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Hindi News ›   Haryana ›   Chandigarh-Haryana News ›   Commissions are not courts, they should only make recommendations and not issue orders: High Court

आयोग अदालतें नहीं, सिफारिशें ही करें, आदेश जारी न करे : हाईकोर्ट

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- हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि मानवाधिकार आयोग आदेश जारी नहीं कर सकता

- फरीदाबाद से जुड़े मामले में हाईकोर्ट ने एनएचआरसी के निर्देश किए रद्द

चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सहित अन्य आयोग अदालत की तरह बाध्यकारी आदेश जारी नहीं कर सकते हैं। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत एनएचआरसी (राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग) को केवल सिफारिश करने का अधिकार है। आयोग के पास न्यायालय जैसी निर्णायक शक्तियां नहीं हैं।
फरीदाबाद से जुड़ा एक मामला मुख्य न्यायाधीश जस्टिस शील नागू की खंडपीठ के समक्ष सुनवाई के लिए पहुंचा था। आयोग ने आपराधिक मामले की जांच स्थानांतरित करने, अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई और उनके तबादले जैसे निर्देश जारी किए थे। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि आयोग ने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्रवाई की। कोर्ट ने कहा कि यहां प्रश्न यह उठता है कि क्या मानवाधिकार आयोगों की सिफारिशें बाध्यकारी होती हैं और क्या वे सांविधानिक अदालतों जैसी न्यायिक शक्तियों का प्रयोग कर सकते हैं।
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खंडपीठ ने कहा कि इसका उत्तर मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की स्पष्ट भाषा में ही निहित है। हम इस तथ्य को लेकर चिंतित हैं कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कानून में किसी अधिकार के बिना विवादित निर्देश जारी कर दिए। हाईकोर्ट ने कहा कि आयोग केवल सरकार को कार्रवाई की सिफारिश कर सकता है। इसमें पीड़ित को मुआवजा देने या मानवाधिकार उल्लंघन में शामिल अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की अनुशंसा करना शामिल हो सकता है, लेकिन वह सीधे आदेश जारी नहीं कर सकता है। अधिनियम का उद्देश्य और उसकी स्पष्ट भाषा के साधारण अवलोकन से यह साफ है कि आयोग एक सिफारिशी संस्था है और उसे कभी भी अदालत की भूमिका निभाने के लिए नहीं बनाया गया है।
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खंडपीठ ने कहा कि जब किसी कानून की भाषा स्पष्ट और असंदिग्ध हो तो उसकी व्याख्या के लिए अन्य सिद्धांतों या उद्देश्यपरक व्याख्या का सहारा लेने की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि एनएचआरसी को केवल सिफारिशी संस्था मानने का अर्थ यह नहीं है कि वह पूरी तरह शक्तिहीन हो जाता है। आयोग आवश्यकता पड़ने पर सिफारिशों को लागू करवाने के लिए सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटा सकता है और वहां से निर्देश, आदेश प्राप्त कर सकता है।
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