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सेल सर्टिफिकेट से पहले नीलाम संपत्ति पर खरीदार का अधिकार नहीं : हाईकोर्ट
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-गुरुग्राम की 12 करोड़ की गिरवी संपत्ति की नीलामी हाईकोर्ट ने की रद्द
-इंडियन बैंक को 3.99 करोड़ रुपये जमा कराने वाले सफल बोलीदाता की रकम लौटाने का आदेश
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने गुरुग्राम में करोड़ों रुपये की गिरवी संपत्ति को लेकर चल रहे हाई प्रोफाइल विवाद में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए इंडियन बैंक द्वारा जारी बिक्री नोटिस और सफल बोलीदाता के पक्ष में जारी स्वीकृति पत्र को रद्द कर दिया। जस्टिस सुवीर सहगल और जस्टिस दीपक मनचंदा की खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि जब तक नीलामी प्रक्रिया सेल सर्टिफिकेट जारी होने तक अंतिम रूप नहीं लेती तब तक ऋण लेने वाला अपने बकाया का पूरा भुगतान कर संपत्ति छुड़ाने का अधिकार रखता है। कोर्ट ने इंडियन बैंक को बोलीदाता के 3.99 करोड़ रुपये ब्याज सहित लौटाने का आदेश दिया है।
आरकेबी हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड ने 2011 में हेल्थ केयर एवं वेलनेस यूनिट स्थापित करने के लिए इलाहाबाद बैंक (वर्तमान में इंडियन बैंक) से 12 करोड़ रुपये का सावधि ऋण लिया था और बाद में खाता एनपीए घोषित हो गया। खाता एनपीए घोषित होने के बाद सरफेसी कानून के तहत बैंक ने गिरवी संपत्ति की नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ाई। इसके तहत 15 मार्च 2022 को वैल्यू वन रिटेल प्राइवेट लिमिटेड ने 15.98 करोड़ रुपये की सर्वोच्च बोली लगाई और लगभग 25 प्रतिशत राशि यानी 3.99 करोड़ रुपये जमा कराए। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मामला पहले से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित था और अदालत के अंतरिम आदेश प्रभावी थे। बाद में ऋण लेने वाले पक्ष ने बैंक के साथ 12.84 करोड़ रुपये का नया वन टाइम सेटलमेंट किया और पूरी राशि जमा कर दी। इस पर नीलामी खरीदार (बोलीदाता) ने बैंक और ऋण लेने वाले पक्ष के बीच मिलीभगत का आरोप लगाया लेकिन अदालत ने रिकार्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं पाया। खंडपीठ ने कहा कि नीलामी खरीदार ने न्यायालय के अधीन विवाद व अंतरिम आदेशों की जानकारी के बावजूद अपने जोखिम पर बोली लगाई थी। केवल 25 प्रतिशत राशि जमा कराने या स्वीकृति पत्र जारी होने से संपत्ति पर वैधानिक अधिकार स्थापित नहीं होता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि बिक्री अंतिम रूप नहीं लेती और सेल सर्टिफिकेट जारी नहीं होता तो बैंक ऋण लेने वाले के साथ समझौता कर सकता है।
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आरकेबी हेल्थकेयर प्राइवेट लिमिटेड ने 2011 में हेल्थ केयर एवं वेलनेस यूनिट स्थापित करने के लिए इलाहाबाद बैंक (वर्तमान में इंडियन बैंक) से 12 करोड़ रुपये का सावधि ऋण लिया था और बाद में खाता एनपीए घोषित हो गया। खाता एनपीए घोषित होने के बाद सरफेसी कानून के तहत बैंक ने गिरवी संपत्ति की नीलामी प्रक्रिया आगे बढ़ाई। इसके तहत 15 मार्च 2022 को वैल्यू वन रिटेल प्राइवेट लिमिटेड ने 15.98 करोड़ रुपये की सर्वोच्च बोली लगाई और लगभग 25 प्रतिशत राशि यानी 3.99 करोड़ रुपये जमा कराए। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान मामला पहले से पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में लंबित था और अदालत के अंतरिम आदेश प्रभावी थे। बाद में ऋण लेने वाले पक्ष ने बैंक के साथ 12.84 करोड़ रुपये का नया वन टाइम सेटलमेंट किया और पूरी राशि जमा कर दी। इस पर नीलामी खरीदार (बोलीदाता) ने बैंक और ऋण लेने वाले पक्ष के बीच मिलीभगत का आरोप लगाया लेकिन अदालत ने रिकार्ड में ऐसा कोई प्रमाण नहीं पाया। खंडपीठ ने कहा कि नीलामी खरीदार ने न्यायालय के अधीन विवाद व अंतरिम आदेशों की जानकारी के बावजूद अपने जोखिम पर बोली लगाई थी। केवल 25 प्रतिशत राशि जमा कराने या स्वीकृति पत्र जारी होने से संपत्ति पर वैधानिक अधिकार स्थापित नहीं होता। अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि यदि बिक्री अंतिम रूप नहीं लेती और सेल सर्टिफिकेट जारी नहीं होता तो बैंक ऋण लेने वाले के साथ समझौता कर सकता है।
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