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हरियाणा एग्री डिस्कॉम व स्मार्ट मीटरिंग बिजली निजीकरण के एजेंडे का हिस्सा : लांबा
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लॉइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (ईईएफआई) ने कृषि फीडरों और कृषि उपभोक्ताओं के लिए एक अलग हरियाणा एग्री डिस्कॉम बनाने की अधिसूचना की कड़ी निंदा की है। ईईएफआई के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुभाष लांबा ने बयान जारी कर कहा कि प्रदेश सरकार का यह कोई अलग निर्णय नहीं है। बिजली वितरण के विखंडन और निजीकरण को बढ़ावा देने के ऐसे प्रयास अन्य राज्यों में भी दिखाई दे रहे हैं। यह कदम केंद्र सरकार के बिजली वितरण के निजीकरण के व्यापक एजेंडे का ही हिस्सा है। विद्युत (संशोधन) विधेयक-2025 एक ही क्षेत्र में साझा अवसंरचना का उपयोग करते हुए अनेक वितरण लाइसेंसधारियों को संचालन की अनुमति देने का प्रयास करता है। यह पहले ही बिजली कर्मचारियों, किसानों और ट्रेड यूनियनों के देशव्यापी भारी विरोध का सामना कर चुका है। इसी व्यापक विरोध के कारण सरकार को इस विधेयक को फिलहाल स्थगित रखना पड़ा।
उन्होंने कहा कि वर्तमान अधिसूचना राज्य स्तर पर उसी निजीकरण एजेंडे को पिछले दरवाजे से लागू करने का प्रयास है। लांबा ने यह भी आरोप लगाए कि 5427 करोड़ के कर्ज से शुरू हो रही एग्रीकल्चर डिस्कॉम व उसमें जाने वाले कर्मचारियों का भविष्य क्या होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। ईईएफआई के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश राठी ने कहा कि हरियाणा में लगभग 7.17 लाख सब्सिडी प्राप्त कृषि उपभोक्ता, 2,54,325 वितरण ट्रांसफार्मर, 2,697 कृषि 11 केवी फीडर, 166.82 करोड़ रुपये की बकाया राशि है। भारी देनदारियों को एक अलग इकाई में स्थानांतरित करके हरियाणा सरकार जानबूझकर भारी सब्सिडी वाले कृषि क्षेत्र को अलग कर रही है। इसका अंतिम परिणाम किसानों के लिए बिजली दरों में वृद्धि, आपूर्ति की अनिश्चितता तथा बिजली की उपलब्धता में कमी के रूप में सामने आएगा। यह कदम मौजूदा बिजली वितरण निगमों को उनके घाटे वाले ग्रामीण और कृषि व्यवसाय से मुक्त करके निजी भागीदारी के लिए अधिक आकर्षक बनाने की स्पष्ट तैयारी भी है। स्मार्ट मीटरिंग भी निजीकरण के ही एजेंडे का हिस्सा है।
चंडीगढ़। इलेक्ट्रिसिटी एम्प्लॉइज फेडरेशन ऑफ इंडिया (ईईएफआई) ने कृषि फीडरों और कृषि उपभोक्ताओं के लिए एक अलग हरियाणा एग्री डिस्कॉम बनाने की अधिसूचना की कड़ी निंदा की है। ईईएफआई के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुभाष लांबा ने बयान जारी कर कहा कि प्रदेश सरकार का यह कोई अलग निर्णय नहीं है। बिजली वितरण के विखंडन और निजीकरण को बढ़ावा देने के ऐसे प्रयास अन्य राज्यों में भी दिखाई दे रहे हैं। यह कदम केंद्र सरकार के बिजली वितरण के निजीकरण के व्यापक एजेंडे का ही हिस्सा है। विद्युत (संशोधन) विधेयक-2025 एक ही क्षेत्र में साझा अवसंरचना का उपयोग करते हुए अनेक वितरण लाइसेंसधारियों को संचालन की अनुमति देने का प्रयास करता है। यह पहले ही बिजली कर्मचारियों, किसानों और ट्रेड यूनियनों के देशव्यापी भारी विरोध का सामना कर चुका है। इसी व्यापक विरोध के कारण सरकार को इस विधेयक को फिलहाल स्थगित रखना पड़ा।
उन्होंने कहा कि वर्तमान अधिसूचना राज्य स्तर पर उसी निजीकरण एजेंडे को पिछले दरवाजे से लागू करने का प्रयास है। लांबा ने यह भी आरोप लगाए कि 5427 करोड़ के कर्ज से शुरू हो रही एग्रीकल्चर डिस्कॉम व उसमें जाने वाले कर्मचारियों का भविष्य क्या होगा इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। ईईएफआई के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष सुरेश राठी ने कहा कि हरियाणा में लगभग 7.17 लाख सब्सिडी प्राप्त कृषि उपभोक्ता, 2,54,325 वितरण ट्रांसफार्मर, 2,697 कृषि 11 केवी फीडर, 166.82 करोड़ रुपये की बकाया राशि है। भारी देनदारियों को एक अलग इकाई में स्थानांतरित करके हरियाणा सरकार जानबूझकर भारी सब्सिडी वाले कृषि क्षेत्र को अलग कर रही है। इसका अंतिम परिणाम किसानों के लिए बिजली दरों में वृद्धि, आपूर्ति की अनिश्चितता तथा बिजली की उपलब्धता में कमी के रूप में सामने आएगा। यह कदम मौजूदा बिजली वितरण निगमों को उनके घाटे वाले ग्रामीण और कृषि व्यवसाय से मुक्त करके निजी भागीदारी के लिए अधिक आकर्षक बनाने की स्पष्ट तैयारी भी है। स्मार्ट मीटरिंग भी निजीकरण के ही एजेंडे का हिस्सा है।
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