बजट में इस ओर ध्यान देने की अपील की है। जानिए एंटरटेनमेंट जगत के लोगों ने सरकार से की क्या अपील…
विस्तार
कल यानी रविवार 1 फरवरी को देश का केंद्रीय बजट आ रहा है। इस बजट पर पूरे देश की निगाहें लगी है। भारत की फिल्म और मनोरंजन इंडस्ट्री भी आगामी बजट को बहुत ध्यान से देख रही है। इस बार बजट इसलिए और भी अहम है क्योंकि कुछ ही महीने पहले जीएसटी 2.0 लागू हुआ है और अब तक बॉक्स ऑफिस पूरी तरह संभल नहीं पाया। कई फिल्में उम्मीद के मुताबिक नहीं चलीं, थिएटरों में ऑडियंस कम पहुंची और इंडस्ट्री में चिंता लगातार बढ़ी है। टैक्स का बोझ, थिएटरों का बंद होना, मजदूरों की सुरक्षा और स्वतंत्र फिल्मों का भविष्य। इन सब मुद्दों ने माहौल भारी कर दिया है।
ऐसे समय में अमर उजाला से बातचीत में फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े कई लोगों ने बजट को लेकर अपनी बात रखी है। सबकी चिंताएं अलग थीं, लेकिन संदेश एक ही था ‘सरकार, इस बार हमारी आवाज जरूर सुनिए।’
भारत में फिल्म बनाना महंगा हो गया है: प्रोड्यूसर तनुज गर्ग
फिल्म प्रोड्यूसर तनुज गर्ग ने कहा, ‘हमारी सबसे बड़ी मांग यही है कि जीएसटी कम किया जाए। आज भारत में फिल्म बनाना पहले से कहीं ज्यादा महंगा हो गया है। निर्माता भारत में शूट करने से डरते हैं और विदेशों की ओर भागते हैं, क्योंकि वहां सरकारें अच्छी छूट और सुविधाएं देती हैं। हमारे राज्यों की रियायतें बहुत कमजोर हैं और अंतरराष्ट्रीय स्तर के मुकाबले कोई मायने नहीं रखतीं। दुख की बात है कि सरकार अब भी फिल्मों को विलासिता मानती है। भारत में परिवारों के पास न अच्छे पार्क हैं, न सुरक्षित सार्वजनिक स्थान। ऐसे में सिनेमा ही सहारा है। अगर इसे भी लग्जरी बताकर दबाया गया, तो लोग मनोरंजन के लिए कहां जाएंगे। सरकार को समझना चाहिए कि सिनेमा कोई शौक नहीं, बल्कि देश की जरूरत है।’
महंगी शूटिंग और थिएटरों के दाम ने मिड-बजट फिल्मों को मार दिया: निधि परमार
‘फिल्म शुरू होते ही आधा बजट खत्म हो जाता है, क्योंकि कैमरा, लाइट और हर टेक्निकल चीज पर इतना ज्यादा जीएसटी लगता है। आउटडोर शूटिंग के नियम और खर्च इतने ज्यादा हैं कि कई लोग डर जाते हैं। राज्यों की रियायतें मौजूद हैं, लेकिन प्रक्रिया इतनी उलझी हुई है कि लोग छोड़ देते हैं। अगर सरकार टिकटें सस्ती कर दे और थिएटर में खाने-पीने की चीजों के दाम कम करा दें, तो मिड-बजट फिल्मों को बड़ी राहत मिलेगी। दर्शक लौटेंगे तभी यह उद्योग बचेगा। सबसे जरूरी है कि दर्शक की जेब पर बोझ कम पड़े।’
राज्य सरकारें फिल्में टैक्स फ्री करती हैं, लेकिन केंद्र को जीएसटी देना पड़ता है: विषेक चौहान थिएटर ओनर
‘हमारे लिए कभी कोई राहत नहीं आती। राज्य सरकारें फिल्म को टैक्स फ्री करती हैं, पर केंद्र का जीएसटी फिर भी देना पड़ता है। यह कैसी टैक्स माफी है। दुनिया में देखें तो चीन 80,000 स्क्रीन पर पहुंच चुका है। अमेरिका 40,000 स्क्रीन पर है। जबकि भारत, जिसकी आबादी सबसे ज्यादा है, सिर्फ 9,000 स्क्रीन पर टिका हुआ है। यह हालत सिनेमा संस्कृति के लिए खतरनाक है। लोग सोचते हैं कि ओटीटी नए कलाकार पैदा कर देगा, लेकिन ओटीटी कभी अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, रजनीकांत या पंकज त्रिपाठी जैसे चेहरे नहीं बना सकता। ये चेहरे थिएटर से पैदा होते हैं। अगर थिएटर खत्म हुए तो हमारी संस्कृति भी खत्म होगी। सरकार हर जिले में थिएटर बनाने के लिए सस्ती जमीन और आसान मंजूरी दे। नहीं तो आने वाली पीढ़ी थिएटर को किताबों में पढ़ेगी, असल में नहीं देख पाएगी।’
