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Chandigarh-Haryana News: दिव्यांग कुसुम के जुनून के आगे हर बाधा हार गई, 14 मेडल जीते
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अरुण शर्मा
चंडीगढ़। यह कहानी उन युवाओं को प्रेरित करने वाली है जो जीवन में एक बाधा आने पर हताश हो जाते हैं। रोहतक के डोभ गांव की बेटी और हिसार की बहू कुसुम ने जीवन में आने वाली हर बाधा को हराकर अपने लिए खुद रास्ते बनाए। जन्म से ही पोलियो के कारण दोनों पैर खराब थे तो आत्मनिर्भरता के लिए पढ़ाई को सशक्त हथियार बनाया। मास्टर ऑफ लाइब्रेरियन की पढ़ाई के बाद नाैकरी भी करने लगीं। एमए हिंदी की पढ़ाई भी की लेकिन बड़े भाई सुनील ने खेलों में जाने के लिए प्रोत्साहित किया। वर्ष 2015 में डिस्कस थ्रो का अभ्यास व्हीलचेयर पर बैठकर करने लगीं। बाद में राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर के 14 मेडल जीते।
41 वर्षीय कुसुम का कहना है कि वह चलने-फिरने में असमर्थ थीं और मन में कसक रहती कि वह खेल नहीं सकतीं। कुसुम की सरकारी नाैकरी के साथ 2013 में हिसार के नाड़ा गांव निवासी संजय पांचाल के साथ शादी हुई। 2015 में बड़े भाई अंतरराष्ट्रीय धावक सुनील ने दिव्यांग श्रेणी के खेलों के बारे में जानकारी दी तब कुसुम को शादी होने के कारण थोड़ा संकोच हुआ। कुसुम के मन की बात को पति संजय ने भांप लिया और कुसुम की आंखों के सपनों को पढ़कर खुद तैयारी कराने लगे। 2016 में 16वें राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स में जेवलिन थ्रो में कांस्य पदक जीता तो जिंदगी जीने की नई राह मिल गई। वर्ष 2022 में चीन में आयोजित पैरा एशियन गेम्स में कुसुम मेडल नहीं ला सकीं। फिलहाल कुसुम का सपना है कि भारत को अक्तूबर में जापान में होने वाले पैरा एशियन गेम्स में मेडल दिला सकें इसलिए दिन-रात मेहनत में जुटी हैं।
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किडनी हो गईं थीं 80 प्रतिशत खराब, सड़क हादसा भी नहीं रोक सका राह
कुसुम की कहानी बताते हुए पति संजय कहते हैं कि इतना हाैसला बेहद कम लोगों में होता है। वर्ष 2016 में कुसुम को दोनों ही किडनी में स्टोन के असहनीय दर्द के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में उपचार के दाैरान पता चला कि किडनी संक्रमण के कारण 80 प्रतिशत तक खराब हो गईं हैं। लंबे उपचार और दुआओं का असर हुआ। कुछ माह बाद दर्द को भूलकर कुसुम फिर से मैदान में आ गईं। फिलहाल कुसुम जींद के नारायणगढ़ स्थित आरोही माॅडल स्कूल में लाइब्रेरियन के पद पर तैनात हैं। वर्ष 2018 में कुसुम के ड्यूटी पर जाने के दाैरान सड़क हादसा हो गया। उस समय शरीर में 122 टांके आए और पैरों में भी अधिक चोट लगीं। कुछ माह बेड पर बिताने के बाद फिर से जींद के नरवाना स्थित स्टेडियम में पसीना बहाने लगीं। कुसुम के डिस्कस थ्रो में 11 में से 7 गोल्ड मेडल हैं। शाॅटपुट में 2 और जेवलिन थ्रो में भी 1 मेडल है।
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41 वर्षीय कुसुम का कहना है कि वह चलने-फिरने में असमर्थ थीं और मन में कसक रहती कि वह खेल नहीं सकतीं। कुसुम की सरकारी नाैकरी के साथ 2013 में हिसार के नाड़ा गांव निवासी संजय पांचाल के साथ शादी हुई। 2015 में बड़े भाई अंतरराष्ट्रीय धावक सुनील ने दिव्यांग श्रेणी के खेलों के बारे में जानकारी दी तब कुसुम को शादी होने के कारण थोड़ा संकोच हुआ। कुसुम के मन की बात को पति संजय ने भांप लिया और कुसुम की आंखों के सपनों को पढ़कर खुद तैयारी कराने लगे। 2016 में 16वें राष्ट्रीय पैरा एथलेटिक्स में जेवलिन थ्रो में कांस्य पदक जीता तो जिंदगी जीने की नई राह मिल गई। वर्ष 2022 में चीन में आयोजित पैरा एशियन गेम्स में कुसुम मेडल नहीं ला सकीं। फिलहाल कुसुम का सपना है कि भारत को अक्तूबर में जापान में होने वाले पैरा एशियन गेम्स में मेडल दिला सकें इसलिए दिन-रात मेहनत में जुटी हैं।
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किडनी हो गईं थीं 80 प्रतिशत खराब, सड़क हादसा भी नहीं रोक सका राह
कुसुम की कहानी बताते हुए पति संजय कहते हैं कि इतना हाैसला बेहद कम लोगों में होता है। वर्ष 2016 में कुसुम को दोनों ही किडनी में स्टोन के असहनीय दर्द के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया। अस्पताल में उपचार के दाैरान पता चला कि किडनी संक्रमण के कारण 80 प्रतिशत तक खराब हो गईं हैं। लंबे उपचार और दुआओं का असर हुआ। कुछ माह बाद दर्द को भूलकर कुसुम फिर से मैदान में आ गईं। फिलहाल कुसुम जींद के नारायणगढ़ स्थित आरोही माॅडल स्कूल में लाइब्रेरियन के पद पर तैनात हैं। वर्ष 2018 में कुसुम के ड्यूटी पर जाने के दाैरान सड़क हादसा हो गया। उस समय शरीर में 122 टांके आए और पैरों में भी अधिक चोट लगीं। कुछ माह बेड पर बिताने के बाद फिर से जींद के नरवाना स्थित स्टेडियम में पसीना बहाने लगीं। कुसुम के डिस्कस थ्रो में 11 में से 7 गोल्ड मेडल हैं। शाॅटपुट में 2 और जेवलिन थ्रो में भी 1 मेडल है।