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132 केवी लाइन से बिना सीधे संपर्क के मौत संभव नहीं, यह न्यायिक अनुमान मात्र : हाईकोर्ट
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- हाईकोर्ट ने बिजली निगम की अपील खारिज कर मुआवजा बरकरार रखा
- करंट लगने से हो गई थी केबल टीवी ऑपरेटर की मौत
चंडीगढ़। पंजाब व हरियाणा हाईकोर्ट ने हाई वोल्टेज बिजली लाइन से करंट लगने पर हुई मौत के मामले में हरियाणा विद्युत प्रसारण निगम लिमिटेड की दूसरी अपील खारिज करते हुए मृतक के परिजनों को दिया गया मुआवजा बरकरार रखा है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि एक बार करंट से मौत सिद्ध हो जाए तो बिजली आपूर्ति प्राधिकरण केवल सीधे संपर्क से इनकार या ट्रिपिंग न होने का बहाना बनाकर जिम्मेदारी से नहीं बच सकता।
जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि बिजली स्वभाव से अत्यंत खतरनाक वस्तु है। बिजली आपूर्तिकर्ता पर यह वैधानिक और गैर हस्तांतरणीय दायित्व है कि वह ट्रांसमिशन लाइनों की स्थापना और रखरखाव इस तरह करे कि मानव जीवन को कोई खतरा न हो। मामला 9 सितंबर 2012 का है जब भिवानी के गांव गोविंदपुरा में केबल टीवी ऑपरेटर सीता राम की छत पर काम करते समय मौत हो गई थी।
आरोप था कि छत के बेहद पास से गुजर रही 132 केवी की हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन और उससे उलझा हुआ पेड़ खतरनाक इंडक्शन जोन बना रहा था जिससे सीता राम की करंट लगने से मौत हो गई।
सीता राम की पत्नी और बच्चों की ओर से दायर दीवानी वाद को ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि 132 केवी लाइन से ऐसी मौत संभव नहीं है और संभवतः घरेलू बिजली कारण रही होगी। हाईकोर्ट ने कहा कि यह निष्कर्ष किसी विशेषज्ञ या चिकित्सकीय साक्ष्य के बिना मात्र अनुमान पर आधारित था। पहली अपीलीय अदालत ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों, विभागीय रिकॉर्ड और मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और करंट से मौत को सिद्ध माना। हाईकोर्ट ने इसी फैसले को सही ठहराया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह कहना कि 132 केवी लाइन के संपर्क में आने पर व्यक्ति ‘जिंदा जल जाता’, किसी मेडिकल या विशेषज्ञ साक्ष्य से समर्थित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि एक बार करंट से मौत साबित हो जाए तो दायित्व से मुक्त होने का भार बिजली प्राधिकरण पर होता है। इस मामले में वह भार पूरा नहीं किया गया।
यह दलील भी खारिज कर दी गई कि मृतक हाई वोल्टेज लाइन के नीचे काम कर रहा था, इसलिए वह स्वयं जिम्मेदार है। कोर्ट ने कहा कि कानूनी पेशे में लगे व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह खराब रखरखाव वाली हाई वोल्टेज लाइन से होने वाले इंडक्शन खतरे का अनुमान लगाए।
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जस्टिस दीपक गुप्ता ने कहा कि बिजली स्वभाव से अत्यंत खतरनाक वस्तु है। बिजली आपूर्तिकर्ता पर यह वैधानिक और गैर हस्तांतरणीय दायित्व है कि वह ट्रांसमिशन लाइनों की स्थापना और रखरखाव इस तरह करे कि मानव जीवन को कोई खतरा न हो। मामला 9 सितंबर 2012 का है जब भिवानी के गांव गोविंदपुरा में केबल टीवी ऑपरेटर सीता राम की छत पर काम करते समय मौत हो गई थी।
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आरोप था कि छत के बेहद पास से गुजर रही 132 केवी की हाई वोल्टेज ट्रांसमिशन लाइन और उससे उलझा हुआ पेड़ खतरनाक इंडक्शन जोन बना रहा था जिससे सीता राम की करंट लगने से मौत हो गई।
सीता राम की पत्नी और बच्चों की ओर से दायर दीवानी वाद को ट्रायल कोर्ट ने यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि 132 केवी लाइन से ऐसी मौत संभव नहीं है और संभवतः घरेलू बिजली कारण रही होगी। हाईकोर्ट ने कहा कि यह निष्कर्ष किसी विशेषज्ञ या चिकित्सकीय साक्ष्य के बिना मात्र अनुमान पर आधारित था। पहली अपीलीय अदालत ने प्रत्यक्षदर्शी गवाहों, विभागीय रिकॉर्ड और मेडिकल साक्ष्यों के आधार पर ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और करंट से मौत को सिद्ध माना। हाईकोर्ट ने इसी फैसले को सही ठहराया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह कहना कि 132 केवी लाइन के संपर्क में आने पर व्यक्ति ‘जिंदा जल जाता’, किसी मेडिकल या विशेषज्ञ साक्ष्य से समर्थित नहीं है। कोर्ट ने कहा कि एक बार करंट से मौत साबित हो जाए तो दायित्व से मुक्त होने का भार बिजली प्राधिकरण पर होता है। इस मामले में वह भार पूरा नहीं किया गया।
यह दलील भी खारिज कर दी गई कि मृतक हाई वोल्टेज लाइन के नीचे काम कर रहा था, इसलिए वह स्वयं जिम्मेदार है। कोर्ट ने कहा कि कानूनी पेशे में लगे व्यक्ति से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह खराब रखरखाव वाली हाई वोल्टेज लाइन से होने वाले इंडक्शन खतरे का अनुमान लगाए।