फिल्मों की चमक के पीछे मजदूरों की चीखें दब रहीं: बीएन तिवारी, FWICE अध्यक्ष
‘फिल्मों की चमक पीछे छोड़ दीजिए। यहां मजदूर महीनों तक अपने ही पैसे का इंतजार करते हैं। समय पर भुगतान को कानून बनाकर लागू करना होगा, वरना शोषण कभी खत्म नहीं होगा। कागजों में बारह घंटे की काम सीमा लिखी है, लेकिन कई सेटों पर लोग सोलह से अठारह घंटे तक काम करते हैं। यह पूरी तरह गलत है। सेट पर मेडिकल सुविधा और बीमा बेहद जरूरी है। मजदूर रोज इस डर में काम करते हैं कि वे सुरक्षित घर लौट पाएंगे या नहीं। सरकार सबसे ज्यादा टैक्स इसी इंडस्ट्री से लेती है, तो मजदूरों का कल्याण कोष कहां है। अगर ये व्यवस्थाएं नहीं सुधरीं तो पहले मजदूर टूटेंगे और फिर पूरी इंडस्ट्री कमजोर पड़ जाएगी। अब सरकार के पास सुनने का नहीं, कार्रवाई का समय है।’
बजट में हमेशा सिनेमा की अनदेखी होती: अक्षय राठी
‘यूनियन बजट में हमारी इंडस्ट्री का नाम मुश्किल से आता है, जबकि प्रधानमंत्री खुद सिनेमा को भारत की ‘सॉफ्ट पावर’ कहते हैं। सरकार को ऐसी नीतियां लानी चाहिए, जो सच में इस इंडस्ट्री को आगे बढ़ाएं। कस्टम ड्यूटी और टैक्स कम किए जाएं ताकि नए प्रोजेक्टर और उपकरण सस्ते मिल सकें और अधिक सिनेमाघर बन पाएं। कई राज्यों ने पहले भी सब्सिडी दी, पर नियम इतने मुश्किल थे कि किसी ने फायदा नहीं उठाया। देश में सिर्फ 9,200 के आसपास स्क्रीन हैं। बड़ी फिल्मों के आने पर मिड-बजट फिल्मों को जगह ही नहीं मिलती। अगर स्क्रीन बढ़ेंगी तो हर फिल्म को बराबर मौका मिलेगा और इंडस्ट्री आगे बढ़ेगी।’
भारत में स्वतंत्र फिल्म बनाना कठिन: संजय गुलाटी
‘भारत में स्वतंत्र फिल्म बनाना बहुत कठिन काम है। यूरोप में सरकारें फिल्म की शुरुआत में ही आर्थिक मदद दे देती हैं, इसलिए कलाकार बिना दबाव के काम कर पाते हैं। भारत में सहायता अक्सर फिल्म रिलीज होने के बाद मिलती है, जबकि जरूरत सबसे ज्यादा शूटिंग के समय होती है। पहले एनएफडीसी कला फिल्मों को समर्थन देता था, लेकिन अब वह माहौल लगभग खत्म हो चुका है। इंडी फिल्ममेकर फंडिंग की कमी, सही तकनीकी टीम न मिलने, महंगे उपकरण, लोकेशन परमिट की दिक्कत, स्क्रीन न मिलना और मार्केटिंग के लिए पैसे न होने के कारण जूझते रहते हैं। अगर शुरुआत से ही आर्थिक सहायता देने वाला राष्ट्रीय फंड नहीं बना, तो ईमानदार और बहादुर कहानियां धीरे-धीरे गायब हो जाएंगी और इंडियन सिनेमा की असली आवाज कमजोर पड़ जाएगी।’
इंडस्ट्री अर्थव्यवस्था में योगदान देती है, पर बजट में नहीं मिलती जगह: शब्बीर बॉक्सवाला, प्रोड्यूसर
फिल्म इंडस्ट्री ने पिछले कुछ साल में जितनी मुश्किलें झेली हैं, वैसा पहले कभी नहीं हुआ। जीएसटी और कई तरह के टैक्स ने फिल्में बहुत महंगी कर दी हैं। हमारी इंडस्ट्री देश की अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती है, लेकिन बजट में हमारी समस्याओं को कभी सही जगह नहीं मिलती। ऐसा लगता है कि सरकार मानकर चलती है कि फिल्मों को मदद की जरूरत नहीं है, जबकि सच यह है कि इंडस्ट्री को तुरंत राहत चाहिए। अब समय सिर्फ सुनने का नहीं, ठोस कदम उठाने का है। अगर सरकार ने इस बार कोई फैसला नहीं लिया तो बहुत से लोग यह काम छोड़ने पर मजबूर हो जाएंगे।
